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आखिर क्या हुआ जो पद न छोड़ने पर अड़े कर्नाटक के मंत्री ईश्वरप्पा को देना पड़ा इस्तीफा? पढ़िए इनसाइड स्टोरी

ईश्वरप्पा ने आखिरकार इस्तीफा दे दिया। हालांकि वह पहले दिन से इस्तीफा न देने पर अड़े थे, तो ऐसा क्या हुआ जो उन्होंने ले लिया मंत्री पद छोड़ने का फैसला? क्या इनसाइड स्टोरी?

फोटो : सोशल मीडिया
फोटो : सोशल मीडिया 

आखिरकार कर्नाटक के मंत्री के एस ईश्वरप्पा ने इस्तीफा दे दिया। ठेकेदार की आत्महत्या मामले में नाम आने के बाद ईश्वरप्पा पर इस्तीफे का दबाव था, लेकिन उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया था कि वे इस्तीफा नहीं देंगे। बताया जाता है कि उन्हें इस मामले में मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई का भी वरदहस्त हासिल था। तो फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने अचानक ऐलान कर दिया कि वे इस्तीफा दे देंगे? और शुक्रवार शाम को उन्होंने ऐसा कर भी दिया।

ठेकेदार की आत्महत्या का मामला सामने आने के बाद ही कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस ने ईश्वरप्पा की घेरेबंदी करते हुए आंदोलन शुरु कर दिया था। कर्नाटक में कांग्रेस नेता डी के शिवकुमार और सिद्धारमैया के साथ ही पार्टी विधायक और कार्यकर्ताओं ने चौबीसों घंटे ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री के एस ईश्वरप्पा के इस्तीफे और गिरफ्तार की मांग को लेकर आंदोलन चला रखा था। लेकिन ईश्वरप्पा इससे बेफिक्र नजर आ रहे थे।

बता दें कि बेलागावी के ठेकेदार संतोष पाटिल ने 12 अप्रैल को उडुपी के एक होटल में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। मृत्यु से पहले अपने दोस्तों के भेजे एक व्हाट्सऐप मैसेज में पाटिल ने अपनी मौत के लिए ईश्वरप्पा को जिम्मेदार ठहराते हे आरोप लगाया था कि उहोंने बेलागावी जिले के हिंडालगा में जो सड़क बनाई थी उसके भुगतान के ऐवज में ईश्वरप्पा ने उनसे 40 फीसदी कमीशन के तौर पर 4 करोड़ रुपए की मांग की थी।

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डी के शिवकुमार और सिद्धारमैया के साथ कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने गुरुवार रात कर्नाटक विधानसभा के बाहर ईश्वरप्पा की गिरफ्तारी को लेकर धरना दिया

इस मामले में पुलिस ने ईश्वरप्पा के खिलाफ एफआईआर तो दर्ज कर ली थी लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई थी, इसके बाद भी ईश्वरप्पा इस्तीफा न देने पर अड़े थे।

बीजेपी सूत्रों के मुताबिक बीजेपी शीर्ष नेतृत्व से नजीदीकी रिश्तों वाले कर्नाटक के एक वरिष्ठ बीजेपी पदाधिकारी ने बसवराज बोम्मई और कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष नलिन कुमार कतील को इस बात के लिए समझा दिया था कि ईश्वरप्पा का इस्तीफा नहीं लेना है। इसका कारण साफ था कि ईश्वरप्पा और कतील दोनों ही बीजेपी के इस पदाधिकारी के राजनीतिक शिष्य माने जाते हैं और कर्नाटक में इन दोनों को इस पदाधिकारी का प्रतिनिधि भी माना जाता है। कहा जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदुयरप्पा से मतभेदों के बाद ईश्वरप्पा इस पदाधिकारी के कहने पर ही संगोली रयन्ना ब्रिगेड से ईश्वरप्पा 2016 में जुड़े थे।

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बीजेपी सूत्रों ने बताया , “इस पदाधिकारी ने केंद्रीय नेतृत्व को समझाया कि अगर ईश्वरप्पा का इस्तीफा लिया जाता है तो पार्टी को पिछड़े तबके की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा, जैसा कि वीरेंद्र पाटिल को सीएम पद से हटाने के बाद कांग्रेस को लिंगायत समुदाय की नाराजगी झेलनी पड़ी थी और यह समुदाय कांग्रेस से दूर चला गया था।”

बताया जाता है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा इस तर्क से सहमत नहीं थे। इसके अलावा इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बिल्कुल खामोश थे, जबकि आखिरी फैसला उन्हें ही करना था। सूत्रों का कहना है ईश्वरप्पा को मंत्रिमंडल में बनाए रखना इसलिए मुश्किल हो गया क्योंकि सीएम बसवराज बोम्मई ने जब कानूनी विशेषज्ञों से सलाह मशविरा किया कि तो उनका यही कहना था कि व्हाट्सऐप मैसेज बेलागावी पंचायत सदस्यों का यह बयान कि ईश्वरप्पा पाटिल से कई बार मिले थे, ईश्वरप्पा के खिलाफ ही जाने वाला था।

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एक अन्य वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा कि साजिश के तहत फंसा हुआ होने का कार्ड भी नहीं चलने वाला था क्योंकि मामला भ्रष्टाचार का था और इसे किसी का समर्थन मिलने क उम्मीद कम ही थी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि ईश्वरप्पा को रयन्ना ब्रिगेड में प्रोत्साहित करने के अलावा राज्य के इस बड़े पदाधिकारी ने शिवमोगा के दो नेताओं येदियुरप्पा और ईश्वरप्पा के बीच 2009 में फूट डालने की कोशिश भी की थी। इसके बाद ही ईश्वरप्पा ने येदियुरप्पा के बेटे को लोकसभा का टिकट दिए जाने पर खुलकर अपनी नाराजगी जताई थी।

ईश्वरप्पा ने 2009 के लोकसभा चुनाव के संसद की कार्यवाही शुरु होते ही यह कर पार्टी की और किरकिरी कराई थी कि चुनाव जजीतने के लिए पैसे और शराब का इस्तेमाल कर वोटरों को रिझाया गया था। उन्होंने कहा था, “मैं खुश हूं कि कर्नाटक से बीजेपी के 19 सांसद जीते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि चुनाव जीतने के लिए अपनाए गए तरीके भी अहम होते हैं। विकास और वैचारिक मुद्दों के बजाए शिवमोगा में चुनाव जीतने के लिए पैसे और शराब बांटी गई थी।”

ईश्वरप्पा के इस्तीफे से जहां कांग्रेस खेमे में उत्साह है कि उनकी मुहिम आखिर रंग लाई, वहीं बीजेपी खेमे में यह धारणा है कि ईश्वरप्पा के इस्तीफे में देरी कर पार्टी ने थाली में सजाकर इस मुद्दे को कांग्रेस के सामने रख दिया।

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