
नया साल भी आ गया। सूरज का उत्तरायण भी हुआ। अब बसंत आने को है। मगर संक्रांति काल इतना पसरा पड़ा है कि किसी आगमन और विदाई का एहसास नही होता। कुछ वर्षों से हर सुबह चरखे का अभ्यास करते हुए छत पर लगी फुलवारी पर नजर पड़ती है। इधर कपास की पूनी से धागा निकलता, स्पिण्डल पर कतता और उधर उसमें कई तरह की महक शामिल होती। फूलों की भीनी महक, सुनहरी धूप की महक, पड़ोस में चलते नोकझोक की महक, बच्चों के किलकारी की महक, किसी की रसोई से आती नाश्ते की महक। भोर से काम करते सफाई कामगार महिलाओं की ठंड में पक चुकी उंगलियों की आह, संक्रांत मांगने आये ढोलची की पुकार- सब उस धागे में जुड़ते हैं। चरखवा चालू रहता है। झारखंडी गीत सा- मोहे चरखे का टूटे न तार चरखवा चालू रहे।
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विगत कुछ अरसे से कितना कुछ अलहदा हुआ है। हरसिंगार के फूल जो अक्टूबर तक ही फूलते हैं- उनका नाम अंग्रेजी में अक्टूबर है- अब संक्रांत में भी फूल रहे हैं। सदाबहार फूलने से रूस गई हैं और ब्रह्मकमल आये दिन फूल गए। सूरज को अपना साम्राज्य फैलाना चाहिए था। पर भरे संक्रांत में दुपहरी में चांद सा सूरज निकलता है।
ऐसे में पूनी कातते हुए संक्रांति काल से तार जोड़कर देखो तो क्या-क्या नही दिखता। एक तहजीब गुजर रही है।
निसर्ग ने बसंती वसन पहने, सकल बन सरसों फूली। सुदूर पहाड़ पर खनन से पीली सरसों पर राख छा गईं। खुसरो इस पर पता नहीं क्या कहते कि दिल्ली में सरसों की सांस घुट रही है। गंगाजमुनियत के तार तार-तार हो रहे हैं, जैसे बेशऊरी से कती पुनी को कातते हुए धागा कट से बोल जाता है।
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इन्हीं दिनों दिल्ली में फूल वालों की सैर होती रही है। सुंदर फूलों की चादर बुनी जाती है। हर मजहब के लोग हाथ लगाते हैं। फूलों को बुनना कितना कठिन होगा। कौन सी तखली में वह बुना जाएगा। कामगारी माली समुदाय के हुनरमंद हाथ की उंगलियों की छुअन उसमें नया रंग भरती है। मेहनतकश हाथ के खुरदरेपन की तपिश से फूलों की चादर बनती है। फूलों की तरह वह चादर हमारे रंग बिरंगेपन को समेटता है।
कहते हैं कि निज़ामुद्दीन औलिया को गम से निकालने के लिए खुसरो ने पीली पोशाक पहनी थी। औलिया हंस पड़े। नज़ीर को आगरे की बसंत में मुहब्बत का पीला रंग दिखता। “देखो कैसी छाई है बसंत”। आज व्यवस्था का पीलापन कुछ देखने नहीं देता। बसंत को ही उनका जन्मदिन मनाया जाता रहा है। वह लोक कवि थे, दरबारी नहीं। कुलीनता से सृजन को मुक्त किया और ककड़ी पर भी शेर कह सकते थे। आज के निजाम को शायद नही सुहाते। राजा के कसीदे पढ़ने वाले जो नहीं थे।
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इस बसंत पर अरावली को देख तमिल संगम के आठ काव्य धारा एट्टू तोहै की नायिका याद आती हैं- “उस साल हमारे पहाड़ हमारे थे, फूल सहमे हुए न थे, क्या खूब मोर नाचे थे। फिर राजा की सेना आई, पहाड़ पर राज हो गया। हम सूने हो गए। फूलों ने आना छोड़ दिया।”
कल्पना के तार टूटे। धागे की डोर चरखे पर टूटी, वहां आसमान में पतंगे कट रही हैं, उड़ रही हैं। उनके उन्मुक्त रंग धागे में समा रहे हैं और चरखे से कत रहे हैं। रंगों की खेती हो रही है। पास की खेत मे खिचड़े की हांडी चढ़ी है और उसकी पीली खुशबू से धागा भींज रहा है।
काश कि यहां से लाहौर की छत से उड़ते पतंग दिखाई पड़ते। दोनों देश बस एक दूजे की पतंग काटते। ऐसा कहने पर लोग पागल कहेंगे तो क्यों न इस संक्रांत टोबा टेकसिंह हुआ जाए। हर रात सरहद पर साझा चूल्हा जलाया जाए। रोटी सिके तो दोनों तरफ बढ़े।
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वैसे इंकलाबी तो दीवाने होते हैं। अपना बसंती चोगा रंगवाते हैं। विप्लव की धुन में रंगी चादर ओढ़े फंदा चूम जाते हैं। मूल कविता में गांधी का उल्लेख आता है। ”इसी रंग में गांधी ने नमक पर धावा बोल”। क्रांति संक्रांति काल की कोख से उपजती है। सूरज की मलिनता को मिटाती है।
नये प्रयोग होते हैं। पुराने दोहराए जाते हैं। डेस्टिनेशन वेडिंग के दौर में सेवाग्राम आश्रम में दो साथी सहजीवन की शुरुआत सूत की माला से करते हैं। अग्नि को साक्षी नहीं करते। पर अग्नि आकाश मिट्टी हवा जल सब तो उस सूत में हैं और सूत से एकाकार भी। ईशावास्य की बापू की प्रार्थना, बिस्मिल्लाह ईर-रहमान ईर-रहीम के उच्चार से मांगलिक कार्य समाप्त हो जाता है।
तब बसंत में बहार आई। मौलसिरी के फूल खिल गए। इस बार अपने हाथ से कते धागे से गुलाबी कुर्ता बन गया। किसान के पसीने की बूंदें कपास के कांटो से निकली लहू की बूंदें रूई छांटते हाथ की गर्माहट ह्रदय से लग गई। कुर्ते में बुन गई।
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