विचार

भारत छोड़ो आंदोलन के 80 साल बाद देश को फिर एकसूत्र में बांधने के लिए 'भारत जोड़ो' यात्रा

‘भारत छोड़ो’ और ‘भारत जोड़ो’ में केवल ध्वनि या तुकबंदी की समानता नहीं है। ऐसी तमाम वजहें हैं जो ‘भारत जोड़ो’ को ‘भारत छोड़ो 2.0’ बनाती हैं। जैसे-जैसे यह आंदोलन आगे बढ़ेगा, इसका आकार बढ़ता जाएगा।

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अगस्त 1942 में यूसुफ मेहर अली की उम्र 40 भी नहीं थी जब उन्होंने ‘क्विट इंडिया’ नामक पुस्तिका लिखी और इसे बाकायदा बंटवाया। तब तक, आजादी की वकालत करने के लिए वह कई बार जेल जा चुके थे। वह बॉम्बे के सबसे कम उम्र के मेयर थे और अपनी प्रशासनिक काबलियत और जनहित के फैसलों के कारण बेहद लोकप्रिय हो गए थे। सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वयं ही युवा यूसुफ को मेयर चुनाव के लिए उम्मीदवार के रूप में नामित करने का फैसला किया था।

14 जुलाई को वर्धा में कांग्रेस की बैठक हुई जिसमें चार प्रस्ताव पारित किए गए:

  1. भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का तत्काल अंत हो;

  2. सभी तरह के फासीवाद और साम्राज्यवाद से खुद को बचाने के लिए भारत की प्रतिबद्धता की घोषणा

  3. अंग्रेजों के जाने के बाद भारत की एक अस्थायी सरकार का गठन किया जाना चाहिए

  4. ब्रिटिश शासन के खिलाफ अवज्ञा आंदोलन।

चौथे प्रस्ताव के तहत छेड़े जाने वाले आंदोलन के लिए एक ऐसा नाम तय करना था जो उस संकल्प की भावना के अनुरूप हो जिसके लिए आंदोलन किया जाना था। संभावित नामों पर चर्चा हुई। लोगों ने अपने-अपने विचार रखे। इसका नाम ‘क्विट इंडिया’ रखने का सुझाव यूसुफ मेहर अली ने दिया और गांधीजी को यह जंच गया।

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यह आंदोलन 8 अगस्त, 1942 को शुरू किया गया। इसे अंग्रेजी सरकार ने बेरहमी से दबा दिया। करीब एक लाख लोग गिरफ्तार किए गए, उन पर लाठीचार्ज किया गया, भारी-भरकम जुर्माना लगाया गया और कांग्रेस को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ वाले भाषण के कुछ ही घंटों के भीतर कांग्रेस के लगभग पूरे नेतृत्व को बिना किसी मुकदमे के गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद जो हुआ, इतिहास है।

देखते-देखते ‘क्विट इंडिया’ का नारा देश के कोने-कोने में करोड़ों लोगों की जुबान पर चढ़ गया। लोगों ने इसका अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद किया। मराठी में यह ‘चले-जाव’ बना। हिंदी संस्करण था ‘भारत छोड़ो’। भाषा कोई भी हो, इस नारे का आशय एक था- ‘बस, बहुत हो गया!’

‘भारत छोड़ो’ और ‘भारत जोड़ो’ में केवल ध्वनि या तुकबंदी की समानता नहीं है। ऐसी तमाम वजहें हैं जो ‘भारत जोड़ो’ को ‘भारत छोड़ो 2.0’ बनाती हैं। जैसे-जैसे यह आंदोलन आगे बढ़ेगा, इसका आकार बढ़ता जाएगा। लोग इससे उसी तरह जुड़ाव महसूस करेंगे जैसा ‘भारत छोड़ो’ के वक्त हुआ था। अगर आगे यह भी कई भाषाओं में अनुदित हो तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। संभव है, आने वाले समय में अंग्रेजी में यह ‘कनेक्ट इंडिया’, कन्नड़ में ‘संपर्किसलु भारत’, तमिल में ‘इन्नाइका नातु’, गुजराती में ‘देश जोड़ी शू’ के नाम से लोकप्रिय हो। एक बार फिर यह आंदोलन बेबसी और घुटन में जी रहे करोड़ों लोगों की आवाज बनने जा रहा है।

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आंदोलन की भावना एक ही है- लोगों को याद दिलाना कि भारत अस्तित्व में है तो इसलिए कि इसका निर्माण एक ऐसे संविधान के आधार पर हुआ जो हमें राज्यों के संघ के रूप में परिभाषित करता है। बिल्कुल अलग सांस्कृतिक रीति-रिवाजों का पालन करने, अलग-अलग धर्मों को मानने वाले और विभिन्न भाषाई पहचान वाले लोग इसलिए एक साथ रह सके क्योंकि हमने विविधता का सम्मान किया। हम एक इसलिए हैं क्योंकि हम अनेक हैं।

सरल शब्दों में इन्नाईका नातु या देश जोड़ी शू आंदोलन का उद्देश्य लोगों को वापस संविधान से जोड़ना है। विभाजनकारी भावनाओं की लगातार बमबारी की वजह से यहां के लोगों और भारत के विचार में जो गहरी खाई खिंच गई है, उसे पाटना इस आंदोलन का मूल भाव है। ‘भारत छोड़ो’ की तरह ही ‘भारत जोड़ो’ आंदोलन सभी भारतीयों से जुड़ा है चाहे वे किसी भी उम्र, लिंग, जाति, धर्म और आर्थिक स्थिति के हों। यह आंदोलन वैसे भारत को पाने के लिए है जैसा वह था। यहां के लोग भारत को एक ऐसे लोकतांत्रिक, राज्यों के संघ और सभ्य देश के रूप में देखना चाहते हैं जिसका आधार एक-दूसरे के प्रति सम्मान पर टिका हो।

