
वित्तमंत्री 1 फरवरी को ऐसे आर्थिक परिदृश्य में आम बजट पेश करेंगी जब दुनिया के लिए भारत ईर्ष्या का विषय है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसे बड़े संस्थानों ने भारत के विकास अनुमानों को संशोधित कर उसे बेहतर किया है और जीडीपी के तिमाही आंकड़े भी ऐसा ही संकेत देते हैं। वहीं, उपभोक्ता महंगाई काफी नीचे आ गई है, आरबीआई के आरामदायक स्तर से भी नीचे। तेज विकास और कम महंगाई की इस जुगलबंदी को ‘गोल्डीलॉक्स इकॉनमी’ कहा जाता है।
सरसरी तौर पर लग सकता है कि व्यापक आर्थिक प्रबंधन ठीक है और नीतिगत दायित्व बस इतना है कि अर्थव्यवस्था की गति बनी रहे। लेकिन नहीं, हकीकत यह है कि यह वक्त ज्यादा सावधानी बरतने का है। सावधानी इसलिए नहीं कि अनुमानित आंकड़े ‘गलत’ हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें आकार देने वाले कारक असमान हैं और ये पलट भी सकते हैं। इसलिए यह समय निश्चिंत बैठने का नहीं, बल्कि नींव को मजबूत करने का है।
सबसे पहले मौजूदा ‘कम मुद्रास्फीति’ को समझना होगा। अक्तूबर 2025 में मुद्रास्फीति 0.25 प्रतिशत थी। इसमें कमी का बड़ा कारण खाने-पीने की चीजों की कम कीमत थी और यही वजह है कि अक्तूबर 2024 में दोहरे अंकों में रहने के एक साल बाद मुद्रास्फीति सीधे अवस्फीति (डिफ्लेशन) में बदलकर ऋणात्मक 5 फीसद हो गई। सीपीआई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) बास्केट में खाने-पीने की चीजों का वेटेज ज्यादा होता है, लिहाजा मुद्रास्फीति का स्तर कम है। जबकि खाने-पीने की चीजों और ईंधन को छोड़कर ‘मूल’ महंगाई लगातार ऊंची बनी हुई है, जो करीब 4 फीसद है। यह कम सीपीआई महंगाई कृषि कीमतों के चक्र, आपूर्ति स्थिति और कमजोर मांग की ओर इशारा करती है।
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यही वजह है कि मौद्रिक नीति से जुड़ी चर्चा पर खुशी के बजाय सावधानी हावी है। आरबीआई की मौद्रिक नीति कमेटी के एक सदस्य का तर्क है कि किसी विकासशील देश के लिए ‘बहुत कम’ महंगाई दर अच्छी नहीं हो सकती, क्योंकि यह कमजोर मांग का संकेत है। यह चेतावनी वित्तीय नीतियां बनाते समय भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। संभव है कि खाने की चीजों की कीमतें ज्यादा समय तक इतनी कम न रहें क्योंकि तनाव छिपा हो सकता है।
खाद्य अवस्फीति कृषि आय और ग्रामीण मजदूरी पर भी बुरा असर डालने वाली होती है। चूंकि खाद्य उपज ज्यादा फायदा नहीं पहुंचाती, इसलिए कम खाद्य मुद्रास्फीति और ग्रामीण तनाव साथ-साथ रह सकते हैं। बजट के लिहाज से यह एक जरूरी मुद्दा हो जाता है क्योंकि ज्यादा विकास की विश्वसनीयता सबसे अधिक मांग पर निर्भर करती है। अगर ग्रामीण आय और मजदूरी स्थिर रहती है, तो खपत ढीली रहेगी और निजी निवेश भी धीमा हो जाएगा। इसलिए, मौजूदा स्थिति को ‘मैक्रो स्थायित्व हासिल होने’ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि एक ऐसे संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए कि विकास की प्रक्रिया असमान है - कुछ सेक्टर में मजबूत, तो बाकी में कमजोर।
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ग्रामीण मजदूरी के आंकड़े खास तौर पर चिंताजनक हैं। अस्थायी ग्रामीण मजदूरी में मामूली बढ़ोतरी हुई है, लेकिन असली मजदूरी लंबे समय तक स्थिर या नेगेटिव रही है - जिसमें कोविड महामारी से पहले का समय भी शामिल है। 2023-24 के दौरान खाने-पीने की चीजों की बढ़ती महंगाई ने क्रयशक्ति को घटा दिया, जिससे यह ठहराव और बढ़ गया।
इस ट्रेंड के पीछे दो कारण हैं: ग्रामीण मजदूरों की बढ़ती आपूर्ति, जिसमें महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भी शामिल है और इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि महिला अक्सर मजबूरी में मजदूरी को अपनाती हैं। फिर, जो भी विकास दिख रहा है, वह तुलनात्मक रूप से ज्यादा पूंजी वाला विकास नहीं है और यही कारण है कि मजदूरी में उस अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई है। खास बात यह है कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत 57 फीसद रोजगार महिलाओं को मिला, जो मजबूरी के कारण मजदूरी में बढ़ोतरी की ओर इशारा करता है। लिहाजा, बजट में ग्रामीण कमाई को एक बड़ा कारक मानकर उसके उपाय करने चाहिए। जो विकास इन क्षेत्रों को नजरअंदाज करता है, वह समावेशी विकास को बनाए नहीं रख सकता।
