हालात

कश्मीर के लोगों को नहीं रखा जा सकता लंबे समय तक खामोशः अथर जिया

अथर जिया का कहना है कि कश्मीर को लेकर भारत में एक ‘स्वीकृत अज्ञानता’ है। यही कारण है कि लोगों को लगता है कि हमारे बारे में हमेशा बोला जाता है लेकिन हम नहीं बोलते। सच्चाई यह है कि कश्मीरियों ने इतने लंबे समय तक अपने को अभिव्यक्त किया है।

कश्मीर के लोगों को नहीं रखा जा सकता लंबे समय तक खामोश
कश्मीर के लोगों को नहीं रखा जा सकता लंबे समय तक खामोश फाइल फोटोः सोशल मीडिया

आज जम्मू-कश्मीर के विभाजन और अनुच्छेद 370 को खत्म किए चार साल पूरे हो गए हैं। करीब चार साल बाद 2 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है, जिसके बाद एक बार फिर कश्मीर के बारे में लोगों की ‘स्वीकृत अज्ञानता’, कश्मीर में क्या गलत हुआ और आगे वहां क्या-कुछ हो सकता है पर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है। इन सब मुद्दों पर राजनीतिक मानव विज्ञानी, ऐक्टिविस्ट और कवयित्री अथर जिया ने नवजीवन के लिए संपूर्णा चटर्जी से विशेष बातचीत की। अथर जिया यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न कोलोराडो में पढ़ाती हैं। कश्मीरी और प्रवासी लेखन की ऑनलाइन पत्रिका ‘कश्मीर लिट’ की संस्थापक-संपादक अथर ‘क्रिटिकल कश्मीर स्टडीज कलेक्टिव’ की भी सह-संस्थापक हैं जो कश्मीर क्षेत्र पर काम करने वाले बुद्धिजीवियों का एक नेटवर्क है। अथर जिया ‘ए डेसोलेशन कॉल्ड पीस: वॉयसेज फ्रॉम कश्मीर’ (हार्पर कॉलिन्स, 2019) की सह-संपादक और ‘रेजिस्टिंग डिसअपीयरेंस: मिलिट्री ऑक्यूपेशन एंड वीमेन एक्टिविज्म इन कश्मीर’ (जुबान, 2021) की लेखिका भी हैं। पेश है उनके साथ कश्मीर और वहां के हालात को लेकर हुई पूरी बाचतीच

प्रश्न: अथर, सबसे पहले तो समय निकालकर बात करने के लिए धन्यवाद। जैसा आप जानती हैं, अनुच्छेद 370 को खत्म करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। हालिया घटनाओं के मद्देनजर कश्मीर का भविष्य कैसा दिखता है?

उत्तर: अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करना फिर से विलय जैसा होगा क्योंकि अनुच्छेद 35-ए जो क्षेत्रीय संप्रभुता और स्थायी निवास को (संरक्षित) करता था, अब खत्म हो चुका है। बहुत से कश्मीरियों के लिए, अनुच्छेद 370 का कोई खास मतलब नहीं था क्योंकि इसकी धार तो पहले ही पूरी तरह कुंद हो चुकी थी। विरोध करने वाले नेताओं ने इस बात का विरोध किया होगा कि 370 को सैन्य और एकतरफा तरीके से कैसे हटा दिया गया लेकिन मुझे नहीं लगता कि उनके लिए इसका कोई और मतलब था क्योंकि उनके लिए मूल बात है आजादी। हां, 35-ए को लेकर चिंता जरूर थी क्योंकि यह केन्द्र सरकार को वहां बसने वालों के मामले में खुला रास्ता देता है और वह ऐसा ही कर रही है। तमाम कोशिशों के साथ अब भूमिहीन लोगों को जमीन देने की बात चल रही है। कश्मीरी इसे जनसांख्यिकी को बदलने वाले प्रोजेक्ट के तौर पर देखते हैं। अभी जिन याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, उनके बारे में मुखर रहने वाले ज्यादातर लोग ‘भारत समर्थक’ नेता हैं, जैसे कि महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला। मौजूदा व्यवस्था के लिए वे बेहद सुलभ हैं।

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प्रश्न. आप भारत से बाहर रहती हैं। क्या यह दूरी आपको उस तरह खुलकर बोलने की छूट देती है जैसा दूसरे कश्मीरी नहीं कर सकते?

