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हल्द्वानी अतिक्रमण: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जमीन रेलवे की, प्रभावित परिवार पीएम आवास के लिए कर सकते हैं आवेदन

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि झुग्गियों में रहने वालों के प्रति पूरी हमदर्दी है, लेकिन बेहतर और सुरक्षित जगह पर रहने का अधिकार सबका है। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में होगी। तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी।

हल्द्वानी अतिक्रमण: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जमीन रेलवे की, प्रभावित परिवार पीएम आवास के लिए कर सकते हैं आवेदन
हल्द्वानी अतिक्रमण: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जमीन रेलवे की, प्रभावित परिवार पीएम आवास के लिए कर सकते हैं आवेदन फोटोः IANS

सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण हटाने के मामले में मंगलवार को बड़ा आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि जमीन रेलवे की है और वहां रहने वालों को अतिक्रमण हटाना होगा, क्योंकि यह सरकारी संपत्ति है और रेलवे को इसका उपयोग तय करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण करने वालों को यह हक नहीं है कि वे उसी जगह पर रहने की मांग करें या रेलवे को जमीन के इस्तेमाल का फैसला बताएं।

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इसके साथ ही चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने उत्तराखंड विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह बलभनपूरा में एक शिविर लगाए, ताकि रेलवे परियोजना के लिए आवश्यक सरकारी जमीन पर रह रहे और बेदखली का सामना कर रहे परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पुनर्वास के लिए आवेदन कर सकें। कोर्ट ने निर्देश दिए कि प्रभावित परिवारों की सूची तैयार की जाए, खासकर ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के लोगों को पीएमएवाई के तहत आवास के लिए अप्लाई करने में मदद मिले।

कोर्ट ने आदेश दिया कि नैनीताल जिले की रेवेन्यू अथॉरिटी, केंद्र और राज्य सरकार मिलकर एक सप्ताह का कैंप लगाएं, जहां पीएमएवाई के फॉर्म भरे जा सकें। यह कैंप 15 मार्च के बाद लगाया जाए, क्योंकि लोगों ने इसे रमजान के बाद आयोजित करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र बनाया जाए, जहां हर परिवार का मुखिया जाकर फॉर्म भर सके। नैनीताल के जिलाधिकारी और एसडीएम हल्द्वानी को लॉजिस्टिक्स सपोर्ट देने के निर्देश दिए गए।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को पीएमएवाई के बारे में जागरूक करें। कोर्ट ने सुनिश्चित करने को कहा कि सभी पात्र परिवारों को पीएमएवाई के तहत आवास मिल सके। यह पूरी प्रक्रिया 31 मार्च से पहले पूरी की जानी है। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि जिला कलेक्टर हर परिवार की योजना के तहत पात्रता तय करें और अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करें।

कोर्ट के आदेश की मुख्य बातें

  • हल्द्वानी में रेलवे की लगभग 30 हेक्टेयर जमीन पर बनभूलपुरा, गफूर बस्ती और अन्य इलाकों में हजारों घर बने हुए हैं, जहां अनुमानित 5,000 से अधिक परिवार (करीब 50,000 लोग) रहते हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण करने वालों को यह हक नहीं है कि वे उसी जगह पर रहने की मांग करें या रेलवे की जमीन के इस्तेमाल का फैसला करें।

  • कोर्ट ने निर्देश दिए कि प्रभावित परिवारों की सूची तैयार की जाए, खासकर ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के लोगों को पीएमएवाई के तहत आवास के लिए अप्लाई करने में मदद मिले।

  • कोर्ट ने आदेश दिया कि नैनीताल जिले का राजस्व प्राधिकरण, केंद्र और राज्य सरकार मिलकर एक सप्ताह का शिविर लगाएं, जहां पीएमएवाई के फॉर्म भरे जा सकें। यह कैंप 19 मार्च से शुरू हो।

  • आदेश में कहा गया कि बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र बनाया जाए, जहां हर परिवार का मुखिया जाकर फॉर्म भर सके।

  • नैनीताल के जिलाधिकारी और एसडीएम हल्द्वानी को लॉजिस्टिक्स सपोर्ट देने के निर्देश दिए गए।

  • कोर्ट ने कहा कि सामाजिक कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को पीएमएवाई के शिविर के बारे में जागरूक करें।

  • कोर्ट ने सुनिश्चित करने को कहा कि सभी पात्र परिवारों को पीएमएवाई के तहत आवास मिल सके। 

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चीफ जस्टिस की पीठ दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हल्द्वानी में सार्वजनिक जमीन पर कथित रूप से कब्जा करने वाले करीब 50 हजार लोगों को हटाने का निर्देश दिया गया था। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी और इस अंतरिम आदेश को समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा था। जुलाई और सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार, केंद्र सरकार और रेलवे को निर्देश दिया था कि वे सार्वजनिक जमीन से बेदखल किए गए लोगों के लिए पुनर्वास योजना तैयार करें।

यह मामला लंबे समय से चला आ रहा है। रेलवे की लगभग 30 हेक्टेयर जमीन पर बनभूलपुरा, गफूर बस्ती और अन्य इलाकों में हजारों अवैध निर्माण बने हुए हैं, जहां अनुमानित 5,000 से अधिक परिवार (करीब 50,000 लोग) रहते हैं। रेलवे का कहना है कि ट्रैक विस्तार और अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए इस जमीन की सख्त जरूरत है, खासकर नदी के कारण मौजूदा ट्रैक में दिक्कत आ रही है। यह इलाका रेलवे विस्तार के लिए उत्तराखंड में आखिरी संभावित जगह है, उसके बाद पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है।

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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यहां 50,000 लोग दशकों से रह रहे हैं, कई पट्टे वाली जमीन पर बसे हैं और रेलवे ने पहले कभी मांग नहीं की। उन्होंने एक मैप पेश किया, जिसमें पास की खाली जमीन का इस्तेमाल सुझाया गया। भूषण ने कहा कि एक साथ इतने परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत घर देना संभव नहीं, और दिल्ली की झुग्गी पॉलिसी में भी कट-ऑफ डेट होती है।

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि पात्र परिवारों को विस्थापन के बाद छह महीने तक प्रति माह 2,000 रुपए का भत्ता दिया जाएगा। रेलवे और राज्य सरकार ने सामूहिक रूप से प्रभावित परिवारों की पहचान करने और पुनर्वास की व्यवस्था का आश्वासन दिया। रेलवे और राज्य सरकार ने सामूहिक रूप से प्रभावित परिवारों की पहचान करने और पुनर्वास की व्यवस्था का आश्वासन दिया। तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी। केंद्र ने बताया कि 13 जमीनों पर फ्रीहोल्ड है, और हर्जाना राज्य और रेलवे दोनों देंगे।

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि झुग्गियों में रहने वालों के प्रति पूरी हमदर्दी है, लेकिन बेहतर और सुरक्षित जगह पर रहने का अधिकार सबका है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवैध कब्जा हटाना जरूरी है, और यह उत्तराखंड के अन्य अतिक्रमण मामलों पर लागू नहीं होगा। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में होगी। तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी।

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