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बिहार में बाढ़: खोखले दावों के बीच चंपारण में लोगों का फूटा गुस्सा, 'हर साल डूबते आशियानों का जवाब कौन देगा?

यह तो सिर्फ विनाश की शुरुआत थी। गंडक नदी का रौद्र रूप यहीं शांत नहीं हुआ। अगले 12 घंटों के भीतर नदी के भीषण प्रकोप ने एक के बाद एक दो और प्रमुख तटबंधों को लील लिया। इस तरह कुल चार जगहों पर बांध टूटने से पूरा इलाका जलमग्न हो गया।

फोटो: विनय कुमार
फोटो: विनय कुमार 

यह कहानी सिर्फ बिहार के एक हिस्से में आई प्राकृतिक आपदा की नहीं है, बल्कि यह कहानी है प्रशासनिक अनदेखी, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते बांधों और बदहाल जनता के घावों पर नमक छिड़कने वाले नेताओं की। यह दास्तां पश्चिम चंपारण के बगहा, नौतन और बेतिया के उन लाखों लोगों की है, जो आज अपनी ही चुनी हुई सरकारों के आगे लाचार होकर हाईवे पर कई रातें गुजारने को मजबूर हुए हैं।

29 सितंबर 2026 की वो भयावह रात... जब पूरा जिला चैन की नींद सो रहा था, तब पश्चिम चंपारण के बगहावासियों के सिर पर वज्रपात हुआ। अचानक खबर आई कि गंडक नदी के उफनते पानी और बढ़ते दबाव के आगे सदियों पुराना चंपारण तटबंध टूट गया है। देखते ही देखते, रिहायशी इलाकों में पानी का स्तर बढ़ने लगा। घर डूबने लगे, अनाज बह गया और चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। किसी अनहोनी के डर से लोग रात भर सो नहीं पाए, अपने बच्चों और थोड़े-बहुत बचे सामान को बचाने की जद्दोजहद में पूरी रात सड़कों पर गुजार दी।

लेकिन यह तो सिर्फ विनाश की शुरुआत थी। गंडक नदी का रौद्र रूप यहीं शांत नहीं हुआ। अगले 12 घंटों के भीतर नदी के भीषण प्रकोप ने एक के बाद एक दो और प्रमुख तटबंधों को लील लिया। इस तरह कुल चार जगहों पर बांध टूटने से पूरा इलाका जलमग्न हो गया।

• खैरटवा: सोमवार (28 सितंबर) की रात करीब 8:30 बजे बांध का हिस्सा ढह गया।

• बथुवरिया: मंगलवार (29 सितंबर ) की सुबह तड़के 4:00 बजे पानी ने इसे तोड़ दिया।

• फुलियारवाई: रात 2:00 बजे तबाही का गवाह बना।

• गोलाघाट: मंगलवार की शाम 6:30 बजे पानी के प्रचंड वेग के आगे टिक नहीं पाया।

सुबह होते-होते मंजर यह था कि बगहा और बेतिया से होकर सूबे की राजधानी पटना को जोड़ने वाला एकमात्र मुख्य हाईवे एक फीट से अधिक पानी में डूब चुका था। यातायात प्रभावित था, और जो लोग कल तक अपने पक्के मकानों में राजा की तरह शान से रह रहे थे, वे अचानक सड़कों पर शरणार्थी बन चुके थे।

जब पानी का स्तर थोड़ा स्थिर हुआ, तो प्रशासनिक दावों की कलई खुल गई। बाढ़ प्रभावित गांवों में जब लोगों से दर्द जानने की कोशिश की, तो वहां सिर्फ पानी का शोर नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के प्रति गहरी नाराजगी और आक्रोश की गूंज सुनाई दी। स्थानीय निवासियों ने खुलेआम इस विनाश के लिए क्षेत्र के स्थानीय बीजेपी नेताओं और जल संसाधन विभाग के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया।

एक बुजुर्ग ग्रामीण ने रुआंसे गले से कहा कि साहब, यह कोई पहली बार नहीं है। हम सालों से सरकार और यहां के माननीयों से लोग पक्के बांध के निर्माण की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन पक्का बांध ये कभी बनने नहीं देंगे। अगर बांध पक्का हो गया, तो हर साल बाढ़ राहत के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये के फंड का बंटाधार कैसे होगा? ठेकेदारों और नेताओं की जेबें कैसे भरेंगी? हमारे डूबने में ही इनका फायदा है।

यह आरोप निराधार नहीं लगते। हर साल मॉनसून से पहले फ्लड फाइटिंग (बाढ़ नियंत्रण) के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, लेकिन गंडक का पानी बढ़ते ही वे सारे दावे ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। स्थानीय लोग गुस्से में हैं। उनका कहना है कि यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक राजनैतिक आपदा है, जिसे भ्रष्टाचार के जरिए जानबूझकर हर साल आमंत्रित किया जाता है।

बाढ़ से प्रभावित गावों में जब प्रशासनिक राहत के दावों की पड़ताल की गई, तो हकीकत दिल दहला देने वाली थी। बाढ़ के बीच भूखे-प्यासे बैठे लोगों के बीच सरकार की ओर से जो मदद पहुंची, वह उनके जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय उनका मज़ाक उड़ाती प्रतीत हुई।

