हालात

ग्रीनवॉशिंग यानी विकास से होने वाले नुकसान पर पर्दा डालना, लेकिन जद में आ रहे हैं इंसान और पर्यावरण

ग्रीनवॉशिंग का मतलब है विकास परियोजनाओं को सुरक्षित और अनुकूल बताना, उनके पारिस्थितिक नुकसान को छिपाना।

नेपाल के त्रिशूली पॉवर प्रोजेक्ट-1 की विनाश से पहले और बाद की तस्वीरें
नेपाल के त्रिशूली पॉवर प्रोजेक्ट-1 की विनाश से पहले और बाद की तस्वीरें 

हिमालय ने 26 अगस्त की सुबह एक बार फिर चेतावनी दी। नेपाल-तिब्बत सीमा पर लांगटांग लिरुंग पर्वत के पास भूगोलीय घटनाओं की एक श्रृंखला ने बर्फ, चट्टानों, पानी और मलबे की सुनामी को भोटे कोशी और त्रिशूली घाटियों की ओर धकेल दिया। इसके सही क्रम को लेकर वैज्ञानिक अभी भी अनुमान लगा रहे हैं।

बस्तियां गायब हो गईं। सड़कें और पुल मलबे में समा गए। एक दर्जन से अधिक पनबिजली परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हुईं या पूरी तरह तबाह हो गईं। उनमें काम कर रहे सैकड़ों मजदूर फंस गए।

वैज्ञानिक अब इस विनाशकारी घटना के शुरुआती कारण को लेकर सहमत हैं। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा, जिसका अनुमानित आयतन 10 से 20 करोड़ घन मीटर था, टूटकर अलग हो गया और करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा।

निर्माणाधीन 216 मेगावाट की अपर त्रिशूली-1 पनबिजली परियोजना में काम कर रहे मजदूरों के पास बाढ़ की लहर पहुंचने के बाद ऊंचाई की ओर भागने के लिए मुश्किल से 40 सेकंड थे। सुरंगों के द्वार मलबे से बंद हो गए। नेपाल सरकार के आंकड़ों में परियोजना स्थलों से लापता लोगों की संख्या 934 बताई गई, हालांकि तमाम एजेंसियों ने अलग-अलग आंकड़े दिए।

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल की वरिष्ठ शोधकर्ता परिणीता दांडेकर कहती हैं कि किसी को यह तक पता नहीं कि इन परियोजना स्थलों पर कुल कितने लोग काम कर रहे हैं। ठेका मजदूरों, दिहाड़ी कामगारों और रोजगार की तलाश में आए लोगों की कोई आधिकारिक संख्या नहीं है। चमकदार तरीके से तैयार की जाने वाली पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट आमतौर पर इस अहम तथ्य पर पर्दा डाल देती हैं।

हिमस्खलन प्राकृतिक, मानवीय जोखिम प्राकृतिक नहीं

हिमस्खलन एक प्राकृतिक घटना थी, लेकिन उससे पैदा हुआ मानवीय जोखिम और जान-माल खर्चीले बुनियादी ढांचे का नुकसान प्राकृतिक नहीं था।

महज एक साल पहले, 8 जुलाई 2025 को, भोटे कोशी-त्रिशूली घाटी एक भीषण बाढ़ से तबाह हो गई थी। इस बाढ़ में 10 से अधिक पनबिजली परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हुई थीं। एक साल बाद, उसी बुनियादी ढांचे पर कहीं ज्यादा बड़ी आपदा आई।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ग्लेशियर क्यों टूट रहे हैं या अत्यधिक बाढ़ की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन एक हकीकत है, लेकिन हमें इसके पीछे छिपकर अपनी उस आत्मघाती प्रवृत्ति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए जिसमें हम चेतावनियों को अनदेखा करते हैं और पहाड़ों में बेलगाम ‘विकास’ परियोजनाओं को आगे बढ़ाते रहते हैं। सवाल यह भी पूछना होगा कि ज्ञात जोखिमों की राह में, नदी के बहाव की दिशा में, हम अब भी निर्माण क्यों कर रहे हैं, जबकि वैज्ञानिक लगातार इससे बचने की सलाह दे रहे हैं।

