
हाल के चुनावों में बांग्लादेश नेशनिलस्ट पार्टी (बीएनपी) की भारी जीत को विपक्षी जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के साथ एक लंबे टकराव की शुरुआत माना जा सकता है। इसका कारण जुलाई के जनमत संग्रह चार्टर का समर्थन करने के बावजूद बीएनपी का संविधान सुधार आयोग (सीआरसी) में शामिल होने से इनकार करना है, जो देश की राजनीति में दरार को उजागर करता है।
आम चुनाव और जनमत संग्रह एक साथ होने का नतीजा था कि निर्वाचित सांसदों को दो शपथ लेनी पड़ी- एक सांसद के रूप में और दूसरी सीआरसी सदस्य के रूप में। दूसरी शपथ के तहत सांसदों के लिए जुलाई चार्टर लागू करना अनिवार्य था। बीएनपी के एक वरिष्ठ नेता ने 'नवजीवन' को बताया, “सीआरसी सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद हम जुलाई चार्टर लागू करने के लिए बाध्य तो हैं ही, चार्टर के प्रमुख प्रावधानों पर हमारी असहमति भी दरकिनार हो जाती है।”
संविधान सुधार आयोग (सीआरसी) के गठन को औपचारिक संविधान से बाहर बताते हुए, बीएनपी की नीति-निर्माण स्थायी समिति के सदस्य और नव-निर्वाचित सांसद सलाहुद्दीन अहमद ने कहा, “हम संविधान सुधार आयोग के सदस्य के रूप में नहीं चुने गए हैं; परिषद के गठन को अभी संविधान में शामिल किया जाना बाकी है।”
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17 फरवरी की सुबह स्थिति तब और नाज़ुक हो गई जब जमात और एनसीपी के नवनिर्वाचित सदस्यों ने सांसद के रूप में शपथ लेने से इनकार कर दिया। जमात के उप-प्रमुख अब्दुल्ला मोहम्मद ताहिर ने कहा, “हम तब तक शपथ नहीं लेंगे जब तक बीएनपी सांसद नियमित सांसदों के साथ संविधान सुधार आयोग के सदस्य के रूप में शपथ नहीं लेते।” बंद दरवाजे के पीछे चली लंबी बातचीत के बाद उन्होंने दोहरी शपथ ली, लेकिन प्रधानमंत्री तारिक रहमान और उनकी कैबिनेट के शपथ ग्रहण का बहिष्कार किया। हालांकि, सत्तारूढ़ बीएनपी संविधान सुधार आयोग से बाहर ही रही।
तो जमात और एनसीपी ने आखिर हार क्यों मान ली? ढाका-14 से नवनिर्वाचित जमात सांसद मीर अहमद बिन कासिम ने 'नवजीवन' को बताया, “शपथ न लेने का फैसला हमारी पार्टी का नहीं था। यह हमारे गठबंधन सहयोगियों और हमारे कुछ सदस्यों की अपनी राय रही होगी।” चर्चा सीआरसी को चुनौती देने की भी रही, जो भविष्य में एक लंबी कानूनी लड़ाई का संकेतक है।
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5 अगस्त 2024 को शेख हसीना की अवामी लीग सरकार के पतन के बाद, मुहम्मद यूनुस के अंतरिम प्रशासन ने न सिर्फ एक नई लोकतांत्रिक सरकार के चुनाव की देखरेख का कार्यभार संभाला, बल्कि वंशवादी राजनीति समाप्त करने के लिए महत्वपूर्ण सुधार भी किए, भले ही वह अवामी लीग वाला मुजीबुर रहमान का खानदान हो या बीएनपी का जियाउर रहमान कुनबा। कई सुधार निकायों का गठन हुआ, जिनमें से एक राष्ट्रीय सर्वसम्मति आयोग (एनसीसी) था, जिसे जुलाई चार्टर के रूप में एक बाध्यकारी राजनीतिक घोषणा में सिफारिशों को समेकित करने का कार्य सौंपा गया था और जिस पर 17 अक्तूबर 2025 को 26 राजनीतिक दलों ने हस्ताक्षर किए थे।
61 पृष्ठों वाले जुलाई चार्टर में “विभिन्न राजनीतिक दलों, गठबंधनों और ताकतों के बीच आपसी और सामूहिक विचार-विमर्श के जरिये हासिल ‘सर्वसम्मति’ की बात कही गई थी, जिसका मकसद संविधान, चुनावी प्रणाली, न्यायपालिका, लोक प्रशासन, पुलिस प्रशासन और भ्रष्टाचार से निपटने वाले तंत्र में सुधार करना था।
13 नवंबर 2025 को राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन चुप्पू ने बांग्लादेश चुनाव आयोग को जनमत संग्रह कराने को अधिकृत कर दिया। इसमें मतदाताओं से चार प्रमुख सुधारों वाला एक संयुक्त पैकेज स्वीकार या अस्वीकार करने को कहा गया था, जिसमें कार्यवाहक सरकार प्रणाली की बहाली; दो सदन वाली संसद की स्थापना; न्यायपालिका और चुनाव आयोग में सुधार; और प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल दो बार तक सीमित करना शामिल था। ‘हां’ का मतलब था पूरा पैकेज स्वीकारना; ‘नहीं’ का मतलब सभी सुधारों को पूरी तरह नकारना।