उत्तर मैं अमेरिकी शिक्षा जगत का हिस्सा हूं जहां लेखन, शोध और बोलने की अकादमिक आजादी दी जाती है। किसी भी कश्मीरी के लिए कश्मीर के बारे में लिखना एक जोखिम भरा काम है; दूरी एक तरह की सुरक्षा का भरोसा जरूर देती है लेकिन यह सुरक्षित ही हो, जरूरी नहीं और इसकी भी एक कीमत है। कश्मीरी और गैर-कश्मीरी- दोनों तरह के शिक्षाविदों ने कश्मीर पर आलोचनात्मक अध्ययन के लिए पिछले दो दशकों के दौरान कड़ी मेहनत की है। एक उप-विषय के रूप में यह इस बात पर जोर देता है कि हम इतिहास और कश्मीरियों के रोजमर्रा के प्रतिरोध को प्राथमिकता दें; यह दक्षिण एशियाई अध्ययनों में कश्मीर पर भारतीय नैरेटिव की छाया का दृढ़तापूर्वक विरोध करता है। कश्मीर के इतिहास, इसकी सांस्कृतिक विरासत और कश्मीरियों की निजी कहानियों पर आधारित यह महत्वपूर्ण शोध परिप्रेक्ष्य महत्वपूर्ण है। नैरेटिव को पुन: स्थापित करने के लिहाज से ये बड़े आधारभूत तत्व हैं। पिछले 70 से ज्यादा सालों से कश्मीर में कश्मीरियों ने जो लिखा, जो बोला, उसमें ये भी जुड़ते हैं। यह और बात है कि कश्मीरियों के लिखे-बोले को अक्सर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाशिये पर ही रखा गया है।

प्रश्न. यह सोचते हुए कि आप एक ऐक्टिविस्ट हैं, आप इससे जुड़ी गतिविधियों को भूलने की बीमारी के प्रतिरोध के रूप में कैसे देखती हैं? मैंने जबरन गायब कर दिए गए कश्मीरियों के बारे में आपकी रचनाओं को पढ़ना चाहा लेकिन गूगल करने पर ‘एरर... नॉट फाउंड’ के अलावा कुछ नहीं मिल सका...

उत्तर. ‘कश्मीर लिट’ एक वेब पत्रिका है जिसे मैंने 2008 में शुरू किया था और इसे हैक हो जाने की आदत है। कई कश्मीरी साइटें अक्सर हैक या ब्लॉक कर दी जाती हैं; मेरे सहित तमाम ट्विटर अकाउंट भारत में प्रतिबंधित हैं; मेरा फेसबुक अकाउंट डिलीट कर दिया गया और इंस्टाग्राम पर रोक लगा दी गई। मुझे और मेरी तरह के तमाम दूसरी असहमत आवाजों का गला घोंटने की कोशिशों में पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न भी शामिल है। ‘कश्मीर लिट’ साहित्य, कविता और कला को समर्पित है लेकिन, जैसा कि हम सब जानते हैं, ज्यादातर कला राजनीतिक होती है। जब हमने पहली बार बात की थी, तो आपने कश्मीरी लेखन के गायब हो जाने पर मेरे दो लेखों को नहीं पढ़ पाने की शिकायत की थी। ये लेख इस बारे में थे कि कैसे कश्मीरी लेखन और कश्मीरी लेखकों पर हमले हो रहे हैं। कश्मीरी पत्रकारों ने जब देखा कि उनकी पूरी रचना इंटरनेट से ‘गायब’ हो गई है, तब उन्हें माजरा समझ आया। ये रिपोर्टें ज्यादातर कश्मीर की वास्तविक जमीनी हालात पर थीं। कश्मीर के अखबारों के पुराने संग्रह को गायब करने की साजिश कश्मीर पर भारतीय नैरेटिव को स्थापित करने और कश्मीरियों की आवाज को दबाने के लिए की गई है। जैसा कि एक कश्मीरी पत्रकार कहते हैं, इसका मतलब है, ‘कश्मीर के हालात के बारे में हकीकत और जानकारी को खत्म कर देना।’ मुझे नहीं पता कि मैं साइट को फिर से पूरी तरह बहाल कर पाऊंगी या नहीं या आगे क्या होगा। यह 15 सालों की बेशकीमती यादें हैं। बेशक अभिलेखों को खोना जिंदगी खोने की तुलना में बड़ी त्रासदी नहीं है लेकिन अभिलेख यादें हैं और ‘कैद’ लोगों के लिए यादें ही सबकुछ होती हैं।

