हालात

गायब होती झीलें, पानी को तरसते शहर: भयानक जल संकट की दहलीज पर भारत

मुंबई में टैंकर हड़ताल से लेकर बेंगलुरु में सूखती झीलों तक, आबादी बढ़ने के साथ शहरों में पानी की समस्याएं बढ़ रही हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

हालांकि भारत की कमर्शियल राजधानी मुंबई में पानी को लेकर स्थिति 9 जून के बाद से थोड़ी सुधरने लगी लेकिन करीब एक महीने तक तो त्राहि-त्राहि ही मची हुई थी। दरअसल, 7 मई को यहां प्राइवेट वॉटर टैंकर ऑपरेटरों ने अपनी सर्विस रोक दी। यह हड़ताल सेंट्रल ग्राउंड वॉटर अथॉरिटी द्वारा ग्राउंड वॉटर निकालने और नियमों के पालन को लेकर की गई कार्रवाई के कारण हुई। ऑपरेटरों को नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) लेना था, कम-से-कम 200 वर्ग मीटर वाली उस जमीन के मालिकाना हक का सबूत देना था जहां कुआं है , और ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स द्वारा तय पानी की क्वालिटी के मानकों का पालन सुनिश्चित करना था। सरकार के आश्वासन के बाद टैंकर ऑपरेटरों ने हड़ताल वापस ली, तब लोगों ने राहत की सांस ली, अन्यथा तो लाखों लोग पानी के लिए तरसते ही रहते। दरअसल, मुंबई को पानी सप्लाई करने वाली सात झीलें लगभग खाली हो चुकी हैं और इस स्थिति के कारण हाउसिंग सोसायटियों में रहने वाले लोगों को पानी की बढ़ती किल्लत का सामना करना पड़ता है।

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शहरी भारत में हर जगह यही हाल है। दिल्ली की कॉलोनियों के लाखों लोग पानी की अनियमित सप्लाई से जूझ रहे हैं। यमुना में पानी का स्तर गिर गया है और हरियाणा पर्याप्त पानी नहीं छोड़ पा रहा, जिससे दिल्ली में रोजाना करीब 8 करोड़ गैलन पानी की कमी हो गई है। दिल्ली जल बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, ‘यमुना का जलस्तर सामान्य से 6.5 फुट नीचे है और हरियाणा सिंचाई विभाग का कहना है कि केवल 352 क्यूसेक पानी छोड़ा जा सकता है। हमें जितनी जरूरत है, उससे बहुत कम पानी मिल रहा है और हम बोरवेल और कैन वाले पानी पर निर्भर हैं।’

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गुड़गांव में करोड़ों के लग्जरी अपार्टमेंट में रहने वाले भी पानी की राशनिंग से परेशान हैं। प्रति टैंकर 10,000 रुपये खर्च करने के बावजूद, सप्लाई कम पड़ रही है। गुरुग्राम मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी का कहना है कि ऐसा कच्चे पानी की कमी से हो रहा है, क्योंकि मांग मौजूदा क्षमता से कहीं ज्यादा है।

पुणे में मुथा नदी पर चार बांध (खड़कवासला, पानशेत, वरसगांव और टेमघर) के बावजूद, हर गर्मी पानी की कमी बढ़ जाती है। नगर निगम ने बढ़ती मांग पूरी करने के लिए भामा आस्खेड़ बांध से पानी लेने की मंजूरी मांगी है। सिर्फ चार दशकों में, शहर का दायरा चार गुना बढ़ गया है। 1987 में यह 125 वर्ग किलोमीटर था जो आज 508 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जबकि आबादी 2021 में 70 लाख से बढ़कर 2025-26 में अनुमानित 77.76 लाख हो गई है। हैदराबाद में रोजाना 20,000 से ज्यादा टैंकर बुक किए जा रहे हैं। मॉनसून में देरी और टैंकरों पर बढ़ती निर्भरता से जल बोर्ड को तीन शिफ्ट में काम करना पड़ रहा है। हैदराबाद के विशेषज्ञ सत्यनारायण बोलिसेट्टी कहते हैं, ‘हैदराबाद में कई झीलें थीं, लेकिन 80 फीसद पर कब्जा हो गया है। पहले जुबली और बंजारा हिल्स के हरे इलाके पानी को रिचार्ज करने में मदद करते थे। अब इन पहाड़ियों पर निर्माण हो गया है और भूजल को रिचार्ज करने के बजाय बारिश का पानी बह जाता है।’

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भारत में शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है- 2013 में यह 32 फीसद थी और 2025 में इसके 50 फीसद होने का अनुमान है। जाहिर है, पानी की कमी की समस्या और गंभीर हो गई है। मेट्रो शहरों में,जहां 12 फीसद आबादी यानी 50 करोड़ लोग रहते हैं, भूजल स्तर में गिरावट, अनियमित बारिश और नदियों के प्रदूषित होने जैसी समस्या झेल रहे हैं।

पानी की असमानता सामाजिक भेदभाव भी बढ़ाती है। दिल्ली की 12 अनौपचारिक बस्तियों में 500 परिवारों पर ग्रीनपीस का सर्वे बताता है कि 34 फीसद परिवार निजी ऑपरेटरों से पानी खरीदते हैं और इसपर वे आय का 15 फीसद तक खर्च कर देते हैं। सरकार के 3,000 वॉटर एटीएम लगाने का वादा पूरे नहीं हो पाया है। अप्रैल-जून में 20 एटीएम ही लगाए गए।

