
4 जुलाई 1776 को स्वीकृत अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा केवल एक औपनिवेशिक सत्ता से राजनीतिक मुक्ति का दस्तावेज नहीं थी, वह आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना का उद्घोष भी थी। उसमें यह घोषित किया गया था कि सत्ता जनता से आती है, शासक कानून से ऊपर नहीं होता और यदि शासन अत्याचार में बदल जाए तो जनता को उसका प्रतिरोध करने का अधिकार है। ढाई सौ वर्ष बाद जब अमेरिका इस घोषणा की 250वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि समारोह कितने भव्य होंगे, बल्कि यह है कि क्या उस घोषणा की मूल भावना आज भी अमेरिकी राजनीति का मार्गदर्शन कर रही है।
विडंबना यह है कि इस ऐतिहासिक अवसर का नेतृत्व ऐसे राष्ट्रपति के हाथों में है जिनकी राजनीतिक शैली और सार्वजनिक व्यवहार को लेकर बार-बार यह आरोप लगाया गया है कि वे लोकतांत्रिक संस्थाओं की अपेक्षा व्यक्तिकेंद्रित सत्ता में अधिक विश्वास रखते हैं। यही कारण है कि अनेक संवैधानिक विशेषज्ञ, इतिहासकार और लोकतंत्र समर्थक बुद्धिजीवी यह प्रश्न उठा रहे हैं कि जिस दस्तावेज का मूल उद्देश्य राजशाही और निरंकुशता का प्रतिरोध था, उसका उत्सव ऐसे नेतृत्व के अधीन किस अर्थ में मनाया जाएगा।
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स्वतंत्रता की घोषणा का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश था कि कोई भी व्यक्ति- चाहे वह राजा ही क्यों न हो - कानून से ऊपर नहीं है। इसीलिए घोषणा में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज तृतीय पर सबसे पहला आरोप यही था कि उन्होंने कानूनों को स्वीकार करने और जनता की सहमति का सम्मान करने से इनकार किया। लोकतंत्र का वास्तविक जन्म यहीं होता है- जहां सत्ता स्वयं कानून के अधीन हो जाती है।
आज की अमेरिकी राजनीति में इसी सिद्धांत की सबसे अधिक परीक्षा दिखाई देती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अनेक अवसरों पर स्वयं को असाधारण अधिकारों से संपन्न नेता के रूप में प्रस्तुत किया है। कभी उन्होंने अपने निर्णयों को लगभग अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत किया, कभी न्यायपालिका की आलोचना व्यक्तिगत आक्रमणों के रूप में की, तो कभी ऐसे वक्तव्य दिए जिनसे यह धारणा बनी कि राष्ट्रपति की शक्तियों पर संवैधानिक सीमाएं गौण हैं। लोकतंत्र में ऐसी प्रवृत्तियां केवल व्यक्तित्व का प्रश्न नहीं होतीं; वे संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती हैं।
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लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति उसका शक्ति-विभाजन (Separation of Powers) है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे पर नियंत्रण बनाए रखती हैं ताकि कोई भी संस्था सर्वशक्तिमान न बन सके। अमेरिकी संविधान का यही ढांचा दो शताब्दियों से अधिक समय तक उसकी स्थिरता का आधार रहा है। किंतु जब कार्यपालिका न्यायालयों के निर्णयों को चुनौती देने लगे, न्यायाधीशों की व्यक्तिगत निष्ठा पर प्रश्न उठाने लगे या न्यायिक समीक्षा को राजनीतिक षड्यंत्र बताने लगे, तब लोकतंत्र के भीतर एक गहरी संस्थागत बेचैनी जन्म लेती है।
स्वतंत्रता की घोषणा में एक और महत्वपूर्ण शिकायत यह थी कि राजा ने न्यायाधीशों को अपनी इच्छा पर निर्भर बना दिया था। न्यायपालिका की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र की आत्मा है, क्योंकि वही नागरिक और राज्य के बीच अंतिम संतुलन स्थापित करती है। यदि न्यायालय भय, दबाव या राजनीतिक प्रतिशोध के वातावरण में काम करने लगें तो संविधान केवल एक औपचारिक दस्तावेज बनकर रह जाता है।
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हाल के वर्षों में अमेरिका में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बढ़ते टकराव ने इसी प्रश्न को फिर से जीवित कर दिया है। अनेक न्यायाधीशों ने प्रशासनिक निर्णयों पर रोक लगाई, जबकि राष्ट्रपति ने सार्वजनिक मंचों से न्यायाधीशों की तीखी आलोचना की और कुछ मामलों में उनके विरुद्ध महाभियोग जैसी कार्रवाइयों की मांग भी की। यह स्थिति लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए असामान्य मानी जाती है क्योंकि न्यायिक निर्णयों से असहमति का संवैधानिक उपाय अपील है, व्यक्तिगत आक्रमण नहीं।
लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता, उसकी आत्मा नागरिक समाज में रहती है। जब नागरिक अन्याय, असमानता या सत्ता के दुरुपयोग के विरुद्ध शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाते हैं, तभी लोकतंत्र जीवित रहता है। अमेरिकी इतिहास इसका साक्षी है। नागरिक अधिकार आंदोलन से लेकर वियतनाम युद्ध विरोधी अभियानों तक और हाल के वर्षों के जनांदोलनों तक, जनता ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि लोकतंत्र मतदान के बाद समाप्त नहीं होता, वह निरंतर नागरिक सहभागिता से संचालित होता है।
इसी संदर्भ में हाल के "नो किंग्स" जैसे आंदोलनों का विशेष महत्व है। इन प्रदर्शनों का केंद्रीय संदेश किसी एक व्यक्ति का विरोध भर नहीं था, बल्कि यह था कि अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था किसी भी प्रकार की व्यक्तिपूजा या निरंकुश नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकती। लोकतंत्र में नागरिक का कर्तव्य केवल सरकार चुनना नहीं, बल्कि उसकी संवैधानिक जवाबदेही सुनिश्चित करना भी है।
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इतिहास बताता है कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट तब उत्पन्न होता है जब राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के बीच कृत्रिम समानता स्थापित कर दी जाती है। तब सत्ता स्वयं को राष्ट्र का पर्याय घोषित करने लगती है और सरकार की आलोचना को राष्ट्रविरोध बताया जाने लगता है। जबकि स्वतंत्रता की घोषणा का मूल दर्शन ठीक इसका उलटा है। वहां सरकार जनता की सेवक है, राष्ट्र की स्वामिनी नहीं। राष्ट्र जनता है, संविधान है, नागरिक अधिकार हैं- न कि कोई एक नेता या दल।
आज पूरी दुनिया में लोकतंत्र एक नए संक्रमण काल से गुजर रहा है। अनेक देशों में निर्वाचित सरकारें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सत्ता में आने के बाद धीरे-धीरे संस्थागत नियंत्रणों को कमजोर करती दिखाई देती हैं। मीडिया, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय और नागरिक संगठनों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे भीतर से खोखला करती है। इसी कारण लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनावों से नहीं होती; उसकी रक्षा स्वतंत्र संस्थाओं, सक्रिय नागरिक समाज और संवैधानिक नैतिकता से होती है।
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अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वह केवल अमेरिकी इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि सार्वभौमिक लोकतांत्रिक मूल्यों की घोषणा है। उसमें व्यक्त विचार- समानता, स्वतंत्रता, कानून का शासन और जनता की संप्रभुता- किसी एक देश की सीमाओं में कैद नहीं हैं। वे हर उस समाज के लिए मार्गदर्शक हैं जो सत्ता को जवाबदेह और नागरिक को सम्मानित देखना चाहता है।
250वीं वर्षगांठ का वास्तविक उत्सव आतिशबाज़ी, परेड और सरकारी आयोजनों में नहीं, बल्कि उन मूल्यों के पुनर्स्मरण में है जिनके लिए स्वतंत्रता की घोषणा लिखी गई थी। यदि लोकतंत्र का उत्सव मनाना है तो सत्ता के केंद्रीकरण के बजाय संस्थाओं को मजबूत करना होगा; व्यक्तिपूजा के बजाय संविधान के प्रति निष्ठा विकसित करनी होगी; भय के बजाय असहमति के अधिकार की रक्षा करनी होगी।
आखिरकार, स्वतंत्रता किसी राष्ट्र द्वारा एक बार प्राप्त कर लेने वाली स्थायी उपलब्धि नहीं है। प्रत्येक पीढ़ी को उसे फिर से अर्जित करना पड़ता है। लोकतंत्र भी कोई स्थिर अवस्था नहीं, बल्कि सतत जागरूकता, संघर्ष और नागरिक उत्तरदायित्व की प्रक्रिया है। इसलिए स्वतंत्रता की घोषणा के ढाई सौ वर्ष पूरे होने का सबसे बड़ा संदेश यही है कि लोकतंत्र का सम्मान उसके प्रतीकों से नहीं, बल्कि उसके सिद्धांतों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से होता है। वही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी देशभक्ति है और वही किसी भी स्वतंत्रता दिवस का सबसे सार्थक उत्सव।
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