
देश को नरेंद्र मोदी, लाल बहादुर शास्त्री और चंद्रशेखर के रूप तीन प्रधानमंत्री और प्रदेश को पांच मुख्यमंत्री देने वाला उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल जाति, धर्म और सियासी जोड़तोड़ की प्रयोगशाला बना हुआ है। बीजेपी के लिहाज से सियासत के दो सबसे प्रमुख चेहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसी पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व करते हैं। तो वहीं जातिगत आधार पर राजनीतिक पैठ बनाने वाले धुरंधरों की कर्मभूमि पूर्वांचल ही है। इसीलिए वाराणसी और आजमगढ़ में जनसभाओं और रोड शो के जरिए दस्तक देकर मोदी ने साफ संदेश दे दिया है कि बीजेपी के यूपी में मिशन-80 के लिए पूर्वांचल की क्या अहमियत है।
पूर्वांचल की ज्यादातर सीटों पर छठें चरण में 25 मई और सातवें चरण में 1 जून को वोटिंग होनी है। पूर्वांचल की 27 सीटों में से सिर्फ गोरखपुर, बस्ती, आजमगढ़ और लालगंज ही ऐसी सीट है, जहां बीजेपी और इंडिया गठबंधन से प्रत्याशियों के नाम की घोषणा हुई है। गोरखपुर-बस्ती और आजमगढ़ मंडल की 13 सीटों में बलिया छोड़कर बीजेपी सभी 12 तो समाजवादी पार्टी सिर्फ 4 पर प्रत्याशी घोषित कर सकी है। सपा ने भदोही सीट टीएमसी को दे दी है, जहां से ललितेश पति त्रिपाठी को प्रत्याशी घोषित किया गया है। बीएसपी अभी एक भी सीट पर प्रत्याशियों के नाम की घोषणा नहीं कर सकी है।
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पिछले चुनाव देखें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल की 27 लोकसभा सीटों में से 22 बीजेपी तो 5 बीएसपी-एसपी गठबंधन के हिस्से में आई थीं। आजमगढ़ सीट से सपा प्रमुख अखिलेश यादव को जीत मिली थी। लेकिन उपचुनाव में बीजेपी के दिनेश लाल यादव निरहुआ ने सपा के धर्मेंद्र यादव को हराकर सपाई गढ़ में सेंध लगा दी थी। वहीं 2019 में जौनपुर से श्याम सिंह यादव, लालगंज से संगीत आजाद, गाजीपुर से अफजाल अंसारी, घोसी से अतुल राय ने बीएसपी के टिकट पर जीत हासिल की थी।
पूर्वांचल की वाराणसी सीट से नरेंद्र मोदी को कुल वैध मतों का 64 फीसदी तो आजमगढ़ में सपा प्रमुख अखिलेश यादव को वैध मतों का 60 फीसदी वोट मिला था। वहीं गोरखपुर, बांसगांव, महराजगंज, सलेमपुर, देवरिया, कुशीगनर लोकसभा सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवारों को 50 फीसदी से अधिक वोट मिले थे।
ये आकड़े तस्दीक कर रहे हैं कि आजमगढ़ और आसपास की सीटों को छोड़ दें तो ज्यादातर सीटों पर बीजेपी ने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। हालांकि 2019 और आज की स्थिति में काफी अंतर दिख रहा है।
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पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का बीएसपी के साथ तो इस बार कांग्रेस के साथ तालमेल है। बदले राजनीतिक परिदृश्य में बीजेपी से लेकर समाजवादी पार्टी तक कील कांटे दुरूस्त करने में जुटे हैं। पूर्वांचल के 27 लोकसभा क्षेत्रों में कुर्मी, मौर्य, राजभर, निषाद, यादव सहित अन्य जातियों का गढ़ है। 2014 और 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में यादव और राजभर को छोड़कर अधिकांश जातियों का रुख बीजेपी की ओर रहा है। निषाद, राजभर और कुर्मी वोटरों को साधने के लिए बीजेपी संजय निषाद, ओम प्रकाश राजभर और अनुप्रिया पटेल को तमाम वैचारिक मतभेद के बाद भी साथ में जोड़कर रखे हुए है।
राजनीति की समझ रखने वाले बलिया के अनूप हेमकर कहते हैं कि ‘ओम प्रकाश राजभर, दारा सिंह चौहान के बार-बार पाला बदलने से उनके समर्थकों में ही असमंजस की स्थिति है। संजय निषाद भी गठबंधन के एवज में पार्टी के सिंबल पर प्रत्याशी लड़ाने की मांग कर रहे हैं। बीजेपी की स्थिति 5 साल पहले जैसी सुखद नहीं है।’
बीजेपी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नाराजगी को दरकिनार कर राजभर और चौहान वोटों को साधने के लिए ओम प्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान को कैबिनेट मंत्री बना दिया है। दारा सिंह को यह तोहफा तब मिला है जब घोसी उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह से उन्हें करारी हार झेलनी पड़ी थी। सवाल यह है कि योगी की नाराजगी के बीच मंत्री बने इन दो चेहरों का चुनाव में कितना लाभ मिलेगा?
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हालांकि बीजेपी पिछले प्रदर्शन को बेहतर करने में कोई कसर छोड़ना चाहती है। आजमगढ़ और आसपास की सीटों पर पिछले बार के प्रदर्शन को देखते हुए ही नरेंद्र मोदी चुनाव से पहले ही आजमगढ़ में बड़ी जनसभा करने के साथ एयरपोर्ट से लेकर मेडिकल कॉलेज का तोहफा दे चुके हैं। यहां की जनसभा में मोदी ने ‘माफिया नहीं अब यूपी के कानून का राज’ की बात कर इशारे में सपा के साथ ही मुख्तार अंसारी पर हमला किया ही, प्रचार का एजेंडा भी तय कर दिया है।
उधर, योगी भी पिछले तीन महीने में छह बार आजमगढ़ और आसपास के जिलों का दौरा कर चुके हैं। दूसरी तरफ सपा पूर्वांचल में मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए भी कई दांव चल रही हैं। आजमगढ़ में लोकसभा को लेकर हुए उपचुनाव में सपा को बसपा के टिकट पर लड़े जिस गुड्डू जमाली के चलते हार झेलनी पड़ी थी, उन्हें अपने पाले में कर लिया है।
सपा ने आजमगढ़ से एकबार फिर धर्मेंद्र यादव को उतार कर संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी अपने गढ़ में बीजेपी को आसानी से पांव नहीं जमाने देगी। वहीं घोसी से बीएसपी के सांसद रहे माफिया डान मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी ने भी सपा का दामन थाम लिया है। माफिया डान मुख्तार अंसारी को लेकर योगी सरकार की सख्ती के बाद मुस्लिमों को अपने पाले में करने का सपा का यह दांव काफी अहम माना जा रहा है।
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