
विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन ने ‘डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण’ (डीपीडीपी) अधिनियम की धारा 44(3) को निरस्त करने की मांग करते हुए दलील दी कि यह सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून को कमजोर करती है।
कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने यहां संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों के 120 से अधिक सांसदों ने इस धारा को निरस्त करने के लिए एक संयुक्त ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं और इसे सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को सौंपा जायेगा।
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संवाददाता सम्मेलन में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के नेता एमएम अब्दुल्ला, शिवसेना की नेता प्रियंका चतुर्वेदी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता जॉन ब्रिटास, समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता जावेद अली खान और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता नवल किशोर शामिल हुए।
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प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि आज डिजिटल प्लेटफॉर्म बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जिस तरह से सरकार घेराव की तैयारी कर रही, उससे खोजी पत्रकारिता को बहुत नुकसान होगा। ये बात मुझे कहने में कोई हिचक नहीं है कि देश का ब्रॉडकास्ट मीडिया कोलैप्स कर गया है। वो अब Spineless हो गया है। सरकार अब RTI Act को पूरी तरह से तबाह करने में जुटी हुई है। सरकार कई ऐसे प्रावधान लाई है, जिसके तहत अब जनता को जानकारी मिल ही नहीं पाएगी। ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। 2019 और 2021 में जब ये बिल लाने के कोशिश की गई थी, तब उनमें ये प्रावधान नहीं थे, लेकिन जब 2023 में मनमाने तरीके से बिल लाया गया, तब ये प्रावधान जोड़ दिए गए।
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गोगोई ने कहा कि नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने डीपीडीपी अधिनियम की धारा 44(3) का विरोध किया है, जिसके जरिये आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(जे) को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।
आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(जे) के तहत व्यक्तिगत जानकारी देने से रोकने की अनुमति दी गई है, यदि उसका खुलासा किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से संबंधित नहीं है या इससे निजता का अनुचित उल्लंघन होता है।
यह प्रतिबंध हालांकि एक महत्वपूर्ण सुरक्षा के अधीन है: यदि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी, राज्य लोक सूचना अधिकारी, या अपीलीय प्राधिकारी यह निर्धारित करते हैं कि सूचना का खुलासा करने से व्यापक जनहित में मदद मिलेगी, तो इसे उपलब्ध कराया जा सकता है।
डीपीडीपी अधिनियम की धारा 44(3) आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में संशोधन करती है, जो सरकारी निकायों को ‘‘व्यक्तिगत जानकारी’’ देने से प्रतिबंधित करती है, जिसमें सार्वजनिक हित या किसी अन्य अपवाद पर विचार नहीं किया जाता है।
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