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उत्तराखंड एसआईआर में भी वही खेल, मांग ऐसे कागज़ों की जिन्हें जुटाने में छूट जाएं पसीने

उत्तराखंड में 14 जुलाई 2026 को एसआईआर की ड्राफ्ट सूची के प्रकाशन से पहले उत्तराखंड में 79.6 लाख मतदाता थे, जो एसआईआर के बाद घटकर 71.3 लाख हो गए हैं, मतलब 8.2 लाख से ज्यादा मतदाता डिलीट कर दिए गए हैं।

उत्तराखंड में बीएलओ घर-घर जाकर वोटरों की जांच तो कर रही हैं, लेकिन जिन कागजों की मांग की जा रही है उसे लेकर काफी परिवार परेशान हैं
उत्तराखंड में बीएलओ घर-घर जाकर वोटरों की जांच तो कर रही हैं, लेकिन जिन कागजों की मांग की जा रही है उसे लेकर काफी परिवार परेशान हैं 

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में धारचूला विधानसभा क्षेत्र के घरूडी गांव के सुरेश चंद की पत्नी कविता चंद ने 2024 लोकसभा चुनाव में वोट डाला था। लेकिन अब चलाए जा रहे विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (एसआईआर) में मतदाता सूची में कविता चंद का नाम शामिल कराने में परिवार को पसीने छूट रहे हैं। वजह सिर्फ एक है। दोनों की शादी 2022 में हुई और कविता का मायका नेपाल के दार्चुला जिले में है।

उत्तराखंड में चुनाव आयोग ने एसआईआर के लिए जारी गणना प्रपत्र में मतदाताओं के लिए दस्तावेजों की जो सूची जारी की है, उसमें कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति का जन्म भारत के बाहर हुआ हो, तो वह संबंधित देश में स्थित भारतीय मिशन द्वारा जारी जन्म पंजीकरण प्रमाणपत्र संलग्न करे। साथ ही, वह पंजीकरण या प्राकृतिकरण द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से संबंधित पंजीकरण प्रमाण पत्र संलग्न करे।

सुरेश चंद के घरूडी गांव के बगल में काली नदी है और इसे पार करते ही नेपाल का दार्चुला जिला है। उत्तराखंड के तीन जिलों - पिथौरागढ़, चंपावत और उधमसिंह नगर की सीमाएं नेपाल से लगती हैं। सुरेश चंद कहते हैं कि ‘घरूडी से तिब्बत सीमा भी ज्यादा दूर नहीं है और स्थानीय लोग व्यापार करने वहां भी जाते हैं।’

वैसे, उत्तराखंड ही नहीं, बिहार और उत्तर प्रदेश के इस किस्म के सीमावर्ती जिलों में इस किस्म की शादियों की पीढ़ीगत परंपरा रही है। सीमावर्ती इलाकों में इस किस्म के रिश्तों को ध्यान में रखकर ही नेपाल के जनकपुर में 11 मई 2018 को एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि 'भारत-नेपाल संबंध किसी परिभाषा से नहीं बल्कि रोटी-बेटी की भाषा से बंधे हैं।'

तब भी, इस बार एसआईआर में इस किस्म का नया प्रावधान लागू किए जाने से ऐसे परिवारों के साथ विकट स्थिति पैदा हो गई है। कांग्रेस पार्टी के बीएलए सुंदर जौहरी बताते भी हैं कि ‘धारचूला विधानसभा क्षेत्र में दो हजार से ज्यादा ऐसी महिलाएं हैं, जिनका ताल्लुक नेपाल से है और उनके नाम एसआईआर में शामिल नहीं हो पाए हैं।’ सुरेश कहते हैं कि ‘उनके गांव में 7 वार्ड हैं। उनके अपने वार्ड नंबर 7 में भी पांच बहुएं ऐसी हैं, जो नेपाल से ब्याह कर आई हैं।’ इनमें एक पुष्पा देवी भी हैं जिनकी शादी 2015 में सुरेश के भाई से हुई थी।

