
2013 के बाद से मुजफ्फरनगर को सांप्रदायिक नजरिए से संवेदनशील माना जाने लगा है। ऐसे में इस लोकसभा क्षेत्र में अल्पसंख्यकों और खासतौर से मुसलमानों के बीच चुनावी सरगर्मियां किस किस्म की है और उनके बीच क्या विचार-विमर्श चल रहा है, जानने के लिए इलेक्शन हाईवे पर हमारा अगला पड़ाव है मुजफ्फरनगर का खालापार इलाका।
खालापार में एक स्थानीय संस्था पैगाम-ए-इंसानियत के दफ्तर में हमने कुछ लोगों को जमा किया ताकि जान सकें कि इस बार के लोकसभा चुनावों को लेकर उनका क्या रुख है। इस इलाके में पहुंचने के दौरान रास्ते में हमें आभास हो रहा था कि यह कैसा इलाका है और यहां की आबादी कैसी होगी। कई जगह हमें स्कूटी या स्कूटर खुद लड़कियां चलाती दिखीं। इलाके की दुकानों को देखकर साफ था कि यहां के लोग आर्थिक तौर पर मजबूत हैं।
बहरहाल हमने जब बात शुरु की तो सबसे महत्वपूर्ण यह लगा कि लोग 2013 के दंगों से उबर चुके हैं। आम लोगों के साथ-साथ बाजार में 6 साल पहले हुए दंगे का कोई तनाव या असर देखने को नहीं मिला। साथ ही यह भी सामने आया कि यहां के ज्यादातर लोग मानते हैं कि 2103 में जो कुछ हुआ वह गलत था और इसका फायदा 2014 में बीजेपी को हुआ।
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हमारी इस चुनावी चौपाल में शामिल होने वाले में विभिन्न पेशों से जुड़े लोग थे और सबने खुलकर अपने विचार साझा किए। एक तरफ लोग यह तो मानते थे कि 2104 में बीजेपी को दंगों का फायदा हुआ, वहीं उनका यह भी मानना है कि सत्ताधारी दल पुलवामा और बालाकोट के नाम पर 2013 जैसा ही माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उनकी कोशिश कामयाब होती नजर नहीं आ रही।
बातचीत से हमें अंदाज़ लगा कि बीजेपी की इस नाकामी की वजह प्रधानमंत्री से बढ़ती नाराज़गी और चौधरी अजित सिंह की बीते एक साल में की गई कोशिशें हैं। एक स्थानीय बाशिंदे ने बताया कि, ”बीते एक साल में अजित सिंह ने अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच पैदा खाई को पाटने की शानदार कोशिश की।” लेकिन लोगों में भय भी है कि अगर मोदी सरकार सत्ता में वापस आई तो देश का संविधान खतरे में पड़ जाएगा।
यहां लोगों ने बीजेपी सांसद और इस चुनाव में उम्मीदवार साक्षी महाराज के उस बयान के हवाला दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि बीजेपी इस बार सत्ता में आई तो देश में फिर कभी चुनाव नहीं होंगे। इसके अलावा लोगों के स्थानीय मुद्दों में गन्ने के बकाए को लेकर भी केंद्र और राज्य सरकार दोनों से नाराज़गी है।
आपने ऊपर दिए वीडियो में लोगों की राय सुनी, लेकिन पूरी बातचीत में अल्पसंख्यकों का जोर इस बात पर रहा कि वे सत्ता में अपना नेतृत्व नहीं बल्कि सेक्युलर नेतृत्व चाहते हैं। उनका कहना था कि उन्होंने हमेशा बहुसंख्यकों से आए नेतृत्व को स्वीकार किया है, चाहे वह इंदिरा गांधी हों, चौधरी चरण सिंह हों या फिर मनमोहन सिंह हो।
इस दिलचस्प बातचीत के दौरान हमें मुजफ्फरनगर के जाट, मुस्लिम और अन्य तबके के लोगों के राजनीतिक विचार और रुख का अंदाज़ा लगा। यहां से चौधरी अजित सिंह एसपी-बीएसपी-आरएलडी महागठबंधन के उम्मीदवार हैं। उनका मुकाबला मौजूदा सांसद बीजेपी के संजीव बालियान से है।
(इलेक्शन हाईवे पर हमारा सफर जारी है। कल हम आपको लेकर चलेंगे सहारनपुर के अल्पसंख्यक इलाकों में और जानेंगे कि चुनाव की हवा कैसी बह रही है।)
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