
केंद्र सरकार ने आज पेशर आर्थिक समीक्षा 2025-26 में माना है कि कानूनी प्रतिबंध के बावजूद हाथ से मैला ढोने का काम जारी है। साथ ही रिपोर्ट में अमानवीय स्वच्छता कार्यों में लगाए जाने वाले श्रमिकों के साथ ऐतिहासिक रूप से भेदभाव को भी स्वीकार किया गया है, जो आज भी जारी है। इस पर चिंता जताते हुए कहा गया है कि मौजूदा कानूनी और प्रशासनिक उपायों के बावजूद ऐसी प्रथाओं का बरकरार रहना गहरी सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं का संकेत देता है।
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संसद में गुरुवार को पेश की गई आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले कर्मियों (एसएसडब्ल्यू) में से अधिकतर वाल्मीकि, मेहतर, डोम, मडिगा, माला आदि सहित विशिष्ट जातियों से संबंधित हैं और उन्हें ऐतिहासिक रूप से भेदभाव का सामना करना पड़ा है। इसमें कहा गया है कि "इस तरह के जाति-आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए समाजव्यापी शैक्षिक और व्यवहार परिवर्तन संबंधी हस्तक्षेपों की आवश्यकता है ताकि रोजगार में भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त किया जा सके।’’
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समीक्षा में कहा गया है कि हाथ से मैला ढोने की प्रथा के उन्मूलन और श्रमिकों के सतत पुनर्वास के लिए नागरिक समाज की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। परिणामों में सुधार के लिए, समीक्षा में सुझाव दिया गया है कि शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) को प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों और अनुपालन नहीं करने पर दंड के माध्यम से जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। ये शहरी स्थानीय निकाय हाथ से मैला ढोने वाले श्रमिकों की पहचान करने और उन्हें लक्षित करने वाली योजनाओं को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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शौचालयों और सीवरों की सफाई के लिए काम करने वाले लोगों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए हाथ से मैला ढोने पर प्रतिबंध और पुनर्वास अधिनियम, 2013 लागू किया गया था। ऐसे में जब उच्चतम न्यायालय ने इस प्रथा को समाप्त करने के लिए लगातार आदेश दिए हैं और हाल ही में छह प्रमुख महानगरों में इस पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है- समीक्षा में कहा गया है कि इसका क्रियान्वयन अभी भी कमजोर है। न्यायालय ने सफाई कर्मचारियों की मृत्यु पर मुआवजे की राशि बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी है।
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आर्थिक समीक्षा में 'स्वच्छ सर्वेक्षण' ढांचे का उपयोग करने की सिफारिश की गई है, जिसमें वित्त वर्ष 2025 में 4,589 शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) को शामिल किया गया था, ताकि अपशिष्ट श्रमिकों और कचरा बीनने वालों के लिए देशव्यापी आधार रेखा बनायी जा सके। इसमें कहा गया है कि इससे संसाधनों का अधिक कुशल आवंटन और बेहतर योजना सुनिश्चित होगी।
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