
संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण (इकोनॉमिक सर्वे) में देश की तरक्की की संभावनाओं को लेकर सावधानी भरी उम्मीद जताई गई है। अनुमान लगाया गया है कि वित्त वर्ष 2027 में देश की रियल जीडीपी ग्रोथ 6.8 से 7.2 प्रतिशत रह सकती है। फिर भी, आर्थिक सर्वे को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इसकी मुख्य चिंता घरेलू अर्थव्यवस्था की स्थिति नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक हालात में बढ़ती अनिश्चितताएं हैं, जो भारत पर लगातार असर डाल रही हैं।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में जो आर्थिक सर्वे पेश किया, उसमें बार-बार बाहरी जोखिमों, वैश्विक कारोबार की अड़चनों, और वित्तीय अस्थिरता पर ज़ोर देते हुए भारत की आर्थिक दिशा को ज़्यादातर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के नज़रिए से देखा गया। सर्वे में कहा गया, "वैश्विक अनिश्चितता के बीच संभावना स्थिर वृद्धि वाली है, जिसके लिए निराशावादी होने के बजाए सावधानी बरतने की ज़रूरत है।" यही बात सर्वे के मुख्य भाव को बताती है।
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हालांकि सर्वे में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2027 एडजस्टमेंट यानी चीज़ों को दुरुस्त करने का साल होगा क्योंकि कंपनियां और परिवार बदलती हुई स्थितियों के हिसाब से खुद को ढालेंगे, और घरेलू मांग और निवेश में मज़बूती आने की उम्मीद है। लेकिन, इन बातों के साथ-साथ अस्थिर बाहरी माहौल के बारे में चेतावनियां भी लगातार दी गईं हैं। सर्वे में साफ तौर पर माना गया कि वैश्विक अनिश्चितता कुल मिलाकर आउटलुक को प्रभावित करती रहेगी, जिससे पता चलता है कि सिर्फ घरेलू बुनियादें ही अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए काफी नहीं हो सकतीं।
सर्वे का एक बड़ा हिस्सा मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान सामने आई चुनौतियों का आकलन करने के लिए समर्पित है, जिसे बाहरी मोर्चे पर एक असामान्य रूप से मुश्किल साल बताया गया है। इसके अलावा वैश्विक कारोबार में बढ़ती अनिश्चितता, ऊंचे और दंडात्मक टैरिफ लगाने से मैन्युफैक्चरर्स, खासकर एक्सपोर्टर्स के लिए पैदा तनाव और बिजनेस कॉन्फिडेंस को हुए नुकसान का जिक्र है। सर्वे में कहा गया है कि सरकार ने इस संकट का इस्तेमाल जीएसटी दरों में बदलाव, तेजी से डीरेगुलेशन और कंप्लायंस नियमों को आसान बनाने जैसे ढांचागत उपायों को आगे बढ़ाने के लिए किया। यहां भी, जोर अंदरूनी दिक्कतों को दूर करने के बजाय ग्लोबल झटकों पर प्रतिक्रिया देने पर रहा।
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सर्वे के मुताबिक, मध्यावधि में वैश्विक परिस्थितियां खराब ही बनी हुई हैं, , जिनेमें गिरावट का खतरा ज़्यादा है। वैश्विक प्रगति के मामूली रहने, कमोडिटी की कीमतें मोटे तौर पर स्थिर रहने और महंगाई में गिरावट आने की उम्मीद है, जिससे ज़्यादातर देशों में आसान मौद्रिक नीतियां अपनाई जाएंगी। हालांकि, सर्वे ने चेतावनी दी कि इनमें बदलाव हो सकता है।
जिन मुख्य जोखिमों की बात कही गई, उनमें यह संभावना भी शामिल है कि बहुत ज़्यादा चर्चा वाला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बूम शायद उम्मीद के मुताबिक प्रोडक्टिविटी फायदे न दे पाए, जिससे ओवरवैल्यूड एसेट मार्केट में करेक्शन हो सकता है और फाइनेंशियल संकट फैल सकता है। ट्रेड विवादों का लंबा चलना भी एक और बड़ा खतरा बताया गया, जिससे ग्लोबल इन्वेस्टमेंट और ग्रोथ और कमज़ोर हो सकती है।
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सर्वे में कहा गया है कि भारत के लिए, ये हालात तुरंत मैक्रोइकोनॉमिक तनाव के बजाय लगातार बाहरी अनिश्चितताओं में बदलते हैं। बड़े कारोबारी साझीदार के यहां धीमी ग्रोथ, टैरिफ की वजह से ट्रेड में रुकावटें और अस्थिर पूंजी आवागमन समय-समय पर एक्सपोर्ट और इन्वेस्टर के भरोसे पर असर डाल सकते हैं। हालांकि, अमेरिका के साथ चल रही ट्रेड बातचीत अगर सफलतापूर्वक पूरी हो जाती है, तो अनिश्चितता कम करने में मदद मिल सकती है, लेकिन सर्वे ने पर्याप्त बफर और पॉलिसी की विश्वसनीयता बनाए रखने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
रोज़गार, उपभोग पर संकुचन या अलग-अलग सेक्टर की कमज़ोरियों जैसी घरेलू चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा सीमित रही है। इसके बजाय, इस साल का आर्थिक सर्वेक्षण ज़्यादातर उथल-पुथल भरे वैश्विक माहौल से निपटने पर फोकस करता दिखा, जिससे यह साफ़ हो गया कि भारत की आर्थिक कहानी को, फिलहाल, उसकी सीमाओं के बाहर हो रही अनिश्चितताओं से अलग नहीं किया जा सकता।
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