चुनाव आयोग के मुताबिक, 2022 में धारचुला विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या 90,798 थी, जबकि 2026 में एसआईआर के बाद प्रकाशित ड्राफ्ट लिस्ट में कुल मतदाताओं की संख्या 81,324 है। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, एसआईआर के बाद यहां 7,237 लोग ऐसे हैं, जिनकी मैपिंग नहीं हो पाई है।

राज्य में 14 जुलाई 2026 को एसआईआर की ड्राफ्ट सूची के प्रकाशन से पहले उत्तराखंड में 79.6 लाख मतदाता थे, जो एसआईआर के बाद घटकर 71.3 लाख हो गए हैं, मतलब 8.2 लाख से ज्यादा मतदाता डिलीट कर दिए गए हैं। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 6.3 लाख से ज्यादा मतदाता एबसेंट/शिफ्टेड पाए गए हैं, जबकि मृतकों की संख्या 1.24 लाख से ज्यादा रही है।

राज्य विधानसभा के 2022 के चुनाव परिणाम और एसआईआर के दौरान एएसडीडी के तहत डिलीट किए गए वोटरों के आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो एक उल्लेखनीय पैटर्न सामने आता है। 70 विधानसभा सीटों में 45 सीटें ऐसी हैं, जहां डिलीटेड मतदाताओं की संख्या 2022 में जीत के अंतर से अधिक है। इन चुनावों में कई सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहा था।

2022 में अल्मोड़ा सीट कांग्रेस ने सिर्फ 127 वोट से जीती थी, जबकि एसआईआर में डिलीटेड मतदाताओं की संख्या 8,947 है, यानी जीत के अंतर से लगभग 70 गुना ज्यादा। द्वाराहाट में 2022 का मार्जिन 182 था और अब डिलीटेड वोटरों का आंकड़ा 8,616, यानी लगभग 47 गुना है। इसी तरह जीत-हार का अंतर बाजपुर में 1,611 के मुकाबले डिलीशन 28,520, श्रीनगर में 587 के मुकाबले 9,819, मंगलौर में 598 के मुकाबले 8,230, गदरपुर में 1,120 के मुकाबले 13,203 और टिहरी में 951 के मुकाबले 8,975 है।

यह पैटर्न केवल पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। तराई और मैदानी विधानसभा क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में एएसडीडी डिलीशन हुआ हैं। जसपुर में 16,600, किच्छा में 27,068, हल्द्वानी में 20,867, काशीपुर में 28,701 और धर्मपुर में 29,251 मतदाताओं को डिलीट किया गया है।

ध्यान रहे कि 2026 के पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद करीब 90.8 लाख नाम वोटर लिस्ट से बाहर हुए। इनमें लगभग 27.16 लाख नाम एबजुडिगेशन के बाद भी सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हुए। चुनाव बाद किए गए विश्लेषण में पाया गया कि 49 सीटों पर एबजुडिगेशन के बाद डिलीटेड वोटर्स की संख्या जीत के मार्जिन से अधिक थी।

उत्तराखंड में 70 विधानसभा सीटें हैं। एसआईआर की ड्राफ्ट लिस्ट के प्रकाशन के बाद फॉर्म-7 के जरिये आपत्तियां लगाने में भी एक पैटर्न है।

उत्तराखंड के चीफ इलेक्शन कमिश्नर द्वारा ऑल पार्टी मीटिंग में दिए गए दस्तावेज के मुताबिक, उधमसिंह नगर जिले की 9 विधानसभा सीटों- जशपुर में 6,757, काशीपुर में 5,955, बाजपुर में 1,890, गदरपुर में 6,138, रुद्रपुर में 5,807, किच्छा में 10,858, सितारगंज में 4,154, नानकमत्ता में 3,985 और खटीमा में 2,315 फॉर्म-7 आपत्तियां लगाई गई हैं। नैनीताल की हल्द्वानी सीट पर 7,630, हरिद्वार की झबरेड़ा सीट पर 6,607, रुड़की में 4,801, बीएचईएल रानीपुर में 2,396, ज्वालापुर में 2,834, पीरन कलियार में 2,669, मंगलोर में 2,190 और हरिद्वार ग्रामीण सीट पर 2,298 पर आपत्ति लगाई गई है।

