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देश जाग चुका है, कोई हमारी स्वतंत्रता और संविधान नहीं छीन सकताः उद्धव ठाकरे

वहीं शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र 'सामना' में कहा कि स्वतंत्रता दिवस हमेशा की तरह मनाया गया, लेकिन पिछले एक दशक में देश के इस राष्ट्रीय पर्व ने तेजी से राजनीतिक और उत्सव जैसा रूप ले लिया है, मानो यह सत्ताधारी बीजेपी या आरएसएस का कोई कार्यक्रम हो।

देश जाग चुका है, कोई हमारी स्वतंत्रता और संविधान नहीं छीन सकताः उद्धव ठाकरे
देश जाग चुका है, कोई हमारी स्वतंत्रता और संविधान नहीं छीन सकताः उद्धव ठाकरे फोटोः @ShivSenaUBT_

शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने शनिवार को मुंबई में पार्टी मुख्यालय शिवसेना भवन के बाहर तिरंगा फहराने के बाद कहा कि देश जाग चुका है और कई कोशिशों के बावजूद अब कोई भी हमारे संविधान और नागरिकों की स्वतंत्रता को नहीं छीन सकता है। माना जा रहा है कि उनका यह बयान युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में है।

उन्होंने कहा, “देश जाग चुका है और अब कोई हमारे संविधान या स्वतंत्रता को छूने की कोशिश नहीं करेगा। कई कोशिशों के बावजूद कोई हमारी स्वतंत्रता नहीं छीन सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम न तो अंदरूनी लोगों के और न ही बाहरी लोगों के गुलाम बनेंगे। जिनके लिए यह संदेश है, हम उन्हें यह संदेश दे रहे हैं।” ठाकरे ने दिल्ली और मुंबई में प्रदर्शन कर रहे युवाओं को शिवसेना (यूबीटी) का समर्थन दिया था।

राष्ट्रीय पर्व बीजेपी-आरएसएस के कार्यक्रम बने

वहीं शिवसेना (यूबीटी) ने शनिवार को अपने मुखपत्र 'सामना' में कहा कि भारत का स्वतंत्रता दिवस हमेशा की तरह मनाया गया, लेकिन पिछले एक दशक में देश के इस राष्ट्रीय पर्व ने तेजी से राजनीतिक और उत्सव जैसा रूप ले लिया है, मानो यह सत्ताधारी बीजेपी या आरएसएस का कोई कार्यक्रम हो। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले पर मंच संभालते हैं तो उनकी पारंपरिक पगड़ी और पहनावे का चुनाव आने वाले राज्य चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया लगता है। स्वतंत्रता दिवस पर भी सरकार के कामों में राजनीतिक फायदे-नुकसान की सोच दिखती है और इस मौके पर बीजेपी प्रायोजित कार्यक्रम किए जाते हैं।

संपादकीय में आगे कहा गया, "जश्न से पहले पार्टी ने बड़े पैमाने पर प्रचार के साथ 'तिरंगा यात्रा' अभियान चलाया। भव्य रैलियों का मकसद सत्ताधारी पार्टी को भारतीय तिरंगे का मुख्य निर्माता और रक्षक दिखाना था और ऐसा माहौल बनाया गया जैसे भारत में राष्ट्रीय ध्वज पहली बार फहराया जा रहा हो।"

बीजेपी का मूल संगठन आजादी की लड़ाई से दूर था

'सामना' ने मौजूदा राजनीतिक अभियानों और ऐतिहासिक सच्चाइयों के बीच बड़ा अंतर बताया। 1947 से पहले हुई सुबह की रैलियों और सत्याग्रहों के दौरान बीजेपी का मूल संगठन आजादी की लड़ाई से दूर था। जिन संगठनों ने ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रीय ध्वज के प्रति बहुत कम लगाव दिखाया, उन्होंने अचानक इसे अपना लिया है। 'तिरंगा यात्रा' और 'हर घर तिरंगा' जैसे एक साथ चल रहे अभियानों के जरिए सत्ताधारी पार्टी की राष्ट्रवाद की सोच पूरी तरह से सामने आई है।

संपादकीय में आगे कहा गया कि विरोधी तर्क देते हैं कि पार्टी स्वतंत्रता दिवस के भावनात्मक माहौल का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए और देशभक्ति की छवि बनाने के लिए कर रही है। बीजेपी ने स्वतंत्रता दिवस, राष्ट्रीय ध्वज और 'वंदे मातरम' को बड़े पैमाने पर जनसंपर्क कार्यक्रमों में बदल दिया है, इसलिए इन अभियानों के समय और तीव्रता पर सवाल उठते हैं। रैलियों का नेतृत्व करने वाले लोग आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे और न ही उन्होंने लाठीचार्ज का सामना किया या इस मकसद के लिए खून बहाया।

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सत्ताधारी पार्टी बचाव की मुद्रा में आई

संपादकीय में आगे कहा गया कि हजारों स्वतंत्रता सेनानी तिरंगा थामे और 'वंदे मातरम' गाते हुए फांसी पर चढ़ गए, जबकि आज के समर्थक चुप रहे। ठाकरे गुट का तर्क है कि राष्ट्रवादी कार्यक्रमों के आयोजन की यह अचानक होड़ ऐसे समय में मची है जब राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है। जंतर-मंतर जैसी जगहों पर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों और देशभर में मिल रही राजनीतिक चुनौतियों ने सत्ताधारी पार्टी को बचाव की मुद्रा में ला दिया है।

शिवसेना (यूबीटी) ने कहा, "2014 में समर्थकों ने नरेंद्र मोदी सरकार के आने को भारतीय स्वतंत्रता का असली सवेरा बताया था। आज जब जनता की सोच बदल रही है, तो जो लोग कभी झंडे को सिर्फ एक सरकारी औपचारिकता मानते थे, वे अब अपनी जन-छवि को मजबूत करने के लिए कट-आउट, रैलियों और देश भर में होने वाले कार्यक्रमों पर भारी रकम खर्च कर रहे हैं।"

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