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12 फरवरी के जनमत संग्रह के जरिये अपनाया गया यह चार्टर अब हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा 84 सुधार प्रस्तावों को लागू करने की एक राजनीतिक रूप से बाध्यकारी प्रतिज्ञा है, जिनमें से लगभग आधे प्रस्तावों के लिए बांग्लादेश के मौजूदा संविधान में संशोधन करना होगा। दूसरी शपथ लेने से इनकार करने पर, बीएनपी सांसद जुलाई चार्टर लागू करने के लिए अधिकृत नहीं होंगे।
जनमत संग्रह के नतीजे मिले-जुले रहे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, कुल 60.25 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले जिनमें से 62.74 प्रतिशत संविधान के समर्थन में थे, जबकि लगभग 30 प्रतिशत विरोध में। लगभग 9.5 प्रतिशत मतपत्र अमान्य पाए गए। खास बात यह कि 11 संसदीय क्षेत्रों में, जिनमें गोपालगंज और पहाड़ी जिलों जैसे गढ़ों के तीन क्षेत्र शामिल हैं, मतदाता ‘नहीं’ के साथ थे।
यह चार्टर बांग्लादेश की राष्ट्रीय पहचान को पुनर्परिभाषित करता है, जिसमें बंगाली से बांग्लादेशी में परिवर्तन का प्रस्ताव है, ताकि चकमा, मरमा और संथाल जैसे उन जातीय अल्पसंख्यकों को शामिल किया जा सके जो भाषाई रूप से परिभाषित पहचान से खुद को हाशिये पर महसूस करते थे। हालांकि बंगाली राज्य की प्रमुख भाषा बनी हुई है, लेकिन संविधान सभी मातृभाषाओं को मान्यता देता है। राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की मुजीब युग की चार विरासतों की जगह अब समानता, मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और धार्मिक सद्भाव ने ले लिया है। चार्टर धर्मनिरपेक्षता और धर्म की स्वतंत्रता को “सह-अस्तित्व की गारंटी” और “सभी समुदायों के लिए उचित सम्मान” से बदल देता है।
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अन्य परिवर्तनों में किसी व्यक्ति को एक साथ प्रधानमंत्री, सदन के नेता और पार्टी अध्यक्ष के रूप में कार्य करने से रोकना; मानवाधिकार, कानून और सूचना आयोगों के प्रमुखों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति की शक्तियों का विस्तार करना शामिल है। यह संविधान आम चुनावों की देखरेख के लिए गैर-दलीय कार्यवाहक सरकार को पुनर्स्थापित करता है (जिसे 2011 में अवामी लीग द्वारा समाप्त कर दिया गया था) और प्रधानमंत्री कार्यालय को न्यायाधीशों की नियुक्ति से हटाकर, इसके बजाय मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में एक न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना करता है।
डिजिटल ब्लैकआउट और 2024 के विद्रोह के युवा नेतृत्व को ध्यान में रखते हुए, यह चार्टर निर्बाध इंटरनेट सेवा को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देता है, जिससे डिजिटल पहुंच को संवैधानिक स्तर का दर्जा मिल गया है। इसमें व्यक्तिगत जानकारी के अधिकार की भी स्पष्ट रूप से रक्षा की गई है। दो-तिहाई बहुमत वाली बीएनपी अब मानती है कि वह ऐसा चार्टर लागू करने के लिए बाध्य नहीं है, जो उसकी चिंताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता है।
असहमति के नौ बिंदुओं में से, पार्टी ने उच्च सदन के सदस्यों के चुनाव के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व के प्रावधान पर कड़ी आपत्ति जताई, क्योंकि उसे आशंका है कि इससे प्रमुख दलों का जनादेश कमजोर हो जाएगा। कुछ कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं ने भी चार्टर को “राजनीतिक समझौता” बताते हुए खारिज कर दिया है। परामर्श प्रक्रिया से अवामी लीग को एक पक्ष के तौर पर बाहर रखने से संविधान के समावेशी स्वरूप को भी नकार दिया गया है।
राजदूत मोहम्मद हुमायूं कबीर ने संडे नवजीवन से कहा- “17 फरवरी की सुबह जो कुछ हुआ, उसे टाला जा सकता था, क्योंकि इससे कोई अच्छा संदेश तो मिलता नहीं”। विपक्षी दल फिलहाल भले मान गए हों, लेकिन संविधान के लागू होने से संसद में बीएनपी के भारी बहुमत के बावजूद राजनीतिक मतभेद की दरारें और गहरा सकती हैं।
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सौरभ सेन कोलकाता स्थित स्वतंत्र लेखक, राजनीति, मानवाधिकार और विदेश मामलों के टिप्पणीकार हैं।
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