चुनाव आयोग के प्रावधानों के मुताबिक, मतदाता सूची में शामिल वोटर अपने विधानसभा क्षेत्र के किसी भी व्यक्ति या वोटर के नाम को शामिल करने या हटवाने के लिए फॉर्म-7 के जरिये आपत्ति दाखिल कर सकता है। वैसे तो, चुनाव आयोग का 2023 का मैनुअल कहता है कि बूथ लेवल एजेंट एक दिन में 10 से ज्यादा आवेदन दाखिल नहीं कर सकता, लेकिन पिछले साल एसआईआर के चलते आयोग ने इस सीमा को बढ़ाकर दिन में 50 आवेदन कर दिया, और इस साल की शुरुआत में एसआईआर के संबंध में बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी को भेजे गए एक पत्र में एक दिन में फॉर्म-7 भरे जाने की सीमा पूरी तरह हटा दी गई। हालांकि इसके साथ एक कैविएट लगाई गई कि अगर एक आपत्तिकर्ता पांच से ज्यादा दावे/आपत्ति फॉर्म भरता है तो उसका अनिवार्य रिव्यू होगा। उत्तराखंड में ड्राफ्ट लिस्ट के प्रकाशन के बाद दावे और आपत्ति के लिए 13 अगस्त की समय सीमा तय की गई थी। 11 सितंबर तक नोटिस और सुनवाई का दौर चलेगा और 15 सितंबर को फाइनल वोटर लिस्ट का प्रकाशन होगा।

न्यूजलॉन्ड्री ने उत्तराखंड में दाखिल फॉर्म-7 आपत्तियों के विश्लेषण में पाया कि पांच लोगों ने 6,500 आपत्तियां फाइल की हैं, और उन्होंने जिन लोगों के खिलाफ फॉर्म-7 दाखिल किए वे सब मुसलमान हैं, जबकि फॉर्म दाखिल करने वाले पांचों लोग भाजपा से जुड़े हैं।

संडे नवजीवन के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक, किच्छा में कुल 10,858 फॉर्म-7 भरे गए हैं, जिनमें से अकेले राजेश तिवारी ने 6,410 फॉर्म-7 भरे हैं। हिन्दुस्तान अखबार की एक रिपोर्ट के हवाले से न्यूजलॉन्ड्री ने राजेश तिवारी को भाजपा के बीएलए के तौर पर पहचाना है। इस सीट पर 2022 चुनाव में कांग्रेस के तिलकराज बेहर ने भाजपा के राजेश शुक्ला को 9 हजार से ज्यादा वोटों से मात दी थी।

तिवारी ने जिनलोगों के खिलाफ आपत्तियां लगाई हैं, उनमें रईस अहमद भी हैं। इन्हें शिफ्टेड बताया गया है। रईस कहते हैं कि 'मैं 60 वर्ष का हूं। किच्छा में मेरी पैदाइश है। मैंने दो बार पंचायत चुनाव लड़ा और हरीश रावत की सरकार में राज्यमंत्री भी रहा। मुझे अभी तक कोई नोटिस नहीं मिला है, न ही बीएलओ ने मुझे सूचित किया है। किच्छा में 45 से 50 हजार मुस्लिम वोटर हैं, पिछले चुनाव में भाजपा यह सीट हार गई। इसलिए वह मुस्लिमों वोटरों को हटाना चाहते हैं।'

न्यूजलॉन्ड्री ने पाया कि किच्छा की तरह ही गदरपुर, खटीमा, नानकमत्ता, रुद्रपुर और झबरेड़ा में भी भाजपा कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम मतदाताओं को टारगेट करते हुए बड़ी संख्या में आपत्ति फॉर्म भरे हैं।

