
हाल ही में जिस तरह आनन-फानन ससंद में दो बिल पेश करके उन्हें पास कराया गया, उसने जानकारों को हैरान कर दिया है। सत्ताधारी पार्टी को आखिर अचानक उन लेबर कोड्स को लागू करने की क्या जरूरत पड़ गई, जो 2019 और 2020 में बनाए गए थे? मनरेगा को वीबी-ग्राम-जी से बदलने में इतनी जल्दबाजी क्यों की गई और यह इतने ढके-छिपे तरीके से क्यों किया गया? आम तौर पर संरचनात्मक सुधार और अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने के अलावा इनका कोई खास मतलब नहीं होता।
हालांकि, इन दोनों कानूनों का मकसद अब साफ होता जा रहा है - ये मजदूरों की मोलभाव करने की ताकत को कम करते हैं और मजदूरी घटाते हैं। मजदूरों, किसानों और विपक्ष ने जल्दी ही इस बात को समझ लिया है, जिससे देश भर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। ग्रामीण और शहरी भारत में 60 करोड़ से ज्यादा मजदूर हैं और अगर उन्हें प्रभावी ढंग से संगठित किया जाए तो उनका विरोध बहुत बड़ा हो सकता है।
बहरहाल, कुछ अहम सवाल बने हुए हैं:
क्या सत्ताधारी पार्टी को इसके बुरे राजनीतिक नतीजे भुगतने पड़ेंगे?
क्या ग्रामीण और शहरी मजदूर भी वही कर पाएंगे जो किसानों ने किया?
क्या वे सरकार को उन दो बदलावों को वापस लेने के लिए मजबूर कर पाएंगे, जिन्हें उनकी ताकत कम करने के लिए बनाया गया है?
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लेबर कोड मजदूरों की मोलभाव करने की ताकत को कम करते हैं, ट्रेड यूनियनों को कमजोर करते हैं, और एक मजदूर को मालिक के शोषण से मिलने वाली सुरक्षा छीन लेते हैं।
इनकार नहीं कि मनरेगा में भी कमियां थीं, फिर भी इसने ग्रामीण गरीबों के रोजगार और आय को बढ़ाया। कम मजदूरी (अक्सर न्यूनतम मजदूरी से भी कम) और एक परिवार के एक वयस्क सदस्य को अधिकतम 100 दिन काम की सीमा (सालाना लगभग 20 दिन की मजदूरी प्रति सदस्य) के बावजूद, इसने महामारी जैसे संकट के समय आय अर्जित करने में मदद की। पैसे की कमी के कारण, इसने औसतन 100 दिन सालाना के वादे के मुकाबले सिर्फ 50 दिन का काम दिया, फिर भी इसने हाशिये पर रहने वाले समुदायों को राहत दी।
सरकार, बदलावों को सही ठहराते हुए तर्क दे रही है कि लेबर कोड मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करेंगे और वीबी-ग्राम-जी योजना में काम के दिन 100 से बढ़ाकर 150 करने से खेत मजदूरों को फायदा होगा। केंद्र ने 2024-25 में आवंटन को 86,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 95,692 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव दिया है। लेकिन, अगर राज्य अपनी कमजोर बजटीय स्थिति और भारी कर्ज के कारण 55,590 करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाते हैं, तो केन्द्र भी कम खर्च करेगा, जिससे कुल आवंटन 2024-25 के मुकाबले काफी कम हो जाएगा।
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मांग-आधारित मनरेगा से आपूर्ति-बाधित स्कीम का यह बदलाव केन्द्र सरकार को आवंटन पर मनमर्जी करने की छूट देगा और राज्यों को उसके रहमो-करम पर निर्भर रहना होगा। बदलावों को बेशक मजदूरों के पक्ष में दिखाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन हकीकत यही है कि ये सुधार असल में कृषि और गैर-कृषि, दोनों क्षेत्रों के मजदूरों को कमजोर करने के लिए बनाए गए हैं।
ऐतिहासिक रूप से, भारत में मजदूर आंदोलन कमजोर ही रहे हैं, क्योंकि 94 प्रतिशत कामगार असंगठित क्षेत्र में है। उनमें महंगाई के हिसाब से मजदूरी बढ़ाने की मांग करने, इसके लिए मोलभाव करने की ताकत नहीं है। इस क्षेत्र के जो भी आंकड़े हैं, वे संदिग्ध हैं क्योंके ये पुराने हैं। उत्पादन में मजदूरी का कम और घटता हिस्सा अपनी कहानी खुद कह रहा है। ऊपर से तकनीकी प्रगति काम की उपलब्धता को कम कर रही है।
सवाल यह उठता है कि अचानक मजदूरों को कमजोर करने का यह कदम क्यों उठाया गया? असली मुद्दा राष्ट्रपति ट्रंप की दादागिरी और भारतीय अर्थव्यवस्था के ऊपर पड़ रहे इसके नतीजे हैं। एक तरफ ज्यादा मजदूरी वाले निर्यात पर असर पड़ रहा है और दूसरी तरफ अमेरिका भारतीय कृषि के बड़े हिस्से को खोलने की मांग कर रहा है, जिसे अगर मान लिया गया, तो करीब 50 फीसद भारतीयों की आय पर बुरा असर पड़ेगा।
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ये बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था के इन दोनों खतरों से निपटने की कोशिश करते हैं। नए लेबर कोड गैर-कृषि क्षेत्र की समस्याओं का सामना करते हैं जबकि वीबी-जीराम-जी कृषि क्षेत्र की चुनौती का। दोनों ही मामलों में, भारत सरकार राष्ट्रपति ट्रंप की मांगों का बोझ मजदूरों पर डालने की कोशिश कर रही है।
