
अडानी एग्री लॉजिस्टिक्स और लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड के हाथों में अनाज भंडारण का सिमटते जाना भारतीय कृषि के लिए एक चिंताजनक बदलाव का संकेत है, जो इसे एक विकेन्द्रीकृत, सरकार संचालित मॉडल से कॉरपोरेट-संचालित मॉडल में बदल रहा है।
एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) के भंडारण आधुनिकीकरण कार्यक्रम का अभिन्न अंग रहे एकाधिकार-विरोधी क्लॉज को हटाकर, सरकार ने कंपनियों को 16,500 करोड़ रुपये के अनाज भंडारण और प्रबंधन के 134 में से 110 अनुबंध सौंप दिए। यह आवंटन कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कुल 60 लाख मीट्रिक टन की नियोजित भंडारण क्षमता में से 46.5 लाख मीट्रिक टन का प्रबंधन अब अडानी और लीप इंडिया द्वारा किया जाएगा।
इस साझेदारी में 200 नए स्टील भंडार गृह बनाना शामिल है, जिसमें बड़े हब रेल लाइनों से जुड़े होंगे और छोटे हब खेतों के पास खरीद केन्द्रों पर स्थित होंगे। जमीन की लागत 6-8 हजार करोड़ रुपये अनुमानित है; भंडार बनाने की लागत 15-20 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है। इससे सरकार तत्काल जरूर जमीन अधिग्रहण और निर्माण के खर्चे से बच जाती है, लेकिन दीर्घकाल में, यह पीपीपी मॉडल बहुत महंगा पड़ेगा।
एफसीआई और सरकार इस परियोजना को 45,000 करोड़ में पूरा कर सकते थे। पीपीपी मॉडल के तहत, 30 साल की अवधि के लिए भंडारण और प्रबंधन शुल्क के तौर पर 4,000 करोड़ रुपये सालाना की दर से कुल नुकसान 1.2 लाख करोड़ रुपये का है। जैसा कि आलोचकों का कहना है, खाद्य श्रृंखला के ‘आधुनिकीकरण’ की आड़ में सरकार सुनिश्चित कर रही है कि मुनाफा निजी हाथों में जाए।
Published: undefined
यह एकाधिकार और भी अधिक चिंताजनक है क्योंकि एफसीआई ने शुरू में स्वयं एकाधिकार-विरोधी क्लॉज का प्रस्ताव रखा था, ताकि किसी एक कंपनी को बाजार पर कब्जा करने से रोका जा सके। पीपीपी मूल्यांकन समिति की फाइलों से हासिल एक अहम दस्तावेज दिखाता है कि नीति आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग ने टेंडर की रूपरेखा को बदला। सबसे अहम बदलाव एकाधिकार-विरोधी क्लॉज हटाना ही नहीं, बल्कि ‘बंडल बिडिंग’ की ओर जानबूझकर बढ़ना था। बंडल जितना बड़ा होगा, वित्तपोषण की जरूरत उतनी ही ज्यादा होगी। इसका असर यह है कि 3-4 हजार करोड़ रुपये का बंडल मध्यम आकार की वेयरहाउसिंग कंपनियों को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर देता है।
संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अफलातून आगाह करते हैं, ‘इसका मतलब पीडीएस का अंत होगा।’ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत, पीडीएस हर महीने लगभग 81.35 करोड़ लोगों तक पहुंचती है, जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा कल्याणकारी कार्यक्रम बनाता है।
इस ‘अहम’ फैसले को लेकर, सरकार ने कृषि विपणन के निजीकरण के लिए तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को जैसे फिर लागू कर दिया है। हालांकि सरकार दावा करती है कि वह एमएसपी पर चावल और गेहूं की खरीद जारी रखेगी, लेकिन संदेह तो है ही। किसानों को आशंका है कि कॉरपोरेट निकायों द्वारा अनाज के भंडारण को नियंत्रित करने के साथ ही सरकारी नियंत्रण और संतुलन कमजोर हो जाएंगे। यह भंडारण नेटवर्क अदानी समूह को आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित करने में सक्षम बनाएगा और निजी खिलाड़ियों के फायदे के लिए एमएसपी घटाया जा सकता है।
Published: undefined
किसान इसे खाद्य सुरक्षा के निजीकरण की दिशा में एक कदम के रूप में देखते हैं, जो कृषि कानूनों के खिलाफ उनके पहले के विरोध प्रदर्शनों की याद दिलाता है। अदानी और लीप इंडिया के पास करीब 80 फीसद भंडारण क्षमता होने से, किसानों के पास विकल्प कम होंगे। परंपरागत रूप से, एफसीआई किसानों से सीधे एमएसपी पर चावल और गेहूं खरीदता है। निजी खिलाड़ियों द्वारा भंडारण संचालित करने के साथ, खरीद प्रक्रिया उनके हाथों में चले जाने की आशंका है। किसान संघों का तर्क है कि भंडारण और लॉजिस्टिक्स के निजीकरण के बाद, सरकार की तोलमोल की ताकत कमजोर हो जाएगी और इससे एफसीआई का खरीद दायरा घट सकता है, जो अंततः एमएसपी को कमजोर करेगा। निजी खिलाड़ी शायद उतने सख्त नियमों से बंधे न हों जिससे भुगतान में देरी, विवादों और विवाद समाधान को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
