
ये लीजिए, देखते ही देखते कार्तिक आ पहुंचा। अब हम दीपावली और छठ वगैरह के धूम-धड़ाके, जगर-मगर और उल्लास में डूबेंगे। लेकिन क्या आपको मालूम है कि कार्तिक सिर्फ इन पर्वों को ही नहीं लाता, और भी ‘बहुत कुछ’ साथ ले आता है। इतना कि उस 'बहुत कुछ' के लिए हमें उसका बहुत-बहुत कृतज्ञ होना चाहिए।
इस 'बहुत कुछ' से पहले उसके नामकरण को लेकर बाबत चली आती एक पौराणिक मान्यता की बाबत जान लीजिए। भारतीय संवत्सर का आठवां महीना है वह और उक्त मान्यता कहती है कि उसको उसका कार्तिक नाम भगवान शिव ने अपने पराक्रमी पुत्र कार्तिकेय के नाम पर दिया था।
कथा के मुताबिक, वज्रांगासुर का एक पुत्र था तारकासुर। उसको वरदान था कि भगवान शिव के पुत्र के अलावा उसे कोई और नहीं मार सकेगा। यह वरदान उसके लिए अमरत्व के वरदान जैसा था, क्योंकि तब तक शिव की भार्या सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति द्वारा किए जा रहे यज्ञ में अपने पति (यानी भगवान शिव) के अपमान से क्षुब्ध होकर उस यज्ञ के कुड में ही आत्मदाह कर लिया था और इसे लेकर तांडव नृत्य करने के बाद शिव पूर्णतः वीतराग हो गए थे।
इन हालात में तारकासुर असुरों का अधिपति बना तो पूरी तरह आश्वस्त था कि अब जब शिव की पत्नी ही नहीं रहीं तो न उनका कोई पुत्र उत्पन्न होगा और न ही उसे मारेगा। फिर तो मौत उसके पास आ ही नहीं सकेगी।
आगे चलकर खुद को अमर मानते हुए वह तब और निर्भय हो गया, जब उसके नाना अत्याचारों से त्रस्त देवता कामदेव और रति के सहारे भगवान शिव को नए वैवाहिक जीवन के प्रति आकर्षित करने के जतन करने लगे और शिव ने आकर्षित होने के बजाय अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को ही भस्म कर डाला।
लेकिन तारकासुर का दुर्भाग्य कि मन ही मन शिव को अपना पति मान चुकी पार्वती उन्हें पाने के लिए कठिन तपस्या में रत हो गईं तो शिव ने प्रसन्न होकर उनसे विवाह कर लिया। अनंतर, दोनों के संयोग से उनके पुत्र का जन्म हुआ तो उसका नाम कार्तिकेय रखा गया। यही कार्तिकेय बाद में देवताओं के सेनापति बने और उन्होंने तारकासुर का वध किया तो शिव ने प्रसन्न होकर उस वक्त चल रहे महीने का नाम उनके नाम पर कार्तिक रख दिया।
कार्तिक की पूर्णिमा को अब स्नान का बड़ा पर्व माना और विश्वास किया जाता है कि इस दिन पवित्र नदियों में किया जाने वाला स्नान प्रचुर पुण्य फलदायी होता है। दूसरी ओर इसकी अमावस्या को मनाए जाने वाले दीपावली के पर्व को अंधेरे पर प्रकाश की विजय के प्रतीक के रूप में लिया जाता है और उसकी जगर-मगर को लेकर कई किंवदन्तियां प्रचलित हैं।
मुख्य रूप से उसे अयोध्यावासियों द्वारा लंका पर विजय प्राप्त कर वनवास से लौटे भगवान राम के स्वागत में घी के दीये जलाने से जोड़ा जाता है। दीपावली सुख-समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा का पर्व भी है। उससे ग्यारह दिन पहले करवा चौथ का और उसके बाद चार दिनों तक चलने वाला छठ महापर्व भी कार्तिक की ही अमानतें हैं। करवा चौथ की मूल प्रेरणा सावित्री और सत्यवान की बहुप्रचारित कथा है, जिसमें अपने पातिव्रत धर्म के बल पर सावित्री अपने पति सत्यवान के यमराज द्वारा हर लिए गए प्राण को वापस पा लेती हैं। छठ समारोहपूर्वक छठी मैया और सूर्यदेव की उपासना का महापर्व है। छठ से पहले दीपावली के ठीक दो दिन बाद यम द्वितीया का पर्व मनाया जाता है, जिसे भाई दूज या भ्रातृ द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करती हैं।
लेकिन कार्तिक की पहचान हमेशा ऐसी नहीं रही और आज हम उसे जिस रूप में पहचानते हैं, वह उसे कई बदलावों के बाद हासिल हुआ है। जब गांवों में पशु आवारा नहीं हुए थे और पालतू हुआ करते थे, साथ ही मां-बाप अपने परदेस गए बेटों को पत्रों में खेती-बारी के बाद परानी से पहले पशुओं का कुशल-क्षेम लिखा करते थे, तो कार्तिक मर्दों और बली बर्दों का महीना हुआ करता था।
तब मर्दों की पहचान उनकी मूंछ तो बर्दों यानी बैलों की पहचान उनकी पूंछ से हुआ करती थी और कार्तिक के कम-से-कम तेरह दिन उनके दिन-रात एक करके एड़ी-चोटी का पसीना एक करने के दिन हुआ करते थे। कहावत थी : तेरह कातिक तीन अषाढ़।
