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Budget 2026 : ग्रामीण रोज़गार के बजट में दो-तिहाई की कटौती, मनरेगा से मिलने वाली आजीविका बुरी तरह प्रभावित

ग्रामीण मजदूरी की फंडिंग में भारी कटौती, मांग आधारित रोज़गार से दूरी, और कवरेज बढ़ाने के बड़े-बड़े दावों से पता चलता है कि नीतिगत बातों और वित्तीय प्रतिबद्धता के बीच एक बड़ी खाई है।

Getty Images
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केंद्रीय बजट 2026-27 ग्रामीण रोज़गार के प्रति केंद्र सरकार के नज़रिए में एक बड़ा बदलाव दिखाता है, जिसमें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के लिए फंडिंग में भारी कटौती की गई है और एक नया कार्यक्रम, VB ग्राम G, शुरू किया गया है। हालांकि सरकार इस नई योजना को ज़्यादा महत्वाकांक्षी बता रही है - जो पहले के 100 दिनों के बजाय 125 दिनों के रोज़गार का वादा करती है - लेकिन बजट के आंकड़े एक बिल्कुल अलग और कम भरोसेमंद कहानी बताते हैं।

ग्रामीण आजीविका की लंबे समय से सहायता की रीढ़ माने जाते रहे मनरेगा के बजट आवंटन में भारी कमी आई है। इस योजना के लिए 2025-26 के लिए संशोधित अनुमान ₹88,000 करोड़ था। इसके उलट 2026-27 के बजट अनुमान में यह आंकड़ा घटाकर ₹30,000 करोड़ कर दिया गया है, जो ₹58,000 करोड़ या लगभग 66 प्रतिशत की कटौती है। यह कमी वीबी ग्राम जी में संरचनात्मक बदलाव से होने वाली कमी से कहीं ज़्यादा है।

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वीबी ग्राम जी का जो ढांचा सामने आया है उसके तहत उम्मीद है कि केंद्र सरकार ज़्यादातर राज्यों में इस योजना का लगभग 60 प्रतिशत खर्च उठाएगी, और बाकी खर्च राज्य सरकारें देंगी। लेकिन इस मद में केंद्रीय खर्च में असल कटौती—65.9 प्रतिशत—इस खर्च बंटवारे से कहीं ज़्यादा है। इससे यह गंभीर सवाल उठता है कि क्या स्कीम के बताए गए लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन रखे गए हैं?

सरकार के इस दावे को देखते हुए यह विरोधाभास और भी साफ़ हो जाता है कि वी बी ग्राम जी योजना  125 दिनों का रोज़गार देगा, जो मनरेगा के तहत गारंटी वाले 100 दिनों से ज़्यादा है। काम के दिनों की संख्या बढ़ाने के लिए आम तौर पर ज़्यादा सरकारी खर्च की ज़रूरत होती है। फिर भी बजट इसके उलट दिशा में जा रहा है। 

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इस योजना के डिज़ाइन में बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मनरेगा जहां मांग आधारित कार्यक्रम था, यानी जब काम की मांग बढ़ती थी, खासकर खेती-बाड़ी की परेशानी या आर्थिक मंदी के दौरान, तो आवंटन बढ़ जाता था। लेकिन बजट में बताए गए वीबी ग्राम जी योजना में ऐसा कोई मांग आधारित प्रावधान नहीं है, जिससे ज़मीनी हकीकत की परवाह किए बिना खर्च पर रोक लग जाती है।

कुल मिलाकर, खेतिहर मजदूरी की फंडिंग में भारी कटौती, मांग आधारित रोज़गार से दूरी, और कवरेज बढ़ाने के बड़े-बड़े दावों से पता चलता है कि नीतिगत बातों और वित्तीय प्रतिबद्धता के बीच एक बड़ी खाई है। ग्रामीण परिवारों के लिए जो सुरक्षा कवच के तौर पर रोज़गार गारंटी पर निर्भर थे, यह बदलाव परिवर्तनकारी से कही ज़्यादा परेशान करने वाला साबित हो सकता है।

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