प्रश्न. ‘रेजिस्टिंग डिसएपियरेंस’ में, आपने उन औरतों के बारे में लिखा है जो अपने घरों के दरवाजे हमेशा खुला रखती हैं कि न जाने कब उनका लापता रिश्तेदार वापस आ जाए। ऐसा महसूस होता है जैसे हमारे मुंह पर यह दरवाजा जोर से बंद कर दिया गया हो। चीजों और लोगों को जानबूझकर गायब किया जा रहा है, ताकि लोग भूल जाएं। इस थोपी गई भूलने की बीमारी के बरक्स हमें क्या करना चाहिए कि ये चर्चा में जिंदा रहें?

उत्तर. यह सब ज्यादा नहीं चलने वाला- इतने सारे लोगों पर ऐसा जुल्म! यहां तक कि हमारे घटते सहयोगी जो वास्तव में हमारे लिए वहां रहना चाहते हैं, वे भी अपनी गर्दन नहीं निकाल सकते… वे निगरानी में हैं और कई हिरासत में। कश्मीर पर मुखर रहने वाले हमारे सहयोगी खामोश हैं। हमें एक झटका मिला है... आप अपनी तरफ, मैं अपनी तरफ।

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प्रश्न. उन लोगों से बात करना कैसा लगता है जिन्हें आपके द्वारा बताई गई बातों का पूरा संदर्भ पता नहीं होता? क्या आपको अक्सर नासमझी के खालीपन या फिर स्पष्ट आक्रामकता के माहौल में बात करनी पड़ती है?

उत्तर. लोगों को ऐतिहासिक रूप से सोचने, इतिहास में जाकर चीजों को देखने के लिए कहने के पीछे बड़ी वजह है। आप स्पिविक शब्द ‘स्वीकृत अज्ञानता’ के बारे में जानती होंगी, यह इन हालात में एकदम सही बैठता है। कश्मीर को लेकर भारत में एक ‘स्वीकृत अज्ञानता’ है। यही कारण है कि आपको लगता है कि हमारे बारे में हमेशा बोला जाता है लेकिन हम ही नहीं बोलते... सच्चाई यह है कि कश्मीरियों ने इतने लंबे समय तक अपने को अभिव्यक्त किया है… यह कश्मीर में हर कोई जानता है। सैयद अली गिलानी ने 40 से अधिक किताबें लिखीं जिनमें तीन खंडों वाला एक संस्मरण भी शामिल है। उनके जैसे कई कश्मीरियों ने भारत को एक ‘राजशाही’, नव-औपनिवेशिक ताकत बताया है। यह खिड़की यह समझने के लिए काफी है कि कश्मीर में क्या हो रहा है; यहां तक कि कैसे लोकतंत्र को औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