एक युवक रंजन ने भड़कते हुए कहा, "साहब, यह हर साल का दर्द है। हमारी पूरी घर तबाह हो गई, घर में घुटने भर पानी है और सरकार के पास हमारे लिए चूड़ा और मिठ्ठा के अलावा कुछ नहीं है। क्या हम सिर्फ इसी के लायक हैं? ये तो कहिए की यहां के स्थानीय लोग हैं जो सक्षम हैं वो बढ़चढ़कर मदद कर रहे हैं। नहीं तो इस सरकार से क्या ही उम्मीद किया जाए। लाखों की आबादी इस वक्त बेघर है, सैकड़ों गांव टापू बन चुके हैं और सरकारी अमला केवल खानापूर्ति के पैकेट बांटकर अपनी पीठ थपथपा रहा है।

इस पूरी त्रासदी में सबसे तगड़ी मार देश के अन्नदाता यानी किसान पर पड़ी है। चंपारण का किसान जो दिन-रात पसीना बहाकर खेतों में हरियाली उगाता था, वह आज अपनी ही आंखों के सामने अपनी बर्बादी देखने को मजबूर है। बाढ़ का पानी खेतों में इस कदर भर चुका है कि फसलें पूरी तरह से गायब हो गई हैं। खेतों की जगह अब सिर्फ मटमैले पानी की चादर दिखाई देती है। धान और गन्ने की लहलहाती फसलें बर्बाद की कगार पर हैं।

एक किसान ने रोते हुए बताया, "कर्ज लेकर खाद-बीज डाला था कि इस बार फसल अच्छी होगी तो बेटी की शादी करेंगे और पुराना कर्ज चुकाएंगे। लेकिन अब तो खाने के भी लाले पड़ गए हैं। फसल डूब नहीं गई, हमारा नसीब डूब गया है।

इस भारी विपदा के बीच जब जनता को अपने मुखिया और रहनुमाओं की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब सरकार का रवैया बेहद उदासीन रहा। बुधवार यानी 30 सितंबर को बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी चंपारण के बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा करने पहुंचे। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक, वह अपना 'सम्राट' दिल नहीं दिखा पाए।

वे हवाई जहाज से बेतिया आए, अधिकारियों के साथ बैठक की, बगहा के सैकड़ों प्रभावित गांवों का हाल सिर्फ कागजों पर और मौखिक तौर पर लिया और वहीं से वापस लौट गए। वे उन पीड़ित परिवारों के बीच नहीं गए जो सड़कों पर तिरपाल तानकर भूखे सो रहे थे। जनता के बीच यह संदेश गया कि यह दौरा केवल एक राजनीतिक खानापूर्ति थी, ताकि विपक्ष को बोलने का मौका न मिले। वहीं बेतिया में सांसद संजय जायसवाल भी बाढ़ पीड़ित लोगों के बीच गए थे, लेकिन उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। बेतिया में बाढ़ की वजह से बिगड़ती स्थिति को लेकर लोगों के बीच गुस्सा था। ऐसे में सांसद-विधायक जब लोगों से मिलने पहुंचे तो उन्होंने जमकर विरोध किया। इस मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। गुस्साए ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया। इस दौरान स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि लोगों ने सांसद की गाड़ी पर कथित तौर पर गोबर और मिट्टी फेंके।

इसके उलट, पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने बाढ़ पीड़ितों के लिए जो किया, उसने सरकार को आईना दिखा दिया। पप्पू यादव स्वयं बगहा के बाढ़ प्रभावित इलाकों में पहुंचे, घुटने भर पानी में घुसकर पीड़ितों का दर्द जाना और मौके पर ही राहत सामग्री के साथ-साथ नकद आर्थिक मदद भी बांटी। उन्होंने सरकार से वाल्मीकिनगर और बगहा को राष्ट्रीय आपदा क्षेत्र घोषित करने और जिम्मेदार इंजीनियरों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की। लोगों ने कहा कि सत्ता में न होते हुए भी पप्पू यादव ने जो संवेदनशीलता दिखाई, उसने साबित कर दिया कि नेता हवाई दौरों से नहीं, बल्कि जनता के बीच खड़े होने से बड़ा बनता है।

पश्चिम चंपारण की यह बाढ़ हर साल आने वाली एक प्रशासनिक नाकामी का सालाना दस्तावेज बन चुकी है। जब तक बांधों के निर्माण में ईमानदारी नहीं आएगी, जब तक नेताओं के हवाई दौरे जमीनी हकीकत में नहीं बदलेंगे और जब तक राहत के नाम पर चूड़ा-गुड़ बांटने की यह घिनौनी रस्म बंद नहीं होगी, तब तक चंपारण की बेबस जनता इसी तरह हर साल बेघर होती रहेगी।

आबादी की बात की जाए तो पश्चिमी चंपारण में कुल आबादी 39,35,042 है। जिसमें बाढ़ की चपेट से करीब 6 लाख लोग प्रभावित हैं। बाढ़ प्रभावित गांवों की बात करें तो बगहा, बैरिया, योगापट्टी और नौतन प्रखंडों के दर्जनों गांव पूरी तरह पानी से घिरे हैं। खासकर से चखनी, रजावतिया, पिपरिया, बरगांव, बेलवा, डुमरिया, पतीलार, रतवल और लगुनाहा जैसे गांव जलमग्न हो गए हैं।

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