
बिहार चुनावों में जमीनी हकीकत और एग्जिट पोल के अनुमानों को गलत साबित करते हुए एनडीए ने विधानसभा चुनाव जैसे-तैसे जीत लिया। चुनाव आयोग ने मंगलवार देर रात जो आखिरी नतीजे घोषित किए उसके मुताबिक 243 सीटों वाली विधानसभा में एनडीए को 125 और महागठबंधन को 110 सीटें मिली हैं। यह चुनाव कांटे की टक्कर के बाद भले ही महागठबंधन हार गया हो लेकिन तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी ने 75 सीटें हासिल कीं और बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस ने 19 औक वामदलों ने 16 सीटों पर जीत हासिल की।
इन चुनावों में कई मुद्दे सामने आए। लेकिन मुख्य रूप से तीन राजनीतिक विचार उभरे हैं जिनमें इन चुनावों का सार सिमटा कहा जा सकता है।
सबसे पहली बात तो यह कि करीब दो दशक के बाद बिहार की सत्ता पर उच्च जातियों का कब्जा हो गया, जिस पर अभी तक ओबीसी का कब्जा रहा था। दूसरी बात यह कि नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री बन जाएं, लेकिन बिहार की राजनीति में उनका कद बहुत बौना हो गया है। और तीसरी और अहम बात यह कि लालू यादव के सामाजिक न्याय की विरासत अभी खत्म नहीं हुई है क्योंकि इस चुनाव में तेजस्वी यादव अपने पिता की जगह भरने में पूरी तरह कामयाब रहे हैं।
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नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने इस बार बिहार जीतने के लिए ऐसी दो चालें चलीं कि बिहार की सत्ता पिछड़ों के हाथों से निकलकर सीधे उच्च जातियों के हाथों में चली गई। प्लान ए तो यह था कि किसी तरह तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले महागठबंध को सत्ता में आने से रोका जाए क्योंकि वे सामाजिक न्याय के नारे के साथ ओबीसी की आकांक्षाओं को पूरा करते दिख रहे थे। और प्लान बी यह था कि कैसे नीतीश कुमार का कद छांटा जाए ताकि गैर यादव पिछड़ों को सत्ता में दूसरे दर्जे का साझीदार बनाकर लालू के बाद के बिहार में उच्च जातियों को सत्ता का नियंत्रण दिया जाए।
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बीजेपी ने रणनीति के तहत दो छद्म दलों (ऐसे दल जो बजाहिर तो अलग होते हैं लेकिन काम किसी एक दल के फायदे के लिए करते हैं) को मैदान में उतारा। ओवैसी की अगुवाई वाले एआईएमआईएम को अल्पसंख्यक बहुल सीमांचल में उतारा गया। ओवैसी का काम यह था कि वे मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाएँ र 1989 से आरजेडी की जीत का मंत्र रहे एमवाई (मुस्लिम यादव) फैक्टर को नुकसान पहुंचाएं। दूसरी तरफ लोक जनशक्ति पार्टी के नए अध्यक्ष चिराग पासवान को मैदान में उतारा गया जिन्होंने गैर-यादव पिछड़े तबके में सेंध लगाई ताकि ताकि नीतीश कुमार को दोयम दर्जे की हैसियत में लाया जा सके।
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एआईएमआईएम और एलजेपी दोनों ने ही अच्छे से वादा निभाया। एआईएमआईएम ने भले ही पांच सीटें जीती हों लेकिन उन्होंने महागठबंधन की संभावनाओँ पर सीमांचल में कम से कम 10 सीटों पर नुकसान पहुंचाया। एआईएमआईएम के हिस्से में गया हर वोट दरअसल बीजेपी विरोधी वोट था जिससे बीजेपी को उन सीटों के जीतने में आसानी हुई जहां महागठबंधन आसानी से जीत सकता था।
दूसरी तरफ एलजेपी ने भले ही 137 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ एक सीट जीती हो, लेकिन विश्लेषण बताते हैं कि कम से कम 75 सीटों पर इसने जेडीयू को नुकसान पहुंचाया। नतीजतन नीतीश कुमार की सीटें घटकर 43 पर सिमट गईं।
इस तरह बिहार में गैर यादव-ओबीसी राजनीति के दूसरे सबसे बड़े ध्रुव से मात्र एक बौने नेता की हैसियत में रह गए और उच्च जातियों के हाथ में सत्ता का नियंत्रण आ गया। इस तरह मोदी और उनकी टीम ने करीब दो दशक से बिहार की सत्ता से ओबीसी को निकाल बाहर किया।
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इस सबके बावजूद तेजस्वी यादव की अगुवाई में आरजेडी ने सिंगल लार्जेस्टी पार्टी यानी विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। इसका साफ संकेत है कि ओबीसी भले ही हार गए हों लेकिन राजनीति में उनकी पैठ बरकरार है। तेजस्वी युवा हैं और लोगों में उनकी लोकप्रियता की बानगी इस चुनाव में दिख ही चुकी है, ऐसे में उच्च जातियों की आंख में तेजस्वी यादव लंबे समय तक चुभते जरूर रहेंगे।
दरअसल बीते दो दशक से बिहार की उच्च जातियां राजनीति से सामाजिक न्याय को हटाने की कोशिश में लगी हुई थीं। ऐसे में नरेंद्र मोदी अब गर्व के साथ कह सकते हैं कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के बाद बिहार को भी उच्च जाति हिंदुओं की झोली में डाल दिया है।
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वैसे भी बिहार की जीत कोई छोटी जीत नहीं है क्योंकि नरेंद्र मोदी संघ की उच्च जातियों के वर्चस्व वाली राजनीति के एकछत्र नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं। देश की राजनीति और सत्ता को नियंत्रित करने वाले बिहार औ उत्तर प्रदेश पूरी तरह उच्च जातियों के नियंत्रण में हैं, इसीलिए वह भारतीय सत्ता के खिलाड़ियों में लोकप्रिय हैं। और यही कारण है कि नोटबंदी और कोरोना के सख्त लॉकडाउन के बाद भी वे बीजेपी के समर्थन में खड़े हैं भले ही इससे देश को कितना भी नुकसान क्यों न हुआ हो।
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