जलवायु की बहस में पनबिजली को लंबे समय से विशेष दर्जा हासिल रहा है। बिजली पैदा करने के लिए इसमें कोयला या तेल नहीं जलाया जाता। खासकर ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ परियोजनाओं को जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली के कम बुरे प्रभाव वाले विकल्प के रूप में पेश किया जाता है। 

बड़ी पनबिजली परियोजनाएं तलछट और पानी के प्रवाह को बदलती हैं, नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती हैं और इनके लिए सड़कें, सुरंगें, ट्रांसमिशन लाइनें, विस्फोट और बड़े निर्माण स्थल जरूरी होते हैं। यह सब हिमालय में बड़े पैमाने पर हो रहा है। एक ऐसी युवा पर्वत श्रृंखला में जिसे भूगर्भीय रूप से अस्थिर माना जाता है।

पनबिजली परियोजना कम-कार्बन वाली बिजली पैदा कर सकती है, फिर भी पारिस्थितिकी के लिए खतरा बन सकती है। यहीं हरी लीपापोती यानी ‘ग्रीनवॉशिंग’ की शुरुआत होती है।

पर्यावरणीय नुकसान को छिपाने का तंत्र है ग्रीनवॉशिंग

ग्रीनवॉशिंग का मतलब विकास परियोजनाओं को पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित और अनुकूल बताना, उनके पारिस्थितिक नुकसान को छिपाना, कम करके दिखाना या जानबूझकर नजरअंदाज करना। पर्यावरण प्रभाव आकलन यानी ईआईए की प्रक्रिया में यह प्रवृत्ति सबसे खतरनाक दिखाई देती है।

परिणीता दांडेकर बताती हैं कि हिमालयी क्षेत्र में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है जहां किसी बांध या पनबिजली परियोजना को सिर्फ इसलिए मंजूरी देने से इनकार किया गया हो कि उसे पर्यावरण के लिहाज से जोखिम भरा या परियोजना स्थल को भूगर्भीय रूप से नाजुक माना गया हो। ईआईए अक्सर उन्हीं लोगों या संस्थाओं की ओर से कराया जाता है जो परियोजना का प्रस्ताव रखते हैं, ताकि उसकी पर्यावरणीय व्यवहारिकता प्रमाणित की जा सके।

नेपाल की हालिया आपदा इसका उदाहरण है। अपर त्रिशूली-1 की फाईनेंसिंग और समर्थन में शामिल बहुपक्षीय संस्थानों, एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक की इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन, ने पर्यावरणीय और संचयी प्रभाव आकलन यानी सीआईए कराए थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि कर्ज देने वाली संस्थाएं नदी बेसिन की अत्यधिक संवेदनशीलता से परिचित थीं, इसके बावजूद फाईनेंसिंग जारी रही और इसे ‘जलवायु एवं आपदा प्रतिरोधक क्षमता’ की भाषा में पेश किया गया।

मिसाल के लिए, त्रिशूली बेसिन के आकलन में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओफ की आशंका का उल्लेख ही नहीं है, जबकि इस क्षेत्र की जल प्रणाली में ग्लेशियर और हिमनदीय झीलें बुनियादी घटक हैं। इसे महज अनजाने में हुई चूक नहीं माना जा सकता।

नेपाल से इतर भारत के पर्वतीय इलाके भी खतरे की जद में

नेपाल अकेला नहीं है। उत्तराखंड में 2021 में ग्लेशियर से जुड़ी आपदा ने तपोवन-विष्णुगाड और ऋषिगंगा पनबिजली परियोजनाओं को तबाह कर दिया था और 200 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। जोशीमठ हिमालयी अस्थिरता का एक उदाहरण बन गया, जहां दरारें पड़ने के बाद 850 से अधिक मकानों को रहने के लिहाज से असुरक्षित घोषित किया गया। अध्ययनों में जमीन के विकृत होने की बात सामने आई और पहले से नाजुक क्षेत्र में सुरंग निर्माण और पनबिजली परियोजनाओं के प्रभाव को लेकर चिंता दोहराई गई।

