
अक्सर परिसीमन को रूखी-सूखी संवैधानिक भाषा में इस तरह से पेश किया जाता है कि जैसे यह बस बराबर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का समय-समय पर होने वाला पुनर्निर्धारण है। कागज पर यह एक तटस्थ प्रशासनिक सुधार लगता है- आबादी के हिसाब से निर्वाचन क्षेत्रों को संतुलन बनाने की कवायद। लेकिन भारत में परिसीमन तकनीकी प्रक्रिया भर नहीं है। यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील, सामाजिक रूप से समस्याओं भरा और संवैधानिक दृष्टि से काफी गंभीर मामला है, जो कई पीढ़ियों तक राज्यों, समुदायों और राजनीतिक दलों के बीच शक्ति संतुलन को बदल सकता है।
जैसे-जैसे भारत 2026 की उस समय-सीमा के करीब पहुंच रहा है, जब सीटों के गणित पर दशकों पुरानी रोक समाप्त होने वाली है, देश स्वतंत्रता के बाद के सबसे महत्वपूर्ण संघीय टकराव के मुहाने पर खड़ा है। अगर इसे सिर्फ आबादी का हिसाब लगाकर यांत्रिक ढंग से लागू किया गया, तो परिसीमन केवल चुनावी पुनर्संरचना नहीं, बल्कि बड़ा संवैधानिक संकट पैदा कर सकता है।
बेशक, ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ का सिद्धांत लोकतंत्र का आधार है। भारत जैसे विशाल और बहुलता वाले संघीय गणराज्य में लोकतंत्र केवल अंकगणित से नहीं चल सकता। प्रतिनिधित्व को उस संघीय समझौते की भी रक्षा करनी होगी, जो इसे एकजुट रखता है।
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जिन राज्यों ने परिवार नियोजन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक आधुनिकीकरण में निवेश किया, उन्हें उनकी सफलता के लिए ऐसे दंडित नहीं किया जा सकता कि उनका संसदीय प्रतिनिधित्व घट जाए, जबकि जिन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अनियंत्रित रही, उन्हें राजनीतिक लाभ मिले।
इसीलिए 1971 की जनगणना के बाद भारत ने सीट आवंटन को स्थिर कर दिया था। मकसद साफ था- दक्षिणी और बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण लक्ष्यों को लागू करने के कारण दंडित नहीं किया जाएगा। इस सावधानी से संतुलित व्यवस्था को 2001 में आगे बढ़ाया गया। अब इसकी अवधि खत्म होने वाली है। इसके बाद संवैधानिक प्रावधान नवीनतम जनगणना, जो फिलहाल जारी है, के आधार पर सीटों के बंटवारे का रास्ता साफ हो जाएगा।
इसके नतीजे तबाही ला सकते हैं। इससे हिन्दी पट्टी के राज्यों की संसदीय ताकत काफी बढ़ जाएगी, जबकि दक्षिणी राज्यों की आवाज कमजोर पड़ जाएगी। यह केवल संख्या घटने का मामला नहीं है, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राजनीतिक हाशिये पर धकेले जाने का भय महसूस कर रहे हैं। उनकी चिंता काल्पनिक नहीं, अस्तित्वगत है। अगर प्रतिनिधित्व के आधार पर तय हुआ तो हमारा संघ खुद अस्थिर हो सकता है।
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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे “सोची-समझी चाल” और “काला कानून” बताया है। उनका कहना है कि इसका मकसद दक्षिणी राज्यों को निशाना बनाना है। डीएमके प्रवक्ता सलेम धरनिधरन ने कहा है कि मौजूदा व्यवस्था को कम-से-कम अगले 25 वर्षों तक जारी रहना चाहिए, जैसे पहले उन राज्यों की रक्षा की गई थी जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को पूरा किया।
यह संकट केवल उत्तर बनाम दक्षिण का नहीं है। सवाल यह भी है कि यह काम किसके नियंत्रण में होगा।
ऐसे समय में जब देश पहले से ही विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे अभियानों से चिंतित है, परिसीमन इतना गंभीर विषय है कि इसे केवल सरकार के विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता। इस पर कोई सार्थक राष्ट्रीय विमर्श शुरू नहीं हुआ है। आम सहमति बनाने की कोई कोशिश भी दिखाई नहीं देती। इसके बावजूद कि इसके प्रभाव बहुत बड़े हैं, यह मुद्दा अभी भी दलगत समीकरणों में फंसा हुआ है।