तीसरी चिंता बाहरी है - रुपये का अपेक्षाकृत कमजोर होना और आयातित महंगाई का छिपा खतरा। सीपीआई महंगाई लगभग शून्य रहने के बावजूद रुपया कमजोर हुआ है। सवाल यह उठता है कि यह बदलाव इतना कम क्यों है।
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जवाब का एक हिस्सा खाद्य अवस्फीति में छिपा है- यह एक घरेलू स्थिति है जिसने सीपीआई को तय किया और कच्चे तेल की कीमतें भी काफी हद तक स्थिर रही हैं। लेकिन आज कम बदलाव होने का मतलब यह नहीं है कि कल भी ऐसा ही रहेगा। खेती की कीमतें तेजी से बदल सकती हैं; और धातुओं तथा महंगे धातुओं में कीमत दबाव लागत और महंगाई अनुमानों को भी प्रभावित कर सकता है। जब खाने-पीने की चीजों की महंगाई ऊंचे पॉजिटिव स्तर से फिसलकर नेगेटिव हो जाती हैं तो अगले साल फिर से बढ़ोतरी दिखने की संभावना ज्यादा होती है, यह बड़ी सामान्य-सी बात है। इसके अलावा, सीपीआई बास्केट में भी बदलाव होने वाला है। बजट के मैक्रो अनुमान इस उम्मीद पर आधारित नहीं होने चाहिए कि मुद्रास्फीति 0-2 फीसद के बीच ही रहेगी।
इसके अलावा अस्थायी जीडीपी विकास भी एक कारक है। अगर मुद्राफीति बहुत कम हो तो इससे वास्तविक और नॉमिनल जीडीपी वृद्धि के बीच के अंतर को कम करता है। कर राजस्व रियल ग्रोथ से नहीं, बल्कि नॉमिनल ग्रोथ से जुड़ा होता है। अगर नॉमिनल जीडीपी वृद्धि उम्मीद के मुताबिक नहीं रहती है तो राजस्व में वृद्धि कमजोर हो जाती है, जिससे सरकारी खर्च पर दबाव बढ़ता है।
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बढ़ती वेलफेयर उम्मीदों को देखते हुए, राजस्व में कमी से वित्तीय घाटा बढ़ सकता है। अगर बढ़ते घाटे का पहले से अनुमान न हो, तो इससे मुद्रास्फीति बढ़ने और मुद्रा की कीमत में गिरावट का खतरा होता है, और तब एक ऐसा बुरा चक्र शुरू हो जाता है जिससे नीति बनाने वाले बचना चाहते हैं।
इसलिए बजट व्यावहारिक और लचीलापन बढ़ाने वाला होना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले ऐसे मैक्रो अनुमान बनाएं जो सामान्य स्थिति की उम्मीद करते हों। लगातार बहुत कम महंगाई की उम्मीद के बजाय 4 फीसद महंगाई की ओर लौटने की योजना बनाना ज्यादा सुरक्षित है।
दूसरा, ग्रामीण कमाई और रोजगार बढ़ाने वाली वृद्धि को मुख्य लक्ष्य मानें। ग्रामीण तनाव को सिर्फ कल्याण का मुद्दा मानने के बजाय ऐसे उपायों पर जोर देना चाहिए जो कमाई की क्षमता बढ़ाएं- जैसे ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, सिंचाई और स्टोरेज, वैल्यू-चेन डेवलपमेंट, ग्रामीण गैर-कृषि क्लस्टर और एमएसएमई क्रेडिट इकोसिस्टम।
तीसरा, सरकारी पूंजी खर्च की अब भी जरूरत है, लेकिन इसे रोजगार पैदा करने वाले सेक्टर जैसे हाउसिंग, लॉजिस्टिक्स, शहरी पब्लिक सर्विस और विकेंद्रीकृत ऊर्जा की तरफ मोड़ना चाहिए।
चौथा, यह मानें कि करेंसी की स्थिरता आंशिक रूप से वित्तीय विश्वसनीयता से जुड़ा कार्य है।
पांचवां, स्पष्ट और सटीक सार्वजिनक संवाद। कम महंगाई का मतलब यह नहीं है कि रहने का खर्च कम है। कई नागरिक जो स्थिर सैलरी और ज्यादा खर्च का सामना कर रहे हैं, वे सरकारी बातों पर तब तक शक करेंगे जब तक नीति बनाने वाले इस अंतर को ईमानदारी से स्वीकार नहीं करते।
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भारत की मौजूदा मजबूत रियल ग्रोथ और बहुत कम महंगाई की जुगलबंदी असामान्य है - हालांकि, कुछ हद तक स्वागत योग्य है। लेकिन यह काफी हद तक खाने-पीने की चीजों की कीमतों की गतिशीलता और अनुकूल बेस इफेक्ट पर निर्भर करती है, जबकि श्रम बाजार - खासकर ग्रामीण मजदूरी - में तनाव बना हुआ है। रुपये और कमोडिटी की कीमतें बाहरी अनिश्चितता बढ़ाती हैं। और कम नॉमिनल जीडीपी वृद्धि वित्तीय हिसाब-किताब को और भी जटिल बना देती है।
इसलिए, वित्तमंत्री के सामने चुनौती यह है कि वे इस पल का जश्न न मनाएं और न इससे घबराएं, बल्कि इसे सही तरीके से समझें। इससे पहले कि महंगाई का चक्र लौटकर आए, यह उन स्थितियों को मजबूत करने का एक मौका है जो विकास को समावेशी और टिकाऊ बनाती हैं - बढ़ती सैलरी, बड़े पैमाने पर खपत, स्थिर निवेश, और भरोसेमंद वित्तीय अनुमान।
-अजित रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस
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