
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद मस्जिद 5 सितंबर 2026 की आधी रात ढहा दी गई। जिला जज द्वारा मस्जिद प्रबंधन की अपील खारिज किए जाने के बाद, ऊपरी अदालत में अपील का इंतजार किए बिना आनन-फानन मस्जिद गिराए जाने पर मुस्लिम समुदाय और विपक्षी राजनीतिक दल, दोनों ने सवाल उठाए। (इलाहाबाद हाईकोर्ट में अगली सुनवाई 12 अक्तूबर को होनी है।)
मार्च 2025 में बजरंग दल के एक संयोजक ने मस्जिद सरकारी जमीन पर बनी होने की शिकायत की थी। मस्जिद प्रबंधन ने 1911 का बिजली कनेक्शन सर्टिफिकेट, म्युनिसिपल टैक्स की रसीदें और वक्फ तथा पोस्ट ऑफिस के बीच 1994 का लीज एग्रीमेंट जैसे कई दस्तावेज मस्जिद के पक्ष में पेश किए।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, सिटी मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई 2026 को प्रबंधन को मस्जिद वहां से हटाने का आदेश देते हुए जमीन सरकारी संपत्ति घोषित कर दी। मजिस्ट्रेट ने 70 से ज़्यादा सालों तक अनधिकृत कब्जा करने के लिए 6.41 करोड़ रुपये की वसूली का भी आदेश दिया, हालांकि हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है। मस्जिद एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी है और इसके आस-पास कलेक्टरेट कॉम्प्लेक्स बाद में बना था।
लखनऊ के शाही इमाम और इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा, “उत्तर प्रदेश में सरकारी जमीनों पर अनेक मंदिर बने हैं, लेकिन मुसलमानों ने कभी किसी पर भी आपत्ति नहीं जताई। सरकार को ऐसे फैसले नहीं लेने चाहिए जिनसे सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़े; उन्हें इसका ध्यान रखना चाहिए।” सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इसे “काला दिन” और संविधान पर हमला बताया।
मुरादाबाद में, बिना मंजूरी निर्माण की शिकायत के बाद स्थानीय विकास प्राधिकरण ने तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के पास वाली 40 साल पुरानी मुस्तफा मस्जिद को 8 सितंबर को नोटिस दिया। संभल में, चौधरी सराय इलाके की बाबा बहाउद्दीन शाह मस्जिद भी इसी तरह के आरोपों और ‘विवादित संपत्ति’ की जांच की मांग करने वाली शिकायतों के कारण जांच के दायरे में आ गई।
संत कबीर नगर में कमिश्नर के आदेश पर एक मदरसा गिरा दिया गया। वाराणसी में रेलवे स्टेशन की रीमॉडलिंग के दौरान एक मजार और एक मस्जिद गिराई गयी। बहराइच में महाराजा सुहेलदेव मेडिकल कॉलेज कैंपस में मौजूद 10 मजारें भी सरकारी जमीन के कथित दावे पर गिरा दी गईं। देवरिया और लखनऊ में भी ऐसे विवाद सामने आए हैं।
जिस तेजी और जिस समय में कथित तौर पर विवादित इस्लामी ढांचे ढहाए जा रहे हैं, उससे किसी आधिकारिक-अनौपचारिक साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता। जानकार तोड़-फोड़ अभियान को राज्य विधानसभा चुनावों से पहले बहुसंख्यक आबादी को एकजुट करने का एक तरीका मानते हैं। मुसलमान जितना ज़्यादा विरोध करेंगे, ‘हिन्दू खतरे में हैं’ वाला नरेटिव उतनी ही मजबूती से आगे बढ़ाया जा सकेगा। सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत और मेरठ में कुल मिलाकर लगभग 26 विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम वोटर अहम भूमिका निभाते हैं। अकेले सहारनपुर में सात विधानसभा सीटें हैं और यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिला है।
तोड़-फोड़ की कार्रवाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘सख्त नेता’ वाली छवि को और पुख्ता करती है। बीजेपी के लिए यह फायदेमंद है कि विपक्ष मुसलमानों के समर्थन में एकजुट हो, क्योंकि विरोध-प्रदर्शनों के कारण वे हिन्दू बहुसंख्यकों से थोड़ा और अलग-थलग पड़ जाते हैं।
मौजूदा विवाद जमीन और अतिक्रमण से जुड़े कानूनी मामलों तक ही सीमित रहेंगे या कोई बड़ा चुनावी मुद्दा बनेंगे, आगे होने वाली घटनाओं पर निर्भर करेगा। शिकायत करने वालों की पहचान, शिकायत का समय, मामलों के निपटारे की गति और चुनाव से पहले ढांचों को गिराने की ऐसी जल्दबाजी से इस एजेंडे को लेकर कोई शक भी नहीं रह जाता।
स्पेन नहीं, यह गोरखपुर की बारिश है
बीजेपी सांसद रवि किशन के यह कहने के कुछ ही हफ़्ते बाद कि गोरखपुर “स्पेन जैसा लगता है”, जोरदार बारिश ने इस ‘स्मार्ट सिटी’ के कई इलाके पानी में डुबो दिए। वीडियो क्लिप्स में तारा मंडल इलाके में सांसद के घर के बाहर घुटनों तक पानी भरा दिखा। लोग पानी में चलते हुए “स्पेन, स्पेन” के नारे लगाते और किशन का मजाक उड़ाते हुए कहते कि ‘गोरखपुर तो वेनिस जैसा लगता है’!