ब्राउन विश्वविद्यालय की वरिष्ठ विजिटिंग फेलो यामिनी अय्यर ने इस चिंता को तीखे ढंग से व्यक्त करते हुए चेतावनी दी कि बीजेपी के पास परिसीमन को इस प्रकार आकार देने के साफ चुनावी फायदे हैं, जिससे उसकी सत्ता और मजबूत हो। जम्मू कश्मीर और असम के हालिया अनुभव भी यही कहते हैं।
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असम का परिसीमन यह बताता है कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग कैसे हो सकता है। 2009 की तरह ब्लॉक या तहसील को मूल प्रशासनिक इकाई मानने के बजाय इस परिसीमन में गांवों को आधार बनाया गया। इस ‘सर्जिकल’ तरीके ने अभूतपूर्व स्तर पर जनसांख्यिकीय इंजीनियरिंग की।
उदाहरण के लिए, बरपेटा में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत से घटकर 35 प्रतिशत के करीब आ गई। वहां मुस्लिम बहुल पंचायतों को हटाकर हिन्दू बहुल क्षेत्रों को जोड़ा गया। इससे सिर्फ सीमाएं नहीं बदलीं, बल्कि राजनीतिक नतीजे भी बदल गए। अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में टेढ़ी-मेढ़ी निर्वाचन सीमाएं उभरीं, जबकि सत्तारूढ़ दल के गढ़ अपेक्षाकृत पारंपरिक आकार में बने रहे। ऐतिहासिक रूप से असम लोकसभा में दो मुस्लिम सांसद भेजता था। 2023 के परिसीमतन के बाद केवल एक चुना गया।
राजनीतिक संदेश लगभग स्पष्ट था। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि परिसीमन ने ‘स्वदेशी’ समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया है। जबकि एक वरिष्ठ मंत्री ने खुले तौर पर कहा कि मुस्लिम विधायकों की संख्या घटेगी।
असम का उदाहरण एक भयावह प्रश्न उठाता है- अगर परिसीमन का इस्तेमाल एक राज्य में जेरिमैंडरिंग के औजार के रूप में किया जा सकता है, तो राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे प्रयोगों को कौन रोकेगा?
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पूर्व लोकसभा महासचिव पी.डी.टी. आचार्य ने सही कहा है कि संसद कुल सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव कर सकती है, लेकिन मनमाने फार्मूले जैसे एक समान प्रतिशत वृद्धि को केवल सरकारी आदेश से लागू नहीं किया जा सकता। ऐसे किसी भी प्रयास के लिए स्वतंत्र संस्थागत व्यवस्था आवश्यक है।
इसीलिए परिसीमन को कार्यपालिका की मनमर्जी या सत्तारूढ़ दल की चुनावी महत्वाकांक्षाओं पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए राष्ट्रीय सहमति, संवैधानिक दूरदृष्टि और एक वास्तविक रूप से स्वतंत्र संस्था की आवश्यकता है, जो दलगत उद्देश्यों से परे हो।
भारत को तत्काल एक तार्किक और वैज्ञानिक फार्मूले की आवश्यकता है, जो जनसंख्या के साथ-साथ विकास की उपलब्धियों, संघीय स्थिरता और लोकतांत्रिक निष्पक्षता का संतुलन बनाए। जो भी तरीका अपनाया जाए, उस पर गंभीर बहस होनी चाहिए। एकतरफा फैसला और उसके बाद जो चुप्पी दिखाई दी, वह स्वीकार करने लायक नहीं है।
राहुल गांधी पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि फिलहाल जो हो रहा है, वह शासक दल को 2029 से पहले लोकसभा सीटों की हेराफेरी की अनुमति दे सकता है। यह संदेह खुद विश्वास के खतरनाक क्षरण की ओर इशारा करता है।
तुरंत ही कुछ करना होगा। जनगणना 2027 तक इस बहस को फिर भड़का देगी, और यदि अभी सहमति बनाने में देरी हुई, तो आगे संघर्ष और तेज होगा।
परिसीमन को ऐसा राजनीतिक हथियार नहीं बनने देना चाहिए, जो किन्हीं हितों के अनुरूप भारत के लोकतांत्रिक मानचित्र को पुनर्गठित कर दे। इसे गलत ढंग से किया गया, तो यह सिलसिला संवैधानिक विघटन में बदल सकता है- जहां प्रतिनिधि संस्थाओं में न्याय, संतुलन और विश्वास की झलक नदारद हो।
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