पांच महीने हो गए। संभल लगातार खबरों में है और यहां के मुस्लिम बाशिंदे परेशान हैं। 26 मार्च 2025 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि दिल्ली से महज 150 किलोमीटर दूर पश्चिम यूपी के इस शहर में 54 हिन्दू ‘तीर्थस्थल’ खोजे गए हैं। अब यह छिपा तो है नहीं कि योगी क्यों उत्साहित हैं। काशी, अयोध्या और मथुरा ने जिस तरह ‘हिन्दू संस्कृति को बढ़ावा देने’ (धार्मिक पर्यटन) का मार्ग प्रशस्त किया है, तो संभल इससे बहुत पीछे कैसे रह सकता है?
19 फरवरी 2024 की तारीख थी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभल में एक कल्कि मंदिर की आधारशिला रखी। 24 नवंबर 2024 को विश्व हिन्दू परिषद ने स्थानीय अदालत में याचिका दायर कर इस स्थल पर कानूनी दावा पेश किया जिसमें आरोप लगाया गया था कि संभल की शाही जामा मस्जिद ऐसे स्थान पर बनी है जिसके नीचे मंदिर के अवशेष आज भी मौजूद हैं जिसे वर्ष 1526 में मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था।
अदालत ने उसी दिन आनन-फानन सुनवाई करते हुए दशकों से मस्जिद के रख-रखाव का जिम्मा संभालने वाले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को दावे की पुष्टि के लिए नया सर्वेक्षण करने का आदेश दे दिया। एएसआई ने भी उतनी ही तेजी से उसी शाम मस्जिद में सर्वेक्षण के लिए एक टीम भेज दी, जिसपर प्रतिक्रिया हुई, और झड़पों के बीच पुलिस ने गोलीबारी भी की।
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इतिहासकार डॉ. रुचिका शर्मा ‘हिन्दू इतिहासकारों’ द्वारा समर्थित दावे का मजाक उड़ाते हुए, अभिलेखों के हवाले से उनके सिद्धांत को सिरे से खारिज करती हैं। उनका कहना है कि, “अगर हम इसी तरह खुदाई करते रहे, तो हमें बौद्ध और जैन मंदिर और उनके नीचे नवपाषाण झोपड़ियां भी मिल सकती हैं! इन सबका क्या मतलब है? आप कितनी पुश्त नीचे जाएंगे?”
इलाके में लगातार खुदाई (यहां तक कि अदालती आदेशों का उल्लंघन करते हुए भी) और ध्वंसात्मक कारवाई, भारी पुलिस की मौजूदगी और मुस्लिम निवासियों के अथक उत्पीड़न के कारण संभल में सांप्रदायिकता की आग सुलग रही है।
इस साल होली (14 मार्च) से ठीक पहले संभल के एक पुलिस अधिकारी ने मुसलमानों को होली के दौरान घरों के अंदर रहने की हिदायत दी। उसी पुलिस ने ईद (31 मार्च) से पहले घोषणा की कि मुसलमानों को सड़क पर नमाज पढ़ने की अनुमति तो नहीं ही मिलेगी, अपनी छतों पर भी नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं होगी। यह सुनिश्चित करने के लिए ड्रोन लगाए गए कि आदेश का कहीं उल्लंघन तो नहीं हो रहा! लोगों का आक्रोश सामने आया तो बेबुनियाद बहाने बनाए गए कि यातायात नियंत्रण और दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए ऐसा किया गया। आरएसएस ने पुलिस सुरक्षा के बीच ‘रूट मार्च’ या ‘पथ संचलन’ जरूर निकाला।
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ऐसी आक्रामक सतर्कता सिर्फ संभल तक ही सीमित नहीं रही। मेरठ में एक पुलिस अधिकारी ने घोषणा कर दी कि सड़कों पर नमाज पढ़ते पाए जाने वाले मुसलमानों का पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा। हालांकि सोशल मीडिया पर विरोध के बीच मेरठ के मुसलमानों ने सड़कों पर नमाज पढ़ी। होली, दिवाली, गणेश चतुर्थी, रामनवमी, शिवरात्रि और लगभग एक महीने तक चलने वाली कांवड़ यात्रा की तस्वीरों वाले तमाम पोस्टर उनके नारे की सच्चाई उजागर करते दिखे: ‘सिर्फ मुसलमान ही सड़कों पर इबादत नहीं करते हैं’।
इन सबके बीच मुसलमानों द्वारा दिखाए गए संयम ने किसी गंभीर टकराव की आशंकाओं को दरकिनार कर दिया। संभल के मुसलमानों ने सुझाव दिया कि प्रशासन शायद उन पर भी पुष्प वर्षा करना चाहेगा जैसा कि यूपी पुलिस ने कांवड़ियों के मामले में किया था। यह एक और शालीन इशारा था, जिसे अपनाकर सरकार समाज में सद्भावना का संदेश दे सकती थी लेकिन आश्चर्य की बात नहीं कि ऐसा कुछ नहीं हुआ।
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अभी साफ नहीं है कि भगवान विष्णु के दसवें और अंतिम अवतार के बाद प्रस्तावित कल्कि मंदिर इस अंधकारमय, पतनशील, भ्रष्ट और अराजक (कलियुग) समय का खात्मा करेगा या अंधेरा और घना होगा।
