
सैद-उल-अजायब में एक इमारत गिर जाती है। हौज रानी में बेड-एंड-ब्रेकफास्ट होटल में आग लग जाती है। जनस्मृति में, ये दोनों घटनाएं साकेत और मालवीय नगर जैसे बड़े पड़ोसी इलाकों के नामों से जुड़ी रह सकती हैं, लेकिन इसका भूगोल मायने रखता है। ये सामान्य कॉलोनियां नहीं हैं। ये दिल्ली के शहरी गांव हैं, जहां बसावट के पुराने पैटर्न अब एक ऐसे शहर का बोझ उठा रहे हैं जो अपनी खुद की नियोजन कल्पना से बहुत आगे निकल चुका है।
त्रासदी उस दिन शुरू नहीं होती जिस दिन कोई इमारत ढहती है या आग लगती है। इसकी शुरुआत उन लंबे, खामोश सालों में होती है जब अतिरिक्त मंजिलों का निर्माण स्वीकार्य मान लिया जाता है, आवासीय गलियों में व्यावसायिक गतिविधियां प्रवेश कर जाती हैं, बिजली का लोड कई गुना बढ़ जाता है, सीढ़ियां संकरी हो जाती हैं, और हर प्राधिकरण इससे नजरें चुराने का कोई न कोई रास्ता ढूंढ लेता है।
दिल्ली के शहरी गांव एक अजीब इतिहास के बीच बसे हैं। गांवों के पुराने मुख्य हिस्से उनके आसपास की कृषि भूमि से अलग रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद जैसे-जैसे दिल्ली का विस्तार हुआ, खेती की जमीन नियोजित अधिग्रहण के दायरे में आती गई, जबकि लाल डोरा क्षेत्र एक अलग कानूनी और प्रशासनिक श्रेणी में बने रहे। उन दशकों में, एक छोटे से भूखंड पर बना एक घर पहले किराये के आवास में बदला, और अंततः 1990 के दशक में एक गेस्ट हाउस, कैफे, क्लिनिक या दुकान में तब्दील हो गया। जो गली पहले निवासियों, मवेशियों और गाड़ियों के लिए इस्तेमाल होती थी, वह अब कारों, डिलीवरी बाइकों, दमकल गाड़ियों और एम्बुलेंसों के लिए एकमात्र सुलभ मार्ग बन गई।
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मैं यह आलेख दक्षिण दिल्ली के एक शहरी गांव देवली से लिख रहा हूं, जहां यह अंतर्विरोध हर दिन दिखता है। पुराने निवासी अभी भी उस दौर क जिक्र करते हैं जब घरों में आंगन, मवेशियों के लिए जगह, घर के आगे खुले हिस्से और हवा की आवाजाही के लिए पर्याप्त जगह होती थी। अब, अक्सर यह सुनने को मिलता है: ‘जमीन तो वही है, पर जरूरत बढ़ गई है’। प्रत्येक अतिरिक्त निर्माण अलग से देखने पर तर्कसंगत लगता है, लेकिन यदि उन्हें दिल्ली जैसे शहर के पैमाने पर देखा जाए, तो वे खतरा पैदा करते हैं।
यही कारण है कि शहरी गांवों को केवल अवैधता के चश्मे से नहीं समझा जा सकता। वे वह सब देते हैं जिसे औपचारिक दिल्ली बार-बार देने में विफल रहती है: छात्रों, प्रवासियों और श्रमिकों के लिए किफायती कमरे; अस्पतालों के पास मरीजों और तीमारदारों के लिए अस्थायी घर; छोटे व्यवसायों के लिए स्थान; सघन खाद्य संस्कृतियां; और ऐसे सामाजिक नेटवर्क जो उन लोगों के लिए जगह बनाते हैं जो नियोजित दिल्ली का खर्च उठाने में असमर्थ हैं।
एक युवा श्रमिक बिना हवादार व्यवस्था वाले कमरे को चुनता है क्योंकि वह मेट्रो के करीब और उसके बजट में होता है। एक छात्र तंग पीजी आवास चुनता है क्योंकि यह किफायती होता है और कॉलेज के पास। एक दुकानदार भूतल से व्यवसाय चलाता है क्योंकि किसी मॉल में दुकान की कल्पना भी उसके लिए असंभव है। ये विकल्प हमेशा स्वतंत्र नहीं होते। वे लागत और उपयोगिता से प्रभावित होते हैं, लेकिन यह कोई बहाना नहीं बन सकता।
