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I-PAC केस में ED ने सुप्रीम कोर्ट से की तुरंत सुनवाई की मांग, सीएम ममता बनर्जी पर लगाए गंभीर आरोप

प्रवर्तन निदेशालय ने I-PAC मामले में ममता बनर्जी पर कानून अपने हाथ में लेने और राज्य पुलिस के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट से त्वरित सुनवाई की मांग की है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  फोटोः सोशल मीडिया

I-PAC छापा मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर प्रवर्तन निदेशालय ने गंभीर आरोप लगाया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने आरोप लगाया है कि कोलकाता में I-PAC से जुड़े उसके सर्च ऑपरेशन में ममता बनर्जी और राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने जानबूझकर बाधा डाली। इसी मामले में ED ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए CBI जांच की मांग की है।

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ED का सीएम ममता पर गंभीर आरोप

ED ने अपनी याचिका में कहा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा जांच एजेंसियों के काम में हस्तक्षेप कोई अकेली घटना नहीं है। एजेंसी के अनुसार, जब भी किसी ऐसे मामले की जांच होती है, जिससे मुख्यमंत्री, उनके मंत्रियों, पार्टी कार्यकर्ताओं या करीबी अधिकारियों के खिलाफ सबूत मिलने की संभावना हो, तब राज्य पुलिस का इस्तेमाल कर जांच को रोका जाता है।

एजेंसी ने पश्चिम बंगाल की स्थिति को “चौंकाने वाली” बताते हुए कहा कि यहां कानून के रक्षक ही कथित तौर पर कानून तोड़ने में शामिल नजर आ रहे हैं।

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FIR दर्ज करने की संवैधानिक बाध्यता का हवाला

ED ने सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार फैसले का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञेय अपराध सामने आने पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है। एजेंसी का दावा है कि मुख्यमंत्री, डीजीपी और कोलकाता पुलिस कमिश्नर जैसे शीर्ष अधिकारी खुद गंभीर संज्ञेय अपराधों के आरोपी हैं, ऐसे में FIR दर्ज न होना कानून का खुला उल्लंघन है।

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I-PAC छापे से जुड़ा मामला क्या है?

ED के अनुसार, वह एक मल्टी-स्टेट मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच कर रही है, जिसमें करीब 2742.32 करोड़ रुपये की अवैध कमाई का आरोप है। यह रकम कथित तौर पर अवैध कोयला खनन से जुड़ी है, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ।

इसी जांच के तहत ED ने I-PAC के संस्थापक प्रतीक जैन के आवास पर छापा मारा था। एजेंसी का कहना है कि उसके पास ऐसे दस्तावेज और सबूत थे, जो 20 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध रकम से जुड़े हुए थे।

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छापे के दौरान क्या हुआ?

ED ने आरोप लगाया कि छापे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के मुख्य सचिव, पश्चिम बंगाल के डीजीपी, कोलकाता पुलिस कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर और अन्य पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे।

एजेंसी के अनुसार, वहां मौजूद अधिकारियों को डराया-धमकाया गया और महत्वपूर्ण फाइलें व इलेक्ट्रॉनिक सबूत जबरन छीन लिए गए। ED का कहना है कि यह सामग्री PMLA कानून के तहत आधिकारिक तौर पर जब्त की गई थी।

एजेंसी ने यह भी दावा किया कि उसके अधिकारियों को आगे किसी तरह की तलाशी करने की अनुमति नहीं दी गई।

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‘संविधान और कानून के शासन का अपमान’

ED ने कहा कि जब जांच एजेंसी से सबूत खुद मुख्यमंत्री और शीर्ष पुलिस अधिकारी छीनते हैं और यह सब मीडिया के सामने होता है, तो यह केवल एजेंसी का नहीं बल्कि संविधान और कानून के शासन का सार्वजनिक अपमान है। एजेंसी के मुताबिक, इससे संवैधानिक मूल्यों को अपूरणीय क्षति पहुंची है।

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स्थानीय पुलिस पर भरोसा क्यों नहीं

ED का तर्क है कि चूंकि मुख्यमंत्री खुद गृह मंत्री भी हैं और वही अधिकारी इस मामले में आरोपी बताए जा रहे हैं, इसलिए स्थानीय पुलिस से FIR दर्ज कराना व्यर्थ होगा। एजेंसी को आशंका है कि राज्य पुलिस निष्पक्ष जांच करने के बजाय मामले को कमजोर करने का प्रयास करेगी।

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हाईकोर्ट में सुनवाई भी बाधित होने का दावा

ईडी ने कलकत्ता हाईकोर्ट की कार्यवाही का भी जिक्र किया। एजेंसी का आरोप है कि मुख्यमंत्री समर्थकों ने अदालत परिसर में हंगामा किया, जिसके कारण हाईकोर्ट को यह कहते हुए सुनवाई टालनी पड़ी कि माहौल अनुकूल नहीं है।

ईडी का दावा है कि पार्टी कार्यकर्ताओं को व्हाट्सऐप संदेशों के जरिए बड़ी संख्या में अदालत पहुंचने के लिए कहा गया था।

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कई गंभीर धाराओं में अपराध का आरोप

ED ने ममता बनर्जी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं का हवाला दिया है, जिनमें घर में घुसकर चोरी, सरकारी काम में बाधा और सबूत नष्ट करने जैसे आरोप शामिल हैं।

एजेंसी का कहना है कि इससे पहले भी ऐसा देखा गया है कि जांच एजेंसियों के खिलाफ कई FIR दर्ज कर उन्हें डराने की कोशिश की जाती है।

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CCTV जब्त करने पर भी सवाल

ED ने आरोप लगाया कि इस मामले में FIR की आड़ में राज्य पुलिस ने वह CCTV कैमरा भी उठा लिया, जिसमें कथित तौर पर गैरकानूनी गतिविधियां रिकॉर्ड थीं। एजेंसी के मुताबिक, यह भी सबूत नष्ट करने की श्रेणी में आता है।

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सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग

एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि यह मामला असाधारण है और इसमें शीर्ष अदालत का हस्तक्षेप जरूरी है। एजेंसी का कहना है कि अगर इस तरह की घटनाओं पर रोक नहीं लगी, तो भविष्य में कोई भी राजनीतिक नेता खुलेआम कानून अपने हाथ में लेने से नहीं हिचकेगा।

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