कांग्रेस से बीजेपी में आए और कल्कि धाम परियोजना के अगुवा प्रमोद कृष्णम कहते हैं- “जब से मोदी कल्कि धाम आए हैं, संभल में एक के बाद एक चमत्कार देखने को मिल रहे हैं! नई-नई खोजें सामने आ रही हैं, और ऐसा लग रहा है जैसे भगवान का अवतार अब आसन्न है।”
हिन्दू कट्टरपंथियों का अतिउत्साह और योगी की सार्वजनिक रूप से घोषित महत्वाकांक्षा संभल को ‘हिन्दू धर्म और संस्कृति का एक और प्रमुख केंद्र’ बनाने की है, और इसमें संदेह नहीं है कि इसके पीछे कोई आध्यात्मिक तार नहीं बल्कि यह सब चुनावी गोलबंदी कराकर अपनी राजनीति को धार देने की आकांक्षा से प्रेरित है।
याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि बीजेपी की 2014 के आम चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शानदार जीत की नींव में 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे थे। 2019 के चुनाव में इसने पुलवामा आतंकी हमले और बालाकोट में पाकिस्तान पर हवाई हमले का फायदा उठाते हुए जीत दर्ज की। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी इधर की 126 में से 85 सीटें जीतीं, जो 2017 में 100 से कम थी।
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हालांकि 2024 के आम चुनाव में बीजेपी को झटका लगा। चुनाव अभियान हिन्दू-मुस्लिम अदावत या भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी पर केंद्रित नहीं रहा। बीजेपी के लिए यह झटका हो सकता है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से भी मतदाताओं में वैसा उत्साह नहीं दिखा, जैसा उन्होंने सोचा होगा। इसके विपरीत, मतदाता यह जरूर कहते सुने गए, “बहुत हो गया हिन्दू-मुस्लिम, रहना तो साथ में है”।
दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विवाद के नए-नए मुद्दे और 2024 की हार के बाद से इस क्षेत्र में बीजेपी का आक्रामक प्रयास, राज्य में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए एक व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के साथ गठबंधन में इसका असर ‘सुधार के लक्षण’ के तौर पर दिखा, जब इसने नवंबर 2024 में हुए उपचुनावों में समाजवादी पार्टी से कुंदरकी (संभल से 30 किलोमीटर दूर स्थित) जैसी विधानसभा सीट छीन ली। बीजेपी के एकमात्र हिन्दू प्रत्याशी के सामने 11 मुस्लिम उम्मीदवारों के मैदान में होने से हुआ मतों का विभाजन तो कारण था ही, भारी मात्रा में संसाधनों का इस्तेमाल और सत्ता-प्रशासन की जुगलबंदी भी भाजपा को जीत दिलाने में सफल रही।
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संभल खुद लंबे समय से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी का गढ़ रहा है। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा नेता शफीकुर्रहमान बर्क और उनके पोते जिया उर रहमान बर्क ने सीट बरकरार रखी। इसी तरह, 2022 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के जबरदस्त राज्यव्यापी प्रदर्शन के बावजूद सपा के इकबाल महमूद अपनी विधानसभा सीट बचाने में कामयाब रहे। यहां सपा और बसपा दोनों को मुसलमानों और दलितों से समर्थन मिलता रहा है, जबकि बीजेपी जाति विभाजन से परे अपना एक हिन्दू वोट बैंक बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव 1998 और 1999 में संभल से सांसद रहे, उसके बाद 2004 में उनके चचेरे भाई राम गोपाल यादव यहां से सांसद बने। शफीकुर्रहमान बर्क ने 2009 और 2019 में जीत हासिल करके इस विरासत को आगे बढ़ाया। हालांकि 2014 में बीजेपी ने सत्यपाल सिंह सैनी को इस सीट से जिताकर एक बड़ी सफलता हासिल की। तब से, पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इलाके का गुणा-गणित साधने के लिए सोची-समझी चालें चलती दिख रही है।
बीजेपी की खुल्लमखुल्ला ध्रुवीकरण वाली धार्मिक रणनीति के सामने विपक्ष कई बार गलत ट्रैक पर फंसा दिखता है। उसकी मुश्किल यह है कि खुलकर धर्म पर बहस कर नहीं पाता, क्योंकि इससे उसके अपने वोटर का एक हिस्सा छिटकने का भय है। अफसोस की बात यह है कि विपक्ष की यह पशोपेश बीजेपी को बिना किसी चुनौती के अपने इस आख्यान पर खेलने का खुला मौका दे रही है।
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