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यह हैं भारत जोड़ो यात्रा के पड़ाव

भारत जोड़ो यात्रा उसी स्थिति को पाने के लिए है। अगर 14 जुलाई, 1942 को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले प्रस्ताव मौजूदा संदर्भ में तैयार किए जाएं तो वे काफी-कुछ ऐसे होंगेः

  1. सांप्रदायिक रूप से विभाजनकारी राजनीति का तत्काल अंत

  2. 21वीं सदी के भारत की सभी प्रकार के फासीवाद और क्रोनी-पूंजीवाद से अपनी रक्षा की प्रतिबद्धता की घोषणा

  3. सांप्रदायिक ताकतों की हार के बाद, ऐसी सरकार बनाना जो कानून का राज और संविधान की महत्ता को पुनः स्थापित करेगी;

  4. विविधता, संघवाद और लोकतंत्र के लिए जन आंदोलन

यदि ये ‘भारत जोड़ो’ यात्रा को बढ़ावा देने वाले संकल्प हैं, तो यह यात्रा हाल के दशकों में हुई यात्राओं से काफी अलग होगी। इतना तय है कि यह यात्रा उस रथ यात्रा के असर की काट होगी जिसने एक अंतहीन सांप्रदायिक कलह और बहुसंख्यक-राष्ट्रवाद का रास्ता खोल दिया।

भारत जोड़ो यात्रा ने अभी से किस तरह की उम्मीदें जगा दी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 22 अगस्त को दिल्ली में हुए सिविल सोसाइटी के सम्मेलन में इस यात्रा के समर्थन की घोषणा की गई। सम्मेलन की भावना वास्तव में लोकतांत्रिक थी। विचार-विमर्श की प्रक्रिया में शामिल राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह से मुश्किल सवाल किए गए जिनका उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया। सिविल सोसाइटी के ज्यादातर सदस्य ऐसी वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं जिसमें उनके विचार कांग्रेस से मेल नहीं खाते। फिर भी, ‘भारत जोड़ो’ विचार की ताकत ऐसी है कि उन्हें भी लगा कि वह घड़ी आ गई है जब भारत के लोगों को नफरत, फासीवाद और विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ एकजुट लड़ाई के लिए राजनीतिक दलों से हाथ मिलाने की जरूरत है और इसलिए वे आगे आए।

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संयुक्त बयान में सिविल सोसाइटी ने कहा, ‘हम सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग और असहमति व सच की आवाज को दबाए जाने से व्यथित हैं। हम सत्तारूढ़ दल और उससे जुड़े कथित हाशिए के समूहों (फ्रिंज ग्रुप्स) द्वारा समाज में घृणा, हिंसा और विभाजन को लगातार बढ़ावा दिए जाने के मामले में भी समान रूप से चितिंत हैं। आज का शासन आम लोगों की भलाई को लेकर बिल्कुल उदासीन है। कोविड महामारी जैसे संकट से निपटने में इसकी स्पष्ट विफलता, नोटबंदी जैसे संकट को न्योता देने की उसकी सनकी प्रवृत्ति, बढ़ती बेरोजगारी के प्रति बेपरवाही और देश की संपत्ति और प्राकृतिक संसाधनों की लूट से अपने करीबी बिजनेस घरानों को फायदा पहुंचाने की उसकी प्रवृत्ति चिंताजनक है। हम पूरी दृढ़ता के साथ यह साफ करना चाहते हैं कि इस ऐतिहासिक मोड़ पर अब यह सब नहीं चलने देंगे। जिन्हें भी भारत, इसकी विविधता, मुश्किलों से हासिल आजादी, इसके संविधान और हमारी आने वाली पीढ़ियों के सम्मानजनक भविष्य की परवाह है, उन्हें एक साथ खड़ा होना चाहिए और गणतंत्र को फिर से पाने का संकल्प लेना चाहिए।’

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भारत जोड़ो यात्रा का एक ही प्रतीक होगा- राष्ट्रीय ध्वज। इसमें किसी भी पार्टी या गुट का कोई बैनर नहीं होगा। यह किसी पार्टी या राजनीतिक गठजोड़ को बढ़ावा नहीं देगी। यह अपना पूरा ध्यान लोगों को सुनने, भविष्य के लिए उनके सपनों को समझने, भारत की आजादी से जुड़ी उनकी यादों को सहेजने-गुनने में लगाएगी। साथ ही लोगों को यह भरोसा दिलाएगी कि अगर वे निडरता से ठान लें तो अपनी आवाज को बुलंद कर सकते हैं। यह यात्रा लोगों के मन से डर को निकालने के लिए, उनके मन में यह जगाने के लिए है कि चाहे वे कोई भी हों और बीते समय में कहीं से भी आए हों, भारत उनका है। भारत जोड़ो आंदोलन उन लोगों को श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने भारतीयों को सहिष्णु बनाने में योगदान दिया, जिन्होंने आजादी का सपना देखा और इसे साकार करने के लिए अपना सबकुछ लगा दिया, जिन्होंने अपनी जिदंगी कुर्बान कर दी ताकि भारतीय आजाद और बराबरी की जिंदगी जी सकें।

उस अर्थ में, भारत जोड़ो यात्रा उस ‘स्वतंत्रता’ आंदोलन से कम नहीं जिसे औपनिवेशिक ताकत से आजादी के लिए छेड़ा गया था। इसे हल्के संदर्भों में लेना इसके उद्देश्यों और क्षमता का गलत आकलन होगा।

(गणेश एन देवी कल्चरल ऐक्टिविस्ट और भारत जोड़ो अभियान की शुरुआती बैठक के आयोजकों में से एक हैं)

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