हालांकि, रविकिशन और बीजेपी पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी के बीच हुई बातचीत कहीं ज़्यादा दिलचस्प रही। एक ऑडियो क्लिप वायरल हुआ, जिसमें त्रिपाठी सांसद से शिकायत करते हैं कि उन इलाकों के घरों में पानी घुस गया है, जहां पहले कभी ऐसी बाढ़ नहीं आई। किशन, त्रिपाठी को यह बताकर शांत करने की कोशिश करते हैं कि जमा पानी निकालने के लिए पंप लगाए गए हैं। पार्षद जवाब देते हैं, “यह झूठ है! कोई पंप नहीं लगाया गया है।” हैरान रविकिशन त्रिपाठी से पूछते हैं कि क्या वह “समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं”। त्रिपाठी पलटवार करते हुए किशन से पूछते हैं- क्या वह “बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए हैं”!
खैर, मजाक-मस्ती थमी लेकिन बारिश जारी रही, तो प्रशासन नुकसान कम करने की कोशिशों में जुट गया। रवि किशन इसके लिए अत्यधिक बारिश को जिम्मेदार ठहराते दिखे, जो बीते दो दशकों में सबसे ज़्यादा थी। लेकिन इससे उन्हें मेयर और म्युनिसिपल कमिश्नरों के साथ मिलकर पानी से भरी गलियों में चलने और इमरजेंसी पंपिंग ऑपरेशन की देखरेख करने से छुटकारा नहीं मिला।
योगी आदित्यनाथ के इस गृहनगर में मॉनसून याद दिलाता दिखा कि सबसे स्मार्ट शहरों को भी सबसे बुनियादी टेस्ट पास कर लेने चाहिए: क्या शहर लोगों को बिना पैर भिगोए चलने के हालात देता है?
जल्दबाजी में बोलना, बाद में पछताना!
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक युवाओं से कह रहे थे कि वे नौकरी के पीछे भागकर अपना समय बर्बाद न करें! पाठक लखनऊ में ‘भारत टैक्सी’ (एक सहकारी प्लेटफॉर्म) की लॉन्चिंग पर बोल रहे थे। युवाओं को ‘चूहा-दौड़’ (अंधी होड़) में न फंसने की सलाह देते हुए, पाठक ने इसके बजाय जीविका के लिए ई-रिक्शा या टैक्सी चलाने का सुझाव दिया। वायरल वीडियो में उन्हें यह कहते सुना जा सकता है, “चार घंटे गाड़ी चलाओ, दोपहर का समय अपने बच्चों के साथ बिताओ।”
स्वरोजगार के लिए दिया गया यह ‘आसान और लुभावना’ सुझाव उलटा पड़ा और इससे युवा और ई-रिक्शा चालक, दोनों ही नाराज हो गए। एक बेरोजगार युवा ने गुस्से में कहा, “तो उनकी नजर में यह मात्र एक शौक का मामला है?" ई-रिक्शा चालकों ने कहा, “वह खुद आकर चार घंटे हमारा ई-रिक्शा चलाएं और देखें कि वह कितना कमा पाते हैं?”
राजनीतिक विरोधी तो एक गंभीर मुद्दे को इस तरह हल्के में लेने से खुश नहीं ही थे, उनकी अपनी पार्टी के लोग भी नाखुश दिखे। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ द्वारा तीन हज़ार से ज़्यादा नियुक्ति पत्र सौंपने और एक लाख और नौकरियां देने के वादे के ठीक बाद, जब राज्य सरकार नई भर्तियों और नौकरियां पैदा करने को अपनी बड़ी कामयाबी के तौर पर दिखा रही थी; पाठक की नसीहत सरकार के इस दावे से मेल नहीं बिठा पाई। लोगों ने यहां तक पूछ लिया कि क्या उनकी यह सलाह उनके अपने बच्चों पर भी लागू होती है?
समाजवादी पार्टी के नेता पुष्पेंद्र सरोज ने X पर लिखा: ‘आज के युवा ही देश चलाएंगे। अगर आपको रिक्शा चलाने का शौक है, तो मैं आपको तोहफे में एक रिक्शा भेज दूंगा, माननीय उपमुख्यमंत्री जी।’ नाराज लोगों ने सोशल मीडिया पर सवाल पूछा- पाठक क्यों चाहते हैं कि युवा भारतीय अपनी उम्मीदें कम करें। सत्ताधारी पार्टी के लोग राम मंदिर का चढ़ावा गबन कर लें, अपनी जेब भरते रहें, अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाएं, लेकिन औरों को ई-रिक्शा चलाकर ही खुश रहना चाहिए?!
विपक्ष के लिए यह सब चुनाव पूर्व हाथ लगे किसी खजाने से कम नहीं हैं। पाठक के लिए तो अफ़सोस ही जताया जा सकता है, जिन्होंने शायद सोचा होगा कि उन्होंने तो स्वरोजगार और काम-क़ाज़ी जिंदगी के बीच संतुलन बिठाने के लिए कितनी अच्छी बात कही है! इससे सीख मिलती है कि राजनेताओं को भी बच्चों की तरह अपना होमवर्क करना चाहिए, अपने भाषणों की तैयारी करनी चाहिए, विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए और बिना सोचे-समझे कुछ भी बोलने से बचना चाहिए।