
ये तीन स्थितियां हैं। इनसे समझ जाइए कि आने वाले दिन कैसे हो सकते हैं।
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ये केवल बानगी भर हैं और इनसे ही अंदाजा लग सकता है कि आने वाले दिनों में कैसे दूध से लेकर सब्जियों, फलों की कीमतें कैसे और क्यों बढ़ती जाएंगी और इसके साथ ही, आने वाले दिनों में किसान कैसे मुश्किल में पड़ते जाएंगे। सबसे अधिक प्रभावित गन्ना किसान दिखाई दे रहा है। मुजफ्फरनगर के रसूलपुर जाटान के किसान सचिन मलिक बताते हैं कि पूरा गन्ना मिल पर नहीं जा पाता। बचे गन्ने को गुड़ के कोल्हू पर बेचना मजबूरी है।
लेकिन होली के बाद से कोल्हू चले ही नहीं। पहले वे बारिश की वजह से बंद रहे, उसके बाद कोरोना के चक्कर में लेबर को पुलिस ने भगा दिया। अब सरकार की तरफ से कोल्हू चलाने की मनाही नहीं है, लेकिन गुड़ का उठान न होने की वजह से इलाके में इक्का-दुक्का कोल्हू ही चल रहे हैं। वहां भी गन्ने का रेट सरकार के रेट से बहुत कम है। इस दौरान किसानों को 75 से 100 रुपये प्रति क्विंटल कम रेट पर गन्ना बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है।
खेती के जानकार धर्मेंद्र मलिक का कहना है कि पश्चिम में सबसे ज्यादा घाटे में गन्ना किसान रहने वाले हैं। एक तो मिलों में भी लेबर कम होने की वजह से पिराई कम हो रही है। वहीं, राजस्थान से आने वाले सल्फर और भट्टी चूना की कम आवक से मिल चलाने का भी संकट खड़ा हो गया है। सरकार ने भले ही मिलों को ईंधन की ढुलाई के लिए राहत दी है, लेकिन खदानों में मजदूर कम होने से दिक्कत हो रही है। हालात यही रहे तो चीनी मिलों को चलाना मुश्किल हो जाएगा। अभी जो स्थिति है, उसमें 25 से 30 फीसदी तक गन्ना खेत में ही खड़ा है।
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पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में गेहूं और सरसों की कटाई शुरू हो चुकी है। सरकार ने भी एक अप्रैल से फसल उठाने का कार्यक्रम तय किया था, लेकिन अब कोरोना की मार की वजह से इसकी तारीख में संशोधन करना पड़ा है। हरियाणा सरकार ने अब 15 अप्रैल से सरसों और 20 अप्रैल से गेहूं खरीद करने की घोषणा की है। साथ ही कहा है कि अगर किसान अपने पास फसल रखता है, तो उसे 50 से 100 रुपये प्रति क्विंटल सब्सिडी दी जाएगी। बाकी राज्यों ने भी लॉकडाउन के बाद 15 अप्रैल से गेहूं और सरसों की खरीद का लक्ष्य रखा है।
देश भर में 341.32 लाख टन खरीद में अकेले पंजाब में पिछले साल केंद्रीय पूल के लिए 129.12 लाख टन की खरीद का लक्ष्य था, जबकि मध्यप्रदेश का योगदान केवल 67.25 लाख टन था। पंजाब में गेहूं किसानों का रजिस्ट्रेशन का भी प्रावधान नहीं है। यहां गेहूं की खरीद आढ़तियों के माध्यम से की जाती है। पंजाब में करीब 200 मंडियों में 3 से 4 लाख दिहाड़ी मजदूरों की जरूरत पड़ती है। ये मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल से आते हैं। कोरोना की वजह से अधिकांश मजदूर पलायन कर चुके हैं, ऐसे में गेहूं खरीद, बोरी में भरवाना और ट्रक में लदवाने के साथ सरकारी गोदामों तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आने वाली है। बाड़दाना यानि गेहूं और सरसों के लिए टाट की बोरी की कमी भी किसान और सरकार को परेशानी में डालेगी।
यही हाल उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी होना तय है। इसमें किसानों को दोहरी मार पड़ेगी। एक, उसे खेत से फसल उठाकर मंडी तक लाने में पसीना बहाना पड़ेगा और उसके बाद बिचैलिये के हाथों एमएसपी से कम दाम पर फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। महाराष्ट्र में खेती-किसानी के जानकार और किसान संगठन से जुड़े विजय जवांधिया का कहना है कि गेहूं और गन्ना के अलावा कपास, सोयाबीन और मक्का के किसानों की हालत भी खराब है।
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उन्होंने बताया कि 5,000 रुपये क्विंटल वाला सोयाबीन 3,500 से 3,600 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। इसी तरह 1,800 रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाला मक्का 1,300 रुपये में बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। इसका कारण पाॅल्ट्री फार्म में इसकी खपत कम होने से इसके दाम नीचे आ गए हैं। यही हाल मसूर, चना और अन्य तिलहन फसलों का भी हो रहा है। इससे पहले खराब मौसम और ओलावृष्टि ने पहले से ही गेहूं और दहलन-तिलहन की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है।
इसका गणित इस बात से भी समझा जा सकता है कि इस बार सरसों का एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) सरकार ने 4,425 रुपये निर्धारित किया है, लेकिन हकीकत यह है कि राजस्थान और अलवर की मंडियों में उसके दाम गिरकर 3,600 रुपये प्रति क्विंटल आ चुके हैं। यही हाल चने का भी हो रहा है। महाराष्ट्र और लातूर की मंडियों में चने के दाम गिरकर 3,650 रुपये प्रति कुंतल आ गए हैं, जबकि चने का एमएसपी 4,875 रुपये प्रति कुंतल निर्धारित किया गया है।
कोरोना की वजह से गांव ही नहीं शहर के किसान भी मुसीबत में हैं। दिल्ली और आसपास के महानगरों के बीच में आए गांव के किसान अधिकांश फूल-फल, साग-सब्जी उगाने के साथ डेयरी के कारोबार में लगे हैं। कृषि विशेषज्ञ युद्धवीर सिंह का कहना है कि सरकारों को इन शहरी मझोले किसानों और खेतिहर किसानों की ओर ध्यान देना होगा, क्योंकि सीमाएं सील होने से अपनी फसल को मंडियों तक पहुंचाने में किसान पापड़ बेल रहा है। पुलिस के रवैये से उसका काम धंधा चौपट हो गया है। फूल उगाने वाला किसान तो चौपट ही हो गया। सब्जियां खेत से उठ नहीं रहीं, फिर भी मंडियों में रेट बढ़ रहे हैं। तुरंत इन मुनाफाखोरों पर रोक लगाने की जरूरत है। वहीं, दूध के व्यवसाय में लगे किसानों को जानवरों के लिए चारे का प्रबंध करने में मदद करनी होगी, वरना वह भी घाटे में कब तक धंधा करेगा। शहरों में पशु चारा और जानवरों की खाद्य सामग्री के रेट बेतहाशा बढ़ गए हैं।
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