
अयोध्या राम मंदिर में ‘चंदा चोरी’ का रहस्य सुलझने के बजाए गहराता जा रहा है। मामले की जांच के लिए एसआईटी (विशेष जांच दल) बना, एफआईआर हुई, कुछ लोग गिरफ्तार हुए और राम मंदिर ट्रस्ट के कुछेक पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन कुछ सवाल अनुत्तरति हैं, जिन पर न तो ट्रस्ट, न संघ, न बीजेपी और न ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कुछ बोल रही है।
सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि बीजेपी की चुनावी राजनीति का मुख्य मुद्दा बना अयोध्या में राम मंदिर क्या इतनी कमजोर सुरक्षा व्यवस्था से प्रबंधित हो रहा था या है कि वहां से करोड़ो रुपए (पूरा आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आया है) का चंदा चोरी हो गया। देश के करोड़ों नागरिकों की तमाम तरीकों से निगरानी करने वाली सरकार क्या चंदे की निगरानी की व्यवस्था करने में नाकाम रही। मीडिया में आ रही रिपोर्ट्स के मुताबिक राम मंदिर प्रांगण में जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और उनमें पल-पल की गतिविधियों की रिकॉर्डिंग होती है।
अयोध्या राम मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा के लिए 10,000 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।
इनमें से करीब 800 से 1,600 कैमरे सीधे मंदिर परिसर, दान पेटी और गर्भगृह की निगरानी के लिए हैं।
इसके अलावा मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था के लिए कुछ विशेष इंतजाम किए गए हैं।
सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के लिए इनमें से कई कैमरों में एआई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
मंदिर परिसर में किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नज़र रखने के लिए आधुनिक कैमरे 24x7 सक्रिय रहते हैं।
इन सभी कैमरों की लाइव फीड पुलिस और सुरक्षा बलों के विशेष कंट्रोल रूम में रिकॉर्ड की जाती है।
मंदिर में दान-पात्रों और चढ़ावे की गिनती वाले कमरों में विशेष हाई-डेफिनेशन कैमरे लगाए गए हैं, ताकि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रहे।
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यह तो रही जानकारी पूरे मंदिर परिसर में लगे कैमरों की। लेकिन फोकस में दान पात्र और वह कक्ष है जहां चढ़ावे में आए चंदे की गिनती आदि होती थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पूरे मंदिर परिसर में अलग-अलग जगहों पर 40 दान पात्र रखे गए हैं। इन्हीं दान पात्रों में श्रद्धालु अपनी हैसियत मुताबिक नकद रकम, नोट, सिक्के, सोने-चांदी के गहने आदि डालते हैं। इन दानपात्रों को मंदिर उद्घाटन के शुरुआती दिनों में दिन कम से कम दो बार खोला जाता था क्योंकि भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर आ रहे थे और दान पात्रों में चंदा डाल रहे थे। फिलहाल कितनी बार दानपात्रों को खोला जाता है इसकी अधिकारिक जानकारी नहीं है।
दानपात्र खोलने की एक प्रक्रिया तय की गई थी। इसके तहत दान पात्र खोलते समय मंदिर ट्रंस्ट द्वारा नियुक्त अधिकारी, इस काम के लिए विशेष रुप से नियुक्त कर्मचारी और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारी या कर्मचारी की मौजूदगी में खोला जाता है। इन पात्रों में मिले पैसे-गहनों आदि को लोहे को कंटेनर में तालाबंद कर गणना कक्ष में ले जाया जाता है।
दान गणना कक्ष (काउंटिंग रूम) मंदिर परिसर के अंदर, मुख्य मंदिर से लगभग 200 मीटर की दूरी पर यात्री सुविधा केंद्र के बेसमेंट में स्थित है।यह स्थल श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रशासनिक नियंत्रण और सुरक्षा घेरे के अंतर्गत आता है।
