
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने मंगलवार को बड़ा ऐलान करते हुए तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक और इसके व्यापक समूह 'ओपेक प्लस' को छोड़ने का ऐलान कर दिया। यह फैसला एक मई से प्रभावी होगा। यह निर्णय ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा संकट और क्षेत्रीय मतभेदों के बीच लिया गया है। यूएई का यह कदम पिछले काफी समय से चर्चा में था, क्योंकि यूएई उत्पादन प्रतिबंधों के कारण असहज महसूस कर रहा था और पड़ोसी देश सऊदी अरब के साथ उसके संबंधों में भी खटास आ रही थी।
यूएई ने यह घोषणा अपनी सरकारी समाचार एजेंसी 'वाम' (डब्ल्यूएएम) के माध्यम से की। इसमें कहा गया, ''यह निर्णय यूएई के दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक नजरिये तथा बदलते ऊर्जा परिदृश्य को दर्शाता है, जिसमें घरेलू ऊर्जा उत्पादन में तेज निवेश शामिल है। यह वैश्विक ऊर्जा बाजारों में एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और भविष्योन्मुखी भूमिका के लिए इसकी प्रतिबद्धता को भी पुष्ट करता है।'' यूएई ने कहा, ''संगठन से बाहर निकलने के बाद, संयुक्त अरब अमीरात जिम्मेदारी से काम करना जारी रखेगा और मांग तथा बाजार की स्थितियों के अनुरूप धीरे-धीरे और नपे-तुले तरीके से बाजार में अतिरिक्त उत्पादन लाएगा।''
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यूएई लंबे समय से ओपेक का सदस्य रहा है। पहले 1967 में अबू धाबी अमीरात के रूप में और बाद में 1971 में यूएई के एक स्वतंत्र देश बनने के बाद से वह इसका हिस्सा बना था। हालांकि, यूएई तेजी से पश्चिम एशिया में अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जो समय के साथ रियाद (सऊदी अरब) के कुछ रुख के विपरीत रही है। ऐसा खासतौर से तब शुरू हुआ जब सऊदी अरब ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में खुद को दुनिया के लिए खोला और विदेशी निवेश आकर्षित करने के मामले में सीधे तौर पर अमीरात को चुनौती देना शुरू कर दिया।
वियना स्थित तेल गठबंधन ओपेक में लंबे समय से सऊदी अरब की प्रभावी भूमिका रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में अमेरिका द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन में वृद्धि करने से इस संगठन की बाजार शक्ति में कुछ कमी देखी गई। सऊदी अरब और यूएई के बीच आर्थिक मुद्दों और क्षेत्रीय राजनीति, विशेष रूप से लाल सागर क्षेत्र को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। दोनों देश 2015 में यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने के लिए एक गठबंधन में शामिल हुए थे। हालांकि, दिसंबर के अंत में यह गठबंधन आपसी आरोपों के बीच टूट गया।
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यूएई ओपेक का काफी पुराना सदस्य है। इसके अलग होने पर संगठन की मजबूती पर बड़ा असर पड़ेगा। इससे ओपेक और ओपेक प्लस के कमजोर होने की आशंका है। जानकारों का कहना है कि होर्मुज बंद होने और तेल की सप्लाई बहुत धीमी होने की वजह से भी यूएई ने यह कदम उठाया है। होर्मुज के रास्ते से ही दुनिया में कच्चे तेल का पांचवां हिस्सा सप्लाई होता है। वहीं ईरान युद्ध के बीच यह रास्ता पूरी तरह से बंद हो चुका है, जिससे तेल सप्लाई लगभग ठप है।
इधर यूएई के अचानक ओपेक और ओपेक प्लस को अलविदा कहने से पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार में खलबली मच गई है। ईरान युद्ध की वजह से पहले से ही दुनिया में तेल का संकट जारी है और अब इस खबर ने संकट को और गहरा दिया है। भारत में भी चिंता बढ़ गई है। भारत तेल के मामले में आयात पर निर्भर है। ऐसे में अगर वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ता है तो भारत भी इससे अछूता नहीं रहीं हेगा। यूएई से भी भारत बड़ी मात्रा में तेल आयात करता रहा है। ऐसे में अगर इतने बड़े सप्लायर से अगर सप्लाई ठप होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होगा और इसका असर भारत पर भी पड़ेगा।
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हालांकि, कई जानकारों का कहना है कि तेल के मामले में भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं है। ऐसे में इतनी जल्दी भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उछाल आने वाला नहीं है। अब इस मामले में सरकार की नीतियां, टैक्स और वैश्विक तेल बाजार की स्थितियां ही अहम भूमिका अदा करेंगी। कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि तेल की कमी की वजह से भारत नए रास्ते भी खोलने का प्रयास कर सकता है जो कि भविष्य के लिए अच्छा होगा।
वहीं कई जानकारों का यह भी कहना है कि यूएई के इस फैसले का अच्छा असर भी हो सकता है। ओपेक में रहने के दौरान यूएई पर तेल उत्पादन को लेकर कई तरह की पाबंदियां थीं। वहीं ओपेक से बाहर होकर वह अपनी कच्चे तेल की सप्लाई बढा़ने का प्रयास करेगा। हो सकता है कि यूएई कम दाम में तेल सप्लाई करे और भारत इसका फायदा उठाने से नहीं चूकेगा। यूएई के साथ भारत के संबंध भी मजबूत हैं। ऐसे में भारत के लिए भविष्य में सस्ते तेल का एक रास्ता खुल सकता है। लेकिन यह सब भविष्य की स्थितियों पर निर्भर है।
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