भारतीय कृषि पर कॉरपोरेट नियंत्रण- जो इनपुट, आपूर्ति श्रृंखलाओं और भूमि पर एकाधिकार जमाने वाली कृषि-व्यवसायों द्वारा संचालित है- खाद्य सुरक्षा के चार स्तंभों: उपलब्धता, पहुंच, उपयोग और स्थिरता को खतरे में डालकर एक गंभीर संकट पैदा करेगा। किसान नेताओं का तर्क है कि विविध, मुख्य फसल-आधारित खेती से नकद फसलों (जैसे ब्रोकली, खीरे और अन्य विदेशी सब्जियों) की ओर बदलाव, अस्थिर कीमतों के साथ मिलकर, 16 करोड़ से अधिक किसानों की आजीविका को नष्ट कर देगा।
Published: undefined
अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के महासचिव और प्रमुख किसान नेता, डॉ. आशीष मित्तल का मानना है कि राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम में संशोधन और कॉरपोरेट को भंडारण अनुबंध देने के दो उद्देश्य हैं। पहला: अमेरिकियों को भारी सब्सिडी वाले सोया और मक्का जैसी फसल हमारे देश में ऐसी दरों पर डंप करने की अनुमति देना, जिनसे हमारे किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। दूसरा: कृषि भूमि को कौड़ियों के दाम पर हथियाना और इसे शहरीकरण के लिए बिल्डर लॉबी को सौंप देना।
पेशे से एनेस्थेटिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट डॉ. दर्शन पाल, जो पंजाब में क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष हैं, का मानना है कि इस कदम का उद्देश्य बड़े जमींदारों के लिए कृषि भूमि पर कब्जे को आसान बनाना है। वह कहते हैं- ‘पिछले दशक में, हमने 14.3 करोड़ हेक्टेयर खेती योग्य भूमि में से 40 लाख हेक्टेयर खो दी। इससे बड़े पैमाने पर किसानों का पलायन हुआ। सरकार क्या भूल रही है कि हमारी 68.5 फीसद आबादी गांवों में है? आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण उन्हीं श्रमिकों की बात करता है जिन्होंने नौकरियों के लिए आवेदन किए। लेकिन बड़ी संख्या ऐसी है जिसने आवेदन नहीं किया। पीडीएस भी जनगणना आधारित है। मेरा मानना है कि रियायती अनाज की एक-तिहाई जरूरत पूरी नहीं हो रही। (ग्रामीण परिवार में मासिक करीब 14.5 किलो अनाज और दालों की खपत है, लेकिन ये जितनी दाल खाते हैं, वह जरूरी पोषण के हिसाब से बेहद कम है। हर व्यक्ति को हर दिन 85 ग्राम दाल खाने की सलाह दी जाती है, राजस्थान में गांव के परिवार हर महीने सिर्फ .46 किलो और मणिपुर में हर महीने .35 किलो दाल खाते हैं।)
Published: undefined
साफ है कि इस सरकार की कृषि क्षेत्र को बनाए रखने में कोई दिलचस्पी नहीं। भारत का कॉरपोरेट ऋण बढ़कर 645 अरब डॉलर हो गया है, यानी जीडीपी का 17 फीसद। लेकिन यूरिया की लागत ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में सरकार ने कुछ खास नहीं किया (हर बोरी 90 फीसद सब्सिडी के दावे के अलावा)। डॉ. पाल का तर्क है, ‘ईरान से तेल खरीदने से यूरिया की लागत घटेगी। 45 किलो की बोरी की कीमत 265 रुपये है, लेकिन यह 400 रुपये पर भी उपलब्ध नहीं।’
भाकियू महासचिव युद्धवीर सिंह का कहना है कि एक बार जब कॉरपोरेट को किसानों से खरीदने की इजाजत मिल जाएगी, तो मंडी प्रणाली और आढ़तियों से किसानों को सदियों से मिल रहा समर्थन खत्म हो जाएगा।’ सिंह हिमाचल में अदानी एग्री फ्रेश द्वारा छोटे बागान मालिकों को कम दरों को स्वीकार करने के लिए मजबूर करके सेब बाजार पर व्यावहारिक रूप से कब्जा करने का उदाहरण देते हैं। इन किसानों ने न्यूजीलैंड और अमेरिका जैसे देशों से मुक्त व्यापार समझौतों का विरोध किया है। अगर आयातित सेब आ गए तो 15 लाख से अधिक किसान परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।
सिंह कहते हैं, ‘हमारे पास लड़ने के अलावा विकल्प नहीं। रणनीति पर विचार के लिए मध्य जून में बैठक प्रस्तावित है।’ अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव विजू कृष्णन ने ‘एकाधिकार-विरोधी’ क्लॉज को बहाल करने और कॉरपोरेट समूह की भंडारण क्षमता की सीमा तय करने की मांग की है। सभा ने पीपीपी मूल्यांकन समिति की भूमिका की जेपीसी से जांच की मांग की है, जिसके तहत एकाधिकार-विरोधी और उन तमाम क्लॉज हटाए गए जो एकाधिकार को रोक सकते थे। उनका कहना है कि कॉरपोरेट एकाधिकार के बजाय सार्वजनिक निवेश के जरिये एफसीआई की भंडारण क्षमता को मजबूत करना समय की मांग है।
Published: undefined
Google न्यूज़, व्हाट्सएप, नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia
Published: undefined