भारतीय व्यवसायी चाहते हैं कि अमेरिका के साथ ट्रेड एग्रीमेंट जल्दी हो जाए। लेकिन ट्रंप की यह मांग कि भारत रूस से कच्चे तेल के आयात पर लगाम लगाए और कृषि क्षेत्र को खोले, राजनीतिक रूप से मुश्किल मुद्दे हैं। फिर भी, भारत ट्रंप की मांगों के आगे झुक रहा है। पिछले साल के बजट में कई आयात शुल्क में कटौती की गई, अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ाया गया, रक्षा उपकरणों का आयात बढ़ाया गया और कपास पर आयात शुल्क हटा दिया गया।
संसद के हालिया शीत सत्र में जल्दबाजी में पास किया गया ‘शांति’ बिल, परमाणु उपकरण देने वाले की जिम्मेदारी कम करता है ताकि अमेरिकी आपूर्तिकर्ता भारत को सामान बेच सकें। वॉशिंगटन में आजकल इस बात की चर्चा है कि रूसी तेल आयात करने वाले देशों पर 500 फीसद तक टैरिफ लगाया जाए। ऐसे में कोई व्यापार संभव ही नहीं होगा।
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भारतीय निर्यात अमेरिका के 50 फीसद तक टैरिफ लगने से गैर-प्रतिस्पर्धी हो गए हैं, जिससे निर्यातकों को प्रॉफिट मार्जिन घटाने और/या सैलरी में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। निर्यातक अपने ट्रेड का कुछ हिस्सा यूएई जैसे तीसरे देशों के जरिये कर रहे हैं, जहां टैरिफ कम है। लेकिन इसके लिए बिचौलियों को पेमेंट करना पड़ता है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन पर असर पड़ता है।
पिछले कुछ महीनों में निर्यात में गिरावट के ट्रेंड से निर्यातकों को नुकसान हो रहा है। हालांकि, रुपये की कीमत में गिरावट से उन्हें कुछ राहत जरूर मिली है क्योंकि इससे रुपये की कीमत कम किए बिना डॉलर की कीमत कम हो जाती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए यह समझा जा सकता है कि आरबीआई डॉलर के मुकाबले रुपये को क्यों गिरने दे रहा है। लेकिन अगर ट्रंप भारतीय सामानों पर टैरिफ घटा देते हैं तो ये सारे झंझट खत्म हो जाएंगे।
रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंधों के कारण कच्चे तेल के आयात में कटौती हुई है। इससे पता चलता है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करना ही होगा और यह भी तकरीबन तय है कि उसके लिए कृषि क्षेत्र खोलना होगा। क्या कारोबारी दबाव में नीति निर्माता भारतीय कृषि और दूध बाजारों के हितों की बलि देंगे?
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क्या भारतीय किसान भारी सब्सिडी का लाभ ले रहे ईयू और अमेरिकी किसानों से मुकाबला कर सकते हैं? सस्ते आयात से उत्पादों की कीमतें एमएसपी से भी नीचे चली जाएंगी, जिससे किसानों का नुकसान और बढ़ जाएगा। इसीलिए मजदूरी कम करना और इनपुट सब्सिडी बढ़ाना एक रणनीतिक कदम बन जाता है।
वीबी-जीराम-जी बिल खेती की मजदूरी को घटाता है। यह अमीर किसानों की मनरेगा को कमजोर करने की मांग के भी अनुकूल है, जिनके मुताबिक इससे मजदूरों की कमी हुई और मजदूरी भी बढ़ी। नया बिल कटाई और बुवाई के पीक सीजन में छूट देकर इस मांग को पूरा करता है। तो क्या अमीर किसानों को खुश होना चाहिए? नहीं, क्योंकि खेती की कम मजदूरी से होने वाला फायदा, सस्ते आयात की वजह से किसानों को होने वाले नुकसान से बहुत कम होगा।
कुल मिलाकर इसकी कोई गारंटी नहीं है कि ट्रंप- भारत के प्रति उनके मौजूदा रुख को देखते हुए- टैरिफ को भारत के प्रतिस्पर्धियों के बराबर कम करेंगे। अमेरिका भारत के साथ रणनीतिक भागीदारी से दूर होता जा रहा है। इस अनिश्चितता को देखते हुए क्या सरकार को कृषि क्षेत्र खोलने के बारे में सोचना भी चाहिए?
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इसलिए, मजदूरों को कमजोर करना कोई हादसा नहीं। इसे जमीन तैयार करने के लिए बनाया गया है, और यह शायद ट्रंप के सामने अंततः हथियार डालने का एक संकेत है। कम मजदूरी और भारतीय कृषि क्षेत्र खुलने से भारत में असमानता बढ़ेगी, मांग कमजोर होगी, और निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास दर पर बुरा असर पड़ेगा। इससे जाहिर है कि मजदूरों और किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। हालांकि, उनकी मदद करने के बजाय, सत्ताधारी पार्टी ने बिजनेस के हितों की रक्षा करना चुना है।
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