कश्मीर के हालात के बारे में हमें रचनात्मक रूप से सोचना होगा। यह कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। लेकिन जो भी हल हो, वह यहां के मुताबिक होना चाहिए, ऐसा नहीं कि यह वेस्टफेलियन मॉडल (हर देश की अपने भौगोलिक इलाकों पर विशेष और पूर्ण संप्रभुता है) को आंखें मूंदकर मानते हुए निकाला जाए, भारत खुद इसी मॉडल का उदाहरण है। यूरोप की ज्यादातर लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था उन सिद्धांतों पर टिकी हैं जिन्हें वॉल्टर बेंजामिन ने ‘संस्थापक हिंसा’ या ‘कानून बनाने वाली हिंसा’ कहा है और यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी जगह के मूल जीवन को खत्म करना नए कानूनी, सांस्कृतिक, राजनीतिक मानदंडों वाला संविधान बनाने में सक्षम बनाता है। संस्थापक हिंसा लोकतांत्रिक संप्रभुता, लोकतंत्र के उपनिवेशीकरण का आधार बनती है जो चुनाव जैसे सांकेतिक लोकतांत्रिक उपकरणों की आड़ में उपनिवेशवाद को छिपा लेती है। भारत की स्थापना के बाद से कश्मीर का ‘लोकतांत्रिक उपनिवेशीकरण’ साल 2019 में अपने चरम पर पहुंच गया जब भारत ने फौजी ताकत के बूते कश्मीर की स्वायत्तता और क्षेत्रीय संप्रभुता को खत्म कर दिया।

कश्मीर के बारे में एक स्वीकृत अज्ञानता है - यह कश्मीर को गलत समझने, कश्मीर के बारे में एक गैर-ऐतिहासिक नजरिया बनाने, यह कहने के लिए कि कश्मीर में एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है, कश्मीरियों को यह कहकर बेवकूफ बनाया जाता है कि पाकिस्तान हमें बरगला सकता है और सिर्फ पाकिस्तान हमें बरगलाता है, भारत नहीं…।

भारत के लोगों का कश्मीर के साथ ऐतिहासिक जुड़ाव होना चाहिए। मैंने ‘ए डेसोलेशन कॉल्ड पीस’ को संपादित किया। कश्मीर में बहुत कुछ लिखा गया है जो कश्मीर के बाहर भारत के दूसरे हिस्सों तक कभी नहीं पहुंच पाया। शायद इसलिए कि यह कश्मीर पर भारतीय नैरेटिव के अनुकूल नहीं था। यह आज भी हो रहा है। खबर है कि आगा शाहिद अली की कविता और बशारत पीर की ‘कर्फ्यूड नाइट’ को कश्मीर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पाठ्यक्रम से हटाया जा रहा है।

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प्रश्न. हम उन व्यंग्यचित्रों से परे कैसे जा सकते हैं जो जानकारी के लिहाज से उन लोगों के लिए भी उपयोगी हैं जिन्हें लगता है कि वे कश्मीर को जानते हैं?

उत्तर. कश्मीर को इतने गैर-ऐतिहासिक तरीके से पेश किया गया है, मानो 1947 से पहले इसका कोई वजूद ही नहीं था। भारतीयों को समझना होगा कि भारत, जैसा कि हम आज देखते हैं, अंग्रेजों द्वारा एक साथ मिला दिए गए इलाकों से बना है। मुझे ‘विभाजन’ शब्द से दिक्कत है। मैं इस बड़ी त्रासदी को एक मिनट के लिए भी नजरअंदाज नहीं कर पाती। जब हम ‘विभाजन’ कहते हैं, तो हम एक तरह से वही कह रहे होते हैं जो खास तौर पर यह सरकार कहती है- हम 5,000 साल पुरानी किसी सभ्यता का खाका खींचते हैं, जैसे कि उपमहाद्वीप में हर देश में एक ही धर्म रहा हो… यहां तक कि जिसे मौजूदा समय में ‘हिन्दू’ धर्म कहा जाता है, वह तब इस तरह वजूद में नहीं था जैसे आज है। वे भूल जाते हैं कि जो ‘विभाजित’ हुआ था, वह ब्रिटिश भारत और रियासतें थीं। ब्रिटिश उपनिवेश 750 से ज्यादा रियासतों से बना था जिनमें कुछ जागीरदार थे, कुछ स्वतंत्र थे। कश्मीर स्वतंत्र था। मैं किसी ‘तानाशाह’ का बचाव नहीं कर रही लेकिन हमें समझना होगा कि 1947 के बाद दुनिया का पाला ‘राष्ट्र राज्यों’ से पड़ रहा है जो एक बहुत ही नई अवधारणा है। पहले देशों का अस्तित्व वैसा नहीं था जैसा अब है। हमें यह समझना चाहिए कि भारत का निर्माण कैसे हुआ और यह भी कि जिस तरह से वह कश्मीर के साथ जुड़ा है, वह औपनिवेशिक दौर का नतीजा है।