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हौज रानी से सामने आए विवरण विचलित करने वाले हैं क्योंकि वे जाने-पहचाने हैं। कथित तौर पर दो मंजिलों के लिए स्वीकृत की गई एक इमारत, बिना किसी उचित योजना की मंजूरी या अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र के, कहीं अधिक ऊंची खड़ी हो जाती है। पूरे शहर में यही पैटर्न दोहराया जाता है: अधिक मंजिलें, अधिक किरायेदार, अधिक किराया, अधिक बिजली का लोड, अधिक जोखिम। उचित नियोजन के तहत, ऊंचाई का संबंध सड़क की चौड़ाई, वेंटिलेशन, आपातकालीन निकास और संरचनात्मक सुरक्षा से होता है। कई शहरी गांवों में यह संबंध टूट चुका है।
यह दुविधा वास्तविक और कठिन है। बिना किसी विकल्प के अचानक की गई सख्त कार्रवाई उन हजारों लोगों को विस्थापित कर सकती है, जो इन इलाकों पर निर्भर हैं। यह व्यवस्था की कमियों के उजागर होने से पहले किरायेदारों को दंडित कर सकती है। यह सुरक्षा को बेदखली में बदल सकती है। लेकिन असुरक्षित निर्माणों को लगातार बर्दाश्त करने का मतलब इस ‘खुले रहस्य’ को उजागर करने के लिए अगली आग, इमारत के ढहने या दम घुटने जैसी किसी त्रासदी का इंतजार करना है।
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दिल्ली जब तक जरूरत पड़ने पर अपने शहरी गांवों को अवैध, सुविधाओं की मांग करने पर अदृश्य, और केवल आपदाओं के बाद आपराधिक मानना बंद नहीं करेगी, तब तक बात नहीं बनेगी। इन मोहल्लों को मौतों के बाद सामयिक जांच की जरूरत नहीं है। उन्हें दीर्घकालिक, स्थायी और टिकाऊ समाधानों की जरूरत है जैसे कि प्रमाणित इमारतें, स्पष्ट स्वामित्व रिकॉर्ड, व्यावहारिक निर्माण नियम, आपातकालीन पहुंच, अग्नि-जोखिम मानचित्र, संरचनात्मक ऑडिट, रेट्रोफिटिंग सहायता, और ऐसे स्थानीय प्राधिकरण जो त्रासदी होने से पहले जवाबदेह हों।
उद्देश्य शहरी गांवों को समतल करके नियोजित कॉलोनियों में बदलना या उन्हें पुरानी दुनिया की बस्तियों के रूप में रूमानी बनाकर देखना नहीं हो सकता। वे घने, बदलते, असमान, उपयोगी और उपेक्षित शहरी स्थान हैं। किसी भी गंभीर प्रतिक्रिया को उनकी आर्थिक भूमिका और उनकी संवेदनशीलता दोनों को पहचानना होगा।
सैद-उल-अजायब और हौज रानी में हुई मौतें महज दुर्घटनाएं नहीं। ये वे दायित्व हैं जिन्हें दिल्ली एक ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए टालती आ रही है जो छूट, शॉर्टकट और संस्थागत उदासीनता पर टिकी है। दिल्ली के शहरी गांवों में, जोखिम को सामान्य मान लिया गया है, उसे किराये पर दिया गया है, उस पर कर लगाया गया है, और उसे बर्दाश्त किया गया है।
(पुनीत सिंह सिंघल विकलांगता समावेशन और जलवायु न्याय के पैरोकार हैं। वह 'ग्रीन डिसएबिलिटी' और 'दिल्ली देहात प्रोजेक्ट' के संस्थापक/क्यूरेटर हैं)
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