विपक्ष के इस मामले को उठाने पर उत्तराखंड के चीफ इलेक्शन ऑफिसर (सीईओ) ने इन आपत्ति फॉर्म को डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर से जांचने की बात की। उत्तराखंड में एसआईआर को लेकर ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (एआईसीसी) द्वारा बनाई गई समिति के चेयरमैन मनोज रावत कहते हैं कि ‘सीईओ ने राज्य के सीमावर्ती इलाकों में डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के जरिये डेमोग्राफिक सिमीलर एंट्री (डीएसई) और फोटोग्राफिक सिमीलर एंट्री (पीएसई) जांचने की बात की, जबकि हमारा कहना है कि सिर्फ उत्तराखंड में यह सॉफ्टवेयर क्यों चलाया जा रहा है? बूथ की जिम्मेदारी तो बीएलओ की है, फिर गड़बड़ियां कैसे र्हुइं? आपको डीएसई जांचनी है तो सॉफ्टवेयर पूरे देश की मतदाता सूची पर चलाओ।’

वैसे, ध्यान रहे कि 24 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा था कि उसका डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर इतना खराब है कि उसे पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। आयोग ने कोर्ट में कहा था कि 'सॉफ्टवेयर के परिणामों की सटीकता में भिन्नता थी, और वह बड़ी संख्या में संदिग्ध डीएसई से जुड़ी जानकारियों को डुप्लीकेट के तौर पर चिह्नित नहीं कर पाया। सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल आखिरी बार 2023 में किया गया था।'

एक अन्य बात उल्लेखनीय है। विपक्ष के दबाव पर उत्तराखंड में चुनाव आयोग ने कई जगह आपत्तिकर्ता और संबंधित मतदाता को नोटिस जारी कर सुनवाई के लिए बुलाया। बावजूद इसके आपत्तिकर्ता मौके पर नहीं पहुंचे।

मंगलौर में कांग्रेस के बीएलए-1 ने ईआरओ को दी गई अपने लिखित आवेदन में कहा कि 17 अगस्त 2026 को सुबह 11 बजे का समय सुनवाई के लिए सुनिश्चित किया गया था, लेकिन जिस मतदाता के खिलाफ आपत्ति लगाई गई थी, वह तो पहुंचा, लेकिन आपत्तिकर्ता नहीं पहुंचा। उनका कहना है कि संबंधित मतदाता के मौके पर पहुंचने के बावजूद चुनाव आयोग ने न तो उन्हें फॉर्म-7 दिया और न ही उसे दिखाया।

इसी कारण मंगलौर विधायक काजी निजामुद्दीन पूछते हैं कि 'क्या चुनाव आयोग ने आपत्तिकर्ताओं को भी नोटिस सर्व किया? अगर आपत्तिकर्ता ही मौजूद नहीं है, तो उसकी आपत्ति पर सुनवाई कैसे हो सकती है? पहले चुनाव आयोग ने इन्हीं वोटरों के दस्तावेजों की जांच और सत्यापन किया था। अब उन्हीं दस्तावेजों की दोबारा जांच करना क्या आयोग की अपनी पिछली प्रक्रिया पर ही सवाल नहीं है?'

इनमें सबसे खास बात। कई लोगों ने हलफनामा देकर कहा है कि उन्होंने किसी के खिलाफ आपत्ति नहीं लगाई और उनके नाम से किसी और ने आपत्ति लगा दी है। हरिद्वार जिले की झबरेड़ा सीट पर 36 लोगों ने फॉर्म-7 के तहत 1,821 आपत्तियां दर्ज कराई हैं। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से 35 लोगों ने हरिद्वार जिला प्रशासन को हलफनामा को देकर कहा है कि उन्होंने ऐसी कोई आपत्ति नहीं लगाई है।

चुनाव आयोग द्वारा जारी फॉर्म-7 में लिखा है कि झूठी जानकारी/घोषणा देना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 के तहत दंडनीय है। इसके तहत एक साल तक की जेल, या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। फॉर्म 7 में किसी दूसरे मतदाता के नाम पर आपत्ति/डिलीशन मांगने पर दिए गए कारण को साबित करने की जिम्मेदारी आवेदक की होती है। लेकिन चुनाव आयोग ने किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर किसी योग्य मतदाता के खिलाफ आपत्ति लगाने वाले आवेदक के खिलाफ कोई कार्रवाई अब तक तो नहीं की है।