1947 में कश्मीर की घटनाओं के बारे में बात करते हुए कश्मीर के विद्वानों ने एक और अहम सवाल उठाया है, वह यह है कि भाग निकलने वाले डोगरा तानाशाह (जो बंबई चले गए) के फैसलों पर ही पूरा विमर्श केन्द्रित रहा, न कि उन कश्मीरियों पर जिन्होंने भारतीय सेना के खिलाफ आजाद कश्मीर के लिए लड़ाई लड़ी और जिनकी मदद पाकिस्तान और एनडब्लूएफपी के लोगों- कबायलियों- ने भी की थी। ‘कबायली’ का सीधा मतलब है रिश्तेदार या कुलवासी। लेकिन भारतीय नैरेटिव में इसे अपमानजनक रूप से ‘हमलावरों’ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। भारत में यह धारणा व्यापक रूप से प्रचलित है और कश्मीर के अंदर भारतीय नेता भी इसे ही प्रचारित करते हैं। जातीय कबीलों के पुंछ के लोगों के साथ पुराने पारिवारिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ते थे और वे डोगरा राजा को दी गई माफी के खिलाफ अपने लोगों के साथ मिलकर लड़ने के लिए उत्साहित थे। वे जम्मू में सांप्रदायिक हिंसा का मुकाबला करने आए थे जो निरंकुश राजा के इशारे पर हुई थी और जिसे आरएसएस से भी मदद मिली थी। भारत के नैरेटिव से जम्मू का यह नरसंहार या ‘पूरब का होलोकास्ट’ सिरे से गायब है।

कश्मीर को समझने के लिए, भारत के लोगों को जमीनी स्तर पर कश्मीरियों, लेखकों, विद्वानों और कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ना होगा। भारत का नैरेटिव लोकतांत्रिक संप्रभुता के लिए कश्मीर की ऐतिहासिक मांग को दबाता है। उन नैरेटिव पर भी गौर करने की जरूरत है जो कश्मीर के अपने प्रतिरोध को ‘छद्म युद्ध’ के रूप में गैर-ऐतिहासिक चित्रण को चुनौती देते हैं और इसे ‘इस्लामिक आतंकवाद’ की गलत रूढ़िवादिता तक सीमित कर देते हैं।

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प्रश्न. आप नृवंशविज्ञानी (एथनोग्राफर), संपादक, कवयित्री हैं... जीवन के भावनात्मक परिदृश्यों से जुड़े कई तरीके हैं आपसे पास। उस परिदृश्य को संसाधित कैसे कर सकते हैं?

