
पूर्व जनरल एम एम नरवणे की किताब पर आधारित लेख लिखने वाले रणनीतिक मामलों के विश्लेषक सुशांत सिंह का कहना है कि उन्होंने यह लेख जनरल नरवणे की किताब की पांडुलिपि के आधार पर लिखा है। उनका कहना है कि इस किताब में काफी कुछ ऐसा है जिससे मोदी सरकार को और भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है। द वायर के लिए पत्रकार करण थापर को दिए एक इंटरव्यू में सुशांत सिंह ने किताब में कई और ऐसे संदर्भ हैं जो सरकार को शर्मिंदा कर सकते थे।
जैसा कि सर्वविदित है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हर मौके पर सेना की यूनिफॉर्म पहनने का शौक है। यह भी सार्वजनिक है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि जब 2019 में बालाकोट एयरस्ट्राइक हुई थी तो वे वॉर रूम में थे और हमले पर गहरी नजर रखे हुए थे। इस सिलसिले में उनका वह इंटरव्यू तो काफी मशहूर हुआ था जिसमें उन्होंने एयर फ़ोर्स को बादलों का फ़ायदा उठाने की सलाह दी थी। वैसे इस दावे का किसी ने कभी आधिकारिक तौर पर खंडन नहीं किया है।
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इसी तरह, ऑपरेशन सिंदूर से पहले प्रधानमंत्री की प्रचार टीम ने मोदी की सैन्य अधिकारियों के साथ ऑपरेशन की डिटेल्स पर चर्चा करते हुए तस्वीरें शेयर की थी। ऐसे में इतना सक्रिय रहने वाले प्रधानमंत्री का सेना प्रमुख से यह कहना कि, 'जो आपको उचित लगे, वह करो', वह भी जनरल नरवणे के निर्देश मांगने के दो घंटे बाद रक्षा मंत्री के ज़रिए, यह बात अजीब थी। यह शर्मनाक भी है क्योंकि ऐसा लग रहा था कि वह अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं।
हालांकि, करण थापर के साथ बातचीत में सुशांत सिंह ने दावा किया कि 'अप्रकाशित' किताब में यह एकमात्र शर्मनाक बात नहीं है, जिसे सरकार ने प्रकाशन के लिए मंज़ूरी नहीं दी है। सुशांत सिंह बताते हैं कि 2019 के ऑपरेशन बंदर (बालाकोट एयरस्ट्राइक का कोडनेम) और 2025 के ऑपरेशन सिंदूर (पाकिस्तान के साथ चार दिन की लड़ाई का नाम) के उलट, 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीनी घुसपैठ के बारे में बहुत कम या कोई जानकारी शेयर नहीं की गई है। दोनों मामलों की ऑपरेशनल डिटेल्स भारतीय सेना ने शेयर की थीं और रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों को इन ऑपरेशन के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया था, जिन्हें सरकार ने किताबें लिखने के लिए प्रोत्साहित किया था।
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लेकिन, भारत सरकार चीन के साथ लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन के साथ झड़पों के बारे में ब्योरा साझा करने में हिचकिचा रही है। सुशांत सिंह बताते हैं कि यही वजह है कि पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे (रिटायर्ड) के कथित तौर पर 'अप्रकाशित' संस्मरण ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
सितंबर 2024 में द इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए जवाब में, रक्षा मंत्रालय ने बताया कि उसके पास 2020 से 35 किताबों की मंजूरी के लिए उनके शीर्षक और पांडुलिपियां जमा की गई थीं। जनरल नरवणे की किताब को छोड़कर बाकी सभी किताबों के प्रकाशन की मंजूरी दे दी गई थी और वे सभी प्रकाशित भी हो गईं। असल में, जिन किताबों को मंज़ूरी मिली, उनमें से एक नॉर्दर्न कमांड के पूर्व प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल वाई. जोशी की भी थी, जिन्होंने 2020 में चीनियों के खिलाफ भारतीय सेना के ऑपरेशन्स के बारे में बहुत अच्छी बातें लिखी थीं। जनरल नरवणे का ब्यौरा लेफ्टिनेंट जनरल जोशी के ब्यौरे से काफी अलग है।