जब की यह कहावत है, तब सिंचाई के ज्यादा साधन होते नहीं थे। इसलिए खरीफ की फसल कटते ही खेतों की नमी को अगली फसल के लिए सुरक्षित रखने हेतु धूप में उसके सूख जाने से पहले यानी मुंह अंधेरे ही जोतकर पाटा चलाना पड़ता था। खेत की मिट्टी भुरभुरी होने से पहले नमी चली गई तो उसे बीज बोने योग्य बनाने के लिए ढेले फोड़ते-फोड़ते नाक में दम हो जाता था।
कई कहावतों में ‘आदेश’ था कि ‘कातिक मास रात हर जोतो, टांग पसारे घर मत सूतो’। साथ ही चेतावनी भी थी कि कार्तिक महीने को इधर-उधर घूमने, मालपुआ खाने या जुआ खेलने में बिता दिया तो चैत में खेत-खलिहान से बखार में अनाज नहीं आएगा और नहीं आया तो सावन भादों के कठिन दिनों में पापी पेट को भरना कौन कहे, पालना भी बहुत मुश्किल हो जाएगा। ऐसी कोई नौबत न आये, इसकी प्रार्थना करने के लिए अनेक श्रद्धालु इस पूरे महीने तुलसी के पौधों के समक्ष दीये जलाते और तुलसी माता का विवाह रचाते हैं।
बुन्देलखंड और ब्रज वगैरह में इस विवाह को लेकर कई भजन एवं लोकगीत प्रचलित हैं। उनमें तुलसी कभी लक्ष्मी बनकर विष्णु की, तो कभी गौरी बनकर भोले की, कभी सीता बनकर राम की तो कभी राधा बनकर कान्हा की दुल्हनिया बनती हैं। तब सुहागिनें अपने गीतों में उनसे कहती हैं: हरी-हरी तुलसा तू सबेरे अइयो, तोको जमुना स्नान करइयो हो राम। इतना ही नहीं, वे तुलसी के बारे में बताती हैं : रहती नाय तुलसा राम के बिना, अरे राम के बिना घनश्याम के बिना, पौढ़त नाय तुलसा..।....आंगन में तुलसा मेरी पौरी में तुलसा, तो छज्जे बीच बिराजै तुलसा...हाथन में तुलसा मोरे शीश पै तुलसा, तो हिरदय बीच विराजै तुलसा। वे तुलसी को तुलसी महारानी, हरि या शिव की पटरानी और विन्ध्याचल की रानी कहकर उनकी अभ्यर्थना भी करती हैं।
दीपावली के ग्यारहवें दिन देवोत्थानी या देवप्रबोधिनी एकादशी आती है, तो भगवान विष्णु अपनी चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं। तब गन्ने से बने मंडप में उनके शालिग्राम स्वरूप से तुलसी का विवाह कराया जाता है।
तुलसी के विवाह की भी एक रोचक कथा है। यह कि तुलसी पिछले जन्म में वृन्दा के रूप में राक्षस कुल में जन्मी थीं और दानवराज जलंधर की पत्नी होने के बावजूद भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं। विष्णु ने उनको वरदान दे रखा था कि जब तक वह पतिव्रता के रूप में उनकी पूजा में रत रहेगी, उसके पति का बाल भी बांका नहीं होगा। इससे जलंधर को सुरक्षा कवच-सा हासिल हो गया था और वह इतना मनबढ़ हो चला था कि उसने एक बार विष्णु को ही युद्ध के लिए ललकार दिया था।
अनंतर, उसने देवताओं से युद्ध ठान लिया और देवता उसके आगे पूरी तरह बेबस हो चले तो शिव को साथ लेकर वे विष्णु के पास गए और उनसे सहायता की याचना की। इस पर विष्णु जलंधर का रूप धरकर वृन्दा के महल में गए और उनका पतिव्रत भंग कर दिया। फिर क्या था, शिव ने जलंधर का सिर उसके धड़ से अलग करने में देर नहीं की।
वृन्दा की गोद में आ गिरे जलंधर के कटे हुए सिर से निकली आवाज ने विष्णु के छल का भांडा फोड़ दिया तो रोष और क्षोभ से भरी वृंदा ने छल से अपना सतीत्व भंग करने के विष्णु के अपराध को अक्षम्य अताकर उन्हें पत्थर हो जाने का शाप दे दिया। इससे देवताओं में हाहाकार मच गया और उन्हें लगा कि वे जीती हुई बाजी हार गए हैं। तब वे प्रार्थनाओं पर उतर आए तो द्रवित होकर वृन्दा ने अपना शाप वापस ले लिया और सती हो गईं। उनकी चिता की राख से एक पौधा उगा, जिसका नाम तुलसी रखा गया और उसे वृन्दा का ही रूप माना जाने लगा।
कार्तिक की पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं क्योंकि शिव इसी दिन त्रिपुरारी नामक असुर का अंत कर त्रिपुरारी बने थे। यह पूर्णिमा गुरुनानक का जन्मदिन होने के ब्याज से सिख धर्म के अनुयायियों का गुरुपर्व या प्रकाश पर्व भी है। ब्रज में इस पूर्णिमा का एक खास स्नान गीत है: जागिये ब्रजराज कुंवर भोर भयो अंगना, चिरई जागे चिरौटा जागे पंछी चाले चुगना, गैल के बटोही जागे गोदी जागे ललना, संग की सब सखियां चाली हमहूं चाली जमना।
लोकजीवन में इस पूरे महीने शरीर पर तेल न लगाने और आंवले के पेड़ के नीचे भोजन पकाने-खाने से पूरे कुटुम्ब के लिए बैकुंठ के द्वार खुल जाने की बात कही जाती है। आषाढ़ के विपरीत कार्तिक में वर्षा को अनहोनी का पर्याय माना और कहा जाता है कि कार्तिक की छांट (यानी वर्षा) हाकिम की डांट, भाइयों की आंट (अनबन) और बनियों की नाट (उधर देने से इनकार) जितनी ही बुरी होती है।
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