उत्तर. कविता गवाही देने का एक तरीका है लेकिन मुझे अपनी कविताओं को अपने नृवंशविज्ञान कार्य में शामिल करने से जान-बूझकर रोका गया। जब आप मूलत: एक मानवविज्ञानी होते हैं, तो आप अलग तरह से काम करते हैं। मुझे याद है कि नब्बे के दशक की शुरुआत में मेरी राजनीतिक चेतना कैसे आकार ले रही थी, कैसे मैं उन पड़ोसियों और भाइयों के बारे में सोचने लगी था जो ‘गायब’ हो गए थे। तमाम मानवाधिकारों के हनन के साथ जबरन लोगों को गायब कर देना बड़े पैमाने पर हुआ। पड़ोस में एक महिला थीं। वह अपने बरामदे में बैठकर कोलार्ड ग्रीन्स (एक कश्मीरी साग) साफ करती थी। वह हमेशा पूछा करतीं, ‘आप कैसी हैं?’ फिर अचानक, नब्बे के दशक की शुरुआत में, वह हर आने-जाने वाले से पूछने लगी थीं कि क्या उन्होंने उसके बेटे को कहीं देखा है। मुझे बाद में पता चला कि उसे सेना ले गई थी। वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठी थी। लोग अपने परिवार के सदस्यों, बच्चों को खो रहे थे और जबरन गायब किए जाने की यह त्रासदी मेरे अंदर समा गई थी। यह मारे जाने जैसा नहीं जिसमें शव तो दिखता है। नागरिक और राजनीतिक बुनियादी अधिकारों की कमी और बेतरह जुल्म कश्मीर, उसके इतिहास, सियासत और लंबे अरसे से चल रहे जद्दोजहद को देखने की एक खिड़की बन गए।

प्रश्न. आप इसे ‘नृवंशविज्ञान कविता को नैतिक अतिशयोक्ति का प्रमाण’ कहती हैं...

उत्तर. एक देशी नृवंशविज्ञानी के लिए, पर्यवेक्षक और प्रेक्षित के बीच रेखा खींचना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी कविताओं में यह जाहिर होता है। जो होता है, उसे देखने के तमाम तरीके होते हैं। लेकिन इसके लिए स्थूल तरीके से कहीं ज्यादा सहानुभूति के साथ देखने की जरूरत है। इस अतिरेक को ‘नैतिक’ करार देते हुए, मैंने इस बात पर जोर दिया कि कविता को भी सबूत के तौर पर देखना चाहिए। मैंने तर्क दिया कि एक नृवंशविज्ञानी-कवि के साक्ष्य के संदर्भ में अवलोकन से तैयार की गई ‘नृवंशविज्ञान कविता’ डेटा बन जाती है।

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प्रश्न. जीवन जीने के तरीके के रूप में जो मौजूद है, उसे हमेशा सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए कोई क्या कर सकता है?

उत्तर. काश, मैं ऐसे समाज से होती, जहां मैं मैरी ओलिवर की तरह जीवन के बारे में, अजीब-गरीब हरकतें कर रही बिल्ली के बारे में या वहां से गुजरते हुए कलहंसों के झुंड के बारे में लिख पाती। मैंने एक महिला के रूप में अपने जीवन के बारे में, घर-गृहस्थी, पितृसत्ता, मातृत्व, अमेरिका में कश्मीरी-मुसलमानों में व्याप्त अंतर्विरोधों के बारे में बहुत कुछ लिखा है और यहां तक कि वे राजनीतिक भी हैं। लेकिन जब मैं छपने के लिए लिखती हूं तो उन कविताओं पर ध्यान नहीं दे पाती क्योंकि कश्मीर के अंदर और बाहर कई कश्मीरी लेखकों की तरह, हमारा मुख्य ध्यान प्रतिरोध साहित्य में योगदान देना है- क्योंकि यह जरूरी है। कला विलासिता भर नहीं, एक जरूरत बन गई है।

2008 के बाद के दौर को हम कश्मीर में ‘दूसरा इंतिफादा’ (पहला इंतिफादा वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में इजरायली कब्जे को खत्म कर स्वतंत्र फिलस्तीन बनाने के लिए हुआ विद्रोह था) कहते हैं, जब हमने कला, फिल्में, ग्राफिक उपन्यास बनाने पर भारी निवेश किया। बहुत कुछ हो रहा था, लेकिन 2016 के बाद, इस तरह की ज्यादातर अभिव्यक्तियों पर अंकुश लगा दिया गया है और यह गंभीर खतरे में है। सख्त खामोशी है लेकिन लोगों को लंबे समय तक खामोश नहीं रखा जा सकता।

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