
संसद में गुरुवार को प्रस्तुत वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में लगभग दो दशक पुराने आरटीआई कानून का फिर से अध्ययन करने की वकालत की गई है, ताकि गोपनीय रिपोर्ट और मसौदों को सार्वजनिक किए जाने से छूट प्राप्त हो। आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम 2005 का मकसद कभी भी इसे व्यर्थ की जिज्ञासा का उपकरण बनाने का नहीं था, न ही बाहर से सरकार के प्रबंधन का प्रयास करना था।
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आर्थिक समीक्षा में कहा गया, ‘‘लगभग दो दशक बाद, आरटीआई अधिनियम के फिर से अध्ययन की जरूरत हो सकती है। इसकी भावना को कमतर करने के लिए नहीं, बल्कि इसे वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप करने, नयी सीखों को आत्मसात करने और इसे इसके मूल इरादे से मजबूती से जोड़े रखने के लिए।’’
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समीक्षा में कहा गया है कि आरटीआई कानून में कुछ संभावित बदलाव किए जा सकते हैं। इसमें कहा गया है कि एक और विकल्प यह हो सकता है कि सेवा रिकॉर्ड, स्थानांतरण, और गोपनीय स्टाफ रिपोर्ट को ऐसे सामान्य अनुरोध से बचाया जाए जो सार्वजनिक हित में बहुत कम मूल्य की हैं। समीक्षा के अनुसार यह भी हो सकता है कि एक परिभाषित मंत्रिस्तरीय वीटो का पता लगाया जाए, जो संसदीय निगरानी के अधीन हो, ताकि ऐसे खुलासों से बचा जा सके जो शासन में अनुचित रूप से बाधा डाल सकते हैं।
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इसमें कहा गया है कि कानून को अपने आप में एक अंत के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत करने के एक साधन के रूप में सबसे अच्छी तरह समझा जाता है। इसमें यह भी कहा गया है, ‘‘खुलेपन और स्पष्टवादिता के बीच संतुलन आरटीआई कानून को उसके उद्देश्य के प्रति सच्चा रखेगा।’’
नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार का विचार केवल भारत का ही नहीं है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार, स्वीडन ने 1766 में दुनिया का पहला सूचना की स्वतंत्रता कानून लाकर इसकी शुरुआत की। अमेरिका ने 1966 में अपना ऐसा कानून लागू किया, और ब्रिटेन ने 2000 में इसे अपनाया।
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आर्थिक समीक्षा के अनुसार, दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने बाद में माना कि उन्हें इसे लागू करने का पछतावा है, इसलिए नहीं कि वह जवाबदेही के खिलाफ थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें लगा कि इससे शासन में व्यवधान पैदा हुआ। इसमें कहा गया है कि वैश्विक अनुभव से पता चलता है कि पारदर्शिता तब सबसे अच्छा काम करती है जब इसे खुली चर्चा के लिए संभावना के साथ जोड़ा जाता है।
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