
भले ही सरकार और बाजार समर्थक भारत-अमेरिका के बीच हुई टैरिफ डील को एक बड़ी कामयाबी बता रहे हों, लेकिन भारत की खेती पर इसके असर को लेकर अभी भी बहुत ज़्यादा अनिश्चितता है और स्पष्टता नहीं है। इतना ही नहीं संभावित रूप से यह चिंताजनक भी हो सकता है। इस मुद्दे पर अभी तक कोई भी सरकारी बयान, संयुक्त लिखित बयान या दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में यह साफ़ तौर पर कहना मुश्किल है कि भारत ने क्या त्याग किया है और उसे बदले में क्या मिला है? लेकिन वॉशिंगटन से मिल रहे संकेत पहले ही भारत के कृषि क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं।
इस बाबत सबसे बड़ा संकेत दिल्ली से नहीं, बल्कि अमेरिका से सामने आया है। अमेरिका के कृषि मंत्री (जिन्हें अमेरिका में कृषि सचिव कहा जाता है) ब्रूक रॉलिन एक्स पोस्ट में ट्रम्प और मोदी के बीच हुए समझौते को "अमेरिकी किसानों के लिए एक बड़ी जीत" बताया, और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक इस डील के लिए धन्यवाद दिया जो "ज़्यादा अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत के बड़े बाज़ार में एक्सपोर्ट करेगा...जिससे ग्रामीण अमेरिका में पैसा आएगा।"
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यह संदेश बिल्कुल साफ है कि इस समझौते से किसे फायदा होने वाला है। हालांकि, भारतीय किसानों के लिए, यह पोस्ट कुछ मुश्किल सवाल खड़े करती है।
अगर भारत ने सच में अपने कृषि बाजार को अमेरिका के लिए खोलने पर सहमति दी है, जैसा कि अमेरिका दावा कर रहा है, तो इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं। भारतीय किसान, जिनमें से ज़्यादातर छोटे ज़मीनों पर खेती करते हैं और उन्हें सरकार से बहुत कम मदद मिलती है, वे भारी सब्सिडी वाली अमेरिकी खेती का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं। मक्का, सोयाबीन तेल, बादाम, सेब या डेयरी प्रोडक्ट्स के सस्ते इंपोर्ट से घरेलू कीमतें कम हो सकती हैं, जिससे देश के बड़े हिस्सों में ग्रामीण आमदनी खतरे में पड़ सकती है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इस डील में कृषि क्षेत्र "बलि का बकरा" बन सकता है, जिसे टेक्सटाइल और ज्वेलरी जैसे सेक्टर्स के लिए फायदेमंद बताया जा रहा है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव ने भारत-अमेरिका टैरिफ डील पर समय से पहले जश्न मनाने के खिलाफ आगाह किया है। उन्होंने कहा, "जब तक कोई संयुक्त बयान, बातचीत की लिखित विज्ञप्ति या दस्तावेज सामने नहीं आता और इस समझौते को लागू करने के बारे में स्पष्टता नहीं होती, तब तक इसे एक सिर्फ राजनीतिक संकेत ही माना जाना चाहिए, न कि कोई पक्की ट्रेड डील। सावधानी बरतने की ज़रूरत है, जश्न मनाने की नहीं।"
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ध्यान रहे कि दशकों से, अमेरिका की ताकतवर फार्म (कृषि क्षेत्र की) लॉबी अमेरिका पर भारत के संरक्षित कृषि बाजार को खोलने का दबाव डाल रही हैं। भारत में अलग-अलग पार्टियों की सरकारों ने खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोज़गार और खेती की राजनीतिक संवेदनशीलता का हवाला देते हुए इस दबाव का विरोध किया है। कृषि अभी भी भारत के ज़्यादातर श्रम बल यानी वर्कफोर्स का सहारा है और देश की प्रगति यानी ग्रॉस वैल्यू एडेड में 18% से ज़्यादा का योगदान देता है। इसलिए यह इतना ज़रूरी है कि इसके साथ कोई जोखिम नहीं लिया जा सकता।
लेकिन हाल के घटनाक्रमों से बेचैनी बढ़ी है। कुछ ही दिन पहले, भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने के बाद, अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा था कि डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र इस समझौते से बाहर रहेंगे। पर अब, अमेरिका से मिल रहे संकेतों से लगता है कि इस लक्ष्मण रेखा को पार किया जा सकता है।
इस समझौते को लेकर राजनीतिक आवाज़ें पहले से ही पारदर्शिता की मांग कर रही हैं। योगेंद्र यादव ने पूछा, "क्या हमारी सरकार ने अमेरिकी कृषि आयात के लिए दरवाज़ा खोल दिया है?" और केंद्र सरकार से संसद में सच बताने का आग्रह किया है।
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जब तक पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं हो जाती, भारतीय कृषि आश्वासन और चिंता के बीच फंसी रहेगी। यह ऐसा सौदा है जो दूसरी जगहों पर फायदे का वादा करता है, लेकिन किसानों से इसकी सबसे बड़ी कीमत वसूलने की धमकी देता है, जिनके पास खोने के लिए अब ज़्यादा कुछ नहीं बचा है।
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