अक्तूबर 2023 में उत्तरी सिक्किम में साउथ ल्होनक ग्लेशियर के टूटने और धंसने से सैलाब आया। कुछ ही घंटों में तीस्ता नदी का जलस्तर 15 से 20 मीटर तक बढ़ गया। गांव, सड़कें, पुल, खेत और बुनियादी ढांचा पानी के साथ बह गए और 1,200 मेगावाट की चुंगथांग पनबिजली परियोजना पूरी तरह नष्ट हो गई। नुकसान का अनुमान 25,000 करोड़ रुपये से अधिक लगाया गया।

पनबिजली संयंत्र का मतलब सिर्फ एक बिजलीघर नहीं होता। इसके साथ सड़कें, ट्रांसमिशन कॉरिडोर, मजदूरों की बस्तियां, सुरंगें, मलबा डालने के स्थान, विस्फोट और जंगलों की कटाई भी आती है। यहां तक कि ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ कही जाने वाली परियोजनाओं में भी बड़े पैमाने पर सुरंग निर्माण और पहाड़ी ढलानों में बदलाव शामिल हो सकता है। शोध बताते हैं कि इस तरह का निर्माण ढलानों की भूगर्भीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है, मिट्टी का कटाव बढ़ा सकता है और भूस्खलन को जन्म दे सकता है। असर पहाड़ों के प्राकृतिक जलस्रोतों पर भी पड़ सकता है।

यह पैटर्न पनबिजली से आगे भी दिखाई देता है। बेहतर कनेक्टिविटी, राष्ट्रीय सुरक्षा और, जाहिर है, उस जादुई शब्द ‘विकास’ के नाम पर ट्रांस-हिमालयी इलाकों में सड़कें और सुरंगें बनाई जा रही हैं। मसलन, जोजिला में बड़े पैमाने पर विस्फोटों ने भूगर्भीय संरचनाओं को अस्थिर किया है। इसके अलावा जैव-विविधता से भरपूर इस नाजुक क्षेत्र में शोर और वायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ा है।

भाषा बदल सकती है, ‘स्वच्छ ऊर्जा’ से लेकर ‘सदाबहार कनेक्टिविटी’ और ‘हरित विकास’ तक, मूल धारणा वही रहती है कि परियोजना के लिए पहाड़ को बदलना ही होगा।

नदी परियोजना तक सीमित नहीं है ग्रीनवॉशिंग 

ग्रीनवॉशिंग केवल नदी परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र में प्रस्तावित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को ही लें। ठंडे रेगिस्तानी पठार पर सौर और पवन ऊर्जा पहली नजर में जलवायु संकट का आदर्श समाधान लग सकती है। लेकिन मामला इतना सरल नहीं है।

पैंग के आसपास की जमीन का इस्तेमाल चांगपा पशुपालक गर्मियों के महत्वपूर्ण चरागाह के रूप में करते हैं। ठंडे रेगिस्तान का पारिस्थितिकी तंत्र बेहद नाजुक है और यह क्षेत्र ब्लैक-नेक्ड क्रेन तथा हिम तेंदुए जैसी प्रजातियों का आवास है। बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र जैव-विविधता के लिए विनाशकारी साबित हो सकते हैं, भारी मात्रा में पानी के इस्तेमाल को बढ़ावा दे सकते हैं और पारंपरिक आजीविका के लिए खतरा बन सकते हैं।

पनबिजली परियोजनाओं पर नए सिरे से विचार की जरूरत

जीवाश्म ईंधन के मुकाबले सौर, पवन और जल ऊर्जा भले ही ‘हरित’ विकल्प दिखाई दें, लेकिन ‘नवीकरणीय’ होना ऐसा गुण नहीं है जिसे बाकी सभी बातों से अलग करके देखा जाए। ‘हरित’ होना किसी परियोजना को कठोर पर्यावरणीय आकलन से छूट नहीं देता।

पनबिजली परियोजना को कथित तौर पर ‘जलवायु के हिसाब से लचीला’ बताया जाता है, लेकिन उसके आकलन में ग्लेशियरों की अस्थिरता, बारिश के बदलते पैटर्न और अक्सर आने वाली आपदाओं को शामिल ही नहीं किया गया, तो यह बात बेमानी है।

अगर कोई परियोजना पहाड़ी ढलानों को अस्थिर करती है, जंगल नष्ट करती है और फिर कहीं और पेड़ लगाकर उसकी भरपाई का दावा करती है, तो उसके ‘हरित’ होने की बात बस उसकी चमकदार पैकेजिंग है।

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