सुशांत सिंह ने करण थापर को बताया कि अगर जनरल नरवणे ने भी जीवनी लिखी होती और राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की तारीफ की होती, तो उन्हें लगता है कि उनके संस्मरण भी प्रकाशन के लिए मंजूर हो गए होते। लेकिन ऐसा लगता है कि इस किताब ने दोनों को ही शर्मिंदा किया है।
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सुशांत सिंह का कहना है कि इस किताब में सबसे चौंकाने वाले खुलासों में से एक यह है कि चीनी सैनिक मई, 2020 में भारतीय इलाके में घुसे थे, न कि जून, 2020 में जैसा कि आम तौर पर माना जाता है। पूर्व सेना प्रमुख के मुताबिक, चीनी सैनिकों ने गलवान घाटी में उस हाथ-पाई वाली लड़ाई से एक महीने पहले ही अपना टेंट लगा लिया था, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। नॉर्दर्न कमांड और 14वीं कोर के कमांडरों को घुसपैठ के बारे में पता था, लेकिन उन्होंने इसे ज़्यादा अहमियत नहीं दी। उन्होंने कहा कि जब बर्फ पिघलेगी और उस जगह पानी का लेवल बढ़ेगा, तो चीनी टेंट पानी में डूब जाएंगे।
लेकिन, 15 जून 2020 को भारतीय सैनिकों को आदेश दिया गया कि वे वहीं जाकर अपने टेंट लगाएं जहां चीनी पहले ही टेंट लगा चुके थे। इसी वजह से गलवान घाटी में झड़प हुई। हालांकि प्रोटोकॉल के अनुसार निहत्थे भारतीय सैनिकों को टेंट लगाने का आदेश किसने दिया, यह पता नहीं है। जनरल नरवणे ने भी अपने संस्मरण में यह खुलासा नहीं करते कि यह आदेश किसने दिया था। हालांकि, तत्कालीन सेना प्रमुख ने स्थानीय कमांडरों की कड़ी आलोचना की है और लिखा कि वे चीनी घुसपैठ से निपटने के लिए तैयार नहीं थे और उन्होंने स्थिति की गंभीरता को कम करके आंका।
सिंह का तर्क है कि मई 2020 में चीनी घुसपैठ गलत और उकसाने वाली थी, लेकिन बिना सही तैयारी, प्लानिंग या कोऑर्डिनेशन के एक महीने बाद जवाब देने का भारतीय फैसला एक बड़ी गलती साबित हुआ। जाहिर है, अब तक किसी की जवाबदेही तय नहीं की गई है।
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जनरल नरवणे इस किताब में यह भी बताते हैं कि भारतीय सेना को बॉर्डर पर कोर कमांडरों के स्तर पर हुई मीटिंग्स के मिनट्स रिकॉर्ड करने की इजाज़त नहीं थी। विदेश मंत्रालय ने तर्क दिया कि बॉर्डर पर बातचीत करना उसका काम है और सेना को मिनट्स नहीं रखने चाहिए। नतीजतन, कई मौकों पर चीन ने ऐसे कदम सुझाए जिन पर भारतीय पक्ष ने 'विचार' करने पर सहमति जताई, लेकिन चीन ने इसे 'सहमति' मान लिया। सिंह ने दावा किया कि बातचीत के 9वें दौर में ही, जब विदेश मंत्रालय के एक जॉइंट सेक्रेटरी बातचीत में शामिल हुए, तब मिनट्स रिकॉर्ड करना शुरू किया गया।
सुशांत सिंह का कहना है कि हमें शायद कभी पता न चले कि 2020 में भारत ने चीन को कितनी ज़मीन खो दी, क्योंकि लद्दाख में चीन के साथ बफर ज़ोन के लिए समझौते की बातचीत करने वालों की एक और शर्मनाक 'गलती' हुई। भारत सरकार इसे बफर-ज़ोन नहीं कहती, बल्कि इस समझौते को दोनों तरफ से पीछे हटना बताती है। हालांकि, जनरल नरवणे इसे बफर ज़ोन बताते हैं और अपने संस्मरण में कहते हैं कि भारतीय बातचीत करने वालों ने दोनों पक्षों के पांच किलोमीटर पीछे हटने पर सहमति जताई थी।
सिंह इस बात के रेखांकित करते हैं कि हालांकि, 2020 में चीनी सैनिक जहां तक आए थे, वहां से पांच किलोमीटर पीछे हट गए, लेकिन भारतीय सैनिक भी अपने इलाके में पांच किलोमीटर और पीछे हट गए। इसलिए, यह पूरी तरह मुमकिन है कि जिस बफर ज़ोन पर सहमति बनी है, वह पूरी तरह से भारतीय इलाके में है।
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