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भारत पानी की भारी कमी वाले देशों में है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की 2023 की 'एक्वाडक्ट वॉटर रिस्क एटलस' रिपोर्ट के मुताबिक, पानी की घोर किल्लत का सामना कर रहे 25 देशों में भारत 24वें नंबर पर है। यानी देश अपने उपलब्ध पानी का कम से कम 80% हिस्सा इस्तेमाल कर रहा है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के प्रोफेसर टी.वी. रामचंद्रन बताते हैं, ‘बेंगलुरु में हरियाली 1970 के दशक में 68% थी, अब घटकर 4% रह गई है और शहर का 87% हिस्सा कंक्रीट से ढक गया है। कभी 100 फुट पर पानी था, अब 800 से 8,000 फुट की गहराई में मिलता है। बची झीलों के आस-पास हरियाली बढ़ाने से कुछ जगहों पर भूजल स्तर जरूर 320 फुट तक ऊपर आया है।’ बेंगलुरु में 1970 के दशक में 250 से ज्यादा झीलें थीं, लेकिन अब सिर्फ 180 बची हैं; इनमें से कई सीवेज के गलत प्रबंधन से खराब हो चुकी हैं।

बोलिसेट्टी कहते हैं, ‘सत्तर साल पहले विशाखापत्तनम में 104 तालाब थे। आज सिर्फ दो हैं।’ वह हैरानी जताते हैं कि ऐसे में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू बाजार भाव से बहुत कम कीमत पर सैकड़ों एकड़ जमीन एआई डेटा सेंटर के लिए कैसे आवंटित कर सकते हैं जबकि इसमें लाखों गैलन पानी की जरूरत होगी।’

बहुत कम शहरों ने देहरादून जैसी बेतहाशा तबाही का सामना किया है, जिसे कभी ‘पूर्व का वेनिस’ कहते थे। शहर की 100 नहरें और 40 नदियां कंक्रीट के नीचे दब गई हैं। शहर की पर्यावरणविद् रेनू पॉल कहती हैं, ‘नदियां गंदे नालों में बदल गई हैं। योजनाकार यह भूल जाते हैं कि शहरी जल स्रोत पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।’

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वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर ने 100 शहरों की सूची बनाई है, जिनमें भारत के 30 शहर शामिल हैं, जो 2050 में पानी के गंभीर संकट का सामना करेंगे। इस सूची में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, लखनऊ और भोपाल जैसे शहर शामिल हैं। नीति आयोग की 2019 की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि 2020 तक भारत के 21 शहरों में पानी पूरी तरह खत्म होने का खतरा है।

नदियां सूख रही हैं, पानी जमा करने वाली चट्टानें खत्म हो रही हैं और जमीन के नीचे से पानी निकालने की मात्रा अमेरिका और चीन को मिलाकर भी ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में लगभग 85 फीसद लोग पेयजल और 60 फीसद सिंचाई के लिए भूजल का इस्तेमाल कर रहे हैं। शिमला जैसे हिल स्टेशनों में भी पानी की कमी हो रही है। 2018 में टूरिस्ट सीजन में नल सूख गए थे। सभी हिल स्टेशनों का यही हाल है।

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'साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल' के कोऑर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर कहते हैं, ‘शहरीकरण से पानी तेजी से बह जाता है, जिससे पानी जमा नहीं हो पाता और नदियां सूखने लगती हैं। जंगल, वेटलैंड, स्थानीय जल स्रोत और खेत बारिश के पानी को सोखने और धीरे-धीरे छोड़ने में मदद करते हैं, जिससे नदियों में साल भर पानी का बहाव बना रहता है और बाढ़ व सूखे दोनों से बचाव होता है।’

शहरों में लंबे समय तक पानी की सुरक्षा बनाए रखने का तरीका दूर-दराज से पानी लाने के बजाय स्थानीय जल स्रोतों और हरियाली को बचाना और उन्हें पुनर्जीवित करना है। प्रोफ़सर रामचंद्रन का सुझाव है कि विकास को मापने के लिए सिर्फ जीडीपी पर निर्भर रहने के बजाय 'ग्रीन जाडीपी' को अपनाया जाए, जिसमें पर्यावरण को होने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखा जाता है और टिकाऊ विकास को बढ़ावा मिलता है।

प्रधानमंत्री मोदी के महत्वाकांक्षी 'जल जीवन मिशन' के तहत 2024 तक 19 करोड़ घरों में नल से पानी पहुंचाने का वादा किया गया था, लेकिन 60 प्रतिशत कवरेज के दावों पर भ्रष्टाचार और अविश्वसनीय डेटा का साया है। कई जगहों पर लगे नलों में पानी नहीं आता।

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पानी की गुणवत्ता गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। उद्योगों से निकलने वाला कचरा और गैरशोधित सीवेज नदियों को प्रदूषित करते हैं, जबकि कैडमियम, लेड और आर्सेनिक जैसी हानिकारक धातुएं पानी की सप्लाई को दूषित करती हैं।

यह बात घिसी-पिटी लग सकती है, लेकिन हरियाली को फिर से बढ़ाना पानी की उपलब्धता बढ़ाने का सबसे किफायती तरीका है। बारिश के पानी, तालाबों या नदियों जैसे स्थानीय स्रोतों का सही इस्तेमाल करके ही हम जल सुरक्षा बढ़ा सकते हैं।

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