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गणना कक्ष में सभी 40 दानपात्रों से मिला धन लाया जाता है। इस गणना कक्ष में 44 लोगों की दो शिफ्ट में ड्यूटी लगती है। इनमें एक इंचार्ज होता है, एक सुपरवाइजर और 4-5 टेलर यानी रोकड़िया है जो पैसे का लेन-देन करता है। इस टीम में ट्रस्ट के अधिकारी, बैंक के अधिकारी कुछ स्थानीय वॉलंटियर होते हैं जिन्हें ट्रस्ट ने नियुक्त किया होता है। गिनती करने वाले लोगों के लिए बिना जेब के कपड़े पहनने का नियम बनाया गया था जिसपर स्टेट बैंक और ट्रस्ट दोनों सहमत हुए थे। लेकिन इसे कभी लागू नहीं किया गया।
दानपात्रों की लोकेशन, उससे मिले धन को गणना केंद्र तक लाने वाले रास्ते और गणना कक्ष, सभी जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। लेकिन इसमें एक पेंच है। रिपोर्ट में सामने आया है कि सभी कैमरों की स्टोरेज क्षमता सिर्फ 45 दिन की रिकॉर्डिंग रखने की ही है और उसके बाद सारी फुटेज वह ऑटो डिलीट हो जाती है। यह ऐसा पेंच है जिसका जवाब फिलहाल नहीं मिला है। हालांकि सूत्रों का कहना है कि एसआईटी डिलीट हुए फुटेज को रिकवर करने की कोशिश कर रही है।
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गणना कक्ष में लगे सीसीटीवी की जो भी रिकॉर्डिंग मिली है, उसमें कुछ चौंकाने वाले पहलू सामने आए हैं। रिकॉर्डिंग से पता चला है कि गिनती के दौरान नोटों के बंडल तय की गई ट्रे या बैंक के कंटेनर में न रखकर कुछ खास व्यक्तियों के हाथों में दिए जा रहे हैं। यह खास व्यक्ति कौन हैं, इसका खुलासा होना बाकी है।
एक और अहम खामी गणना कक्ष में सामने आई है। जानकारी के मुताबिक गिनती में लगे कुछ कर्मचारी खासतौर से गणना कक्ष में लगे सीसीटीवी कैमरों की लोकेशन के सामने इस तरह बैठते हैं जिससे पूरे कमरे और पूरी प्रक्रिया सामने आ ही नहीं पाती है। यानी कैमरे के लेंस में उनकी पीठ ही नजर आ पाती है।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। मंदिर परिसर में लगे हर कैमरे की लाइव मॉनिटरिंग की जाती है। इसके लिए बाकायदा कंट्रोल रूम भी बना हुआ है। तो फिर कैमरों के सामने आ रहे ऐसे व्यवधान को नोट क्यों नहीं किया गया और इसकी जानकारी ट्रस्ट को कैसे नहीं हुई?
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यहां एक व्यक्ति का नाम सामने आता है। अर्जुन देव...यह सरकारी कर्मचारी हैं और अयोध्या में बीते 17 साल से रेडियो मेंटेनेंस अधिकारी के तौर पर तैनात थे। मंदिर परिसर में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की निगरानी करना इनकी ही जिम्मेदारी थी। लोगों का कहना है कि यह ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय (जो इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन इस्तीफे की मंजूरी अभी बाकी है) के नजदीकी थे। एसआईटी की जांच के दौरान इनका नाम सामने आया है। लेकिन इससे पहले ही इनका तबादला गोरखपुर कर दिया गया है। जानकारी के मुताबिक अभी तक इनसे पूछताछ नहीं हुई है। कहा जाता है कि पूर्व में भी इनके तबादले के आदेश होते रहे लेकिन हर बार किसी न किसी की सिफारिश से इनका तबादला रोक दिया गया था।
इन सारी बातों और जानकारियों के सामने आने के बाद अब साफ होता जा रहा है कि सीसीटीवी कैमरों की निगरानी महज एक खानापूरी थी, और उनकी रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि पूरे परिसर में ऐसे कई ब्लाइंड स्पॉट भी मौजूद हैं जहां सीसीटीवी कैमरे की नजर नहीं पहुंच पाती।
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