विचार

फारुक के राष्ट्रवादी होने का सबूत चाहिए बीजेपी को, उनके बिना तो जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र बहाली संभव नहीं

जम्मू-कश्मीर में पीएसए कानून के दुरुपयोग की लंबी दास्तान है और आज इसी कानून का इस्तेमाल कश्मीरियों की आवाज दबाने में हो रहा है। तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत तमाम नेताओं-कार्यकर्ताओं से लेकर आमलोगों को इस कानून के तहत हिरासत में रख आवाज बंद की जा रही है।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया 

गृहमंत्री अमित शाह ने 6 अगस्त को संसद में ऐलान किया था कि पूर्व केंद्रीय मंत्री और कभी राज्य रहे जम्मू-कश्मीर में कई दफा मुख्यमंत्री रहे फारुक अब्दुल्ला को न तो हिरासत में रखा गया है और न ही उन्हें गिरफ्तार किया गया है और वह “खुद की मर्जी से अपने घर में हैं।” फिर भी, 81 वर्षीय फारुक अब्दुल्ला अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के बाद से ही हिरासत में हैं और स्पष्टतः यह लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों और देश के कानूनों का मखौल है। उन्हें औपचारिक तौर पर पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट (पीएसए) के तहत तब हिरासत में लिया गया जब एमडीएमके नेता वाइको ने सुप्रीम कोर्ट में हैबीज कॉर्पस याचिका डालकर फारुक अब्दुल्ला को सामने लाने की मांग की।

मैं भी जब निजी यात्रा पर श्रीनगर गया था, मैंने स्थानीय प्रशासन से फारुक अबदुल्ला से मुलाकात की इजाजत मांगी थी, जिसे बड़ी रुखाई के साथ ठुकरा दिया गया था। सरकार ने पूर्व राज्य के उस बेरहम कानून को हथियार बनाया है, जिसे नए बने केंद्रशासित प्रदेश में लोकतांत्रिक आजादी का दम घोंटने का जरिया बनाने की जगह रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाना चाहिए था।

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देश के आम लोगों से लेकर हमारी शीर्ष अदालत तक ने इतनी आसानी से उन्हें भुला दिया जिन्होंने पाकिस्तान की ओर से थोपे गए जंग और आतंकवाद के दौर में विद्रोह के माहौल में भी सैन्य और राजनयिक तरीके से देश के झंडे को ऊंचा रखा। अब हमें किससे उम्मीद करनी चाहिए कि राजनीतिक तौर पर उथल-पुथल भरी घाटी में लोगों का राजनीतिक नेतृत्व करेंगे?

एकीकरण की आड़ में मुख्यधारा की सभी कश्मीरी पार्टियों और उनके नेताओं के लिए राष्ट्रीय कानूनों के दरवाजे वस्तुतः बंद कर दिए गए हैं, जिस तरह की राजनीतिक प्रक्रियाओं में वे माहिर थे, उससे उन्हें अलग कर दिया गया है। जिन्हें हिरासत में रखा गया है उनमें सीपीएम, नेशनल कांफ्रेंस, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ-साथ पीडीपी के भी तमाम नेता और कार्यकर्ता हैं। इनमें बीजेपी के चुनावी साझीदार पीपुल्स कांफ्रेंस के नेता सज्जाद लोन भी हैं।

संसदीय चुनाव के समय जब मेरी मुलाकात सज्जाद लोन से हुई थी तो उन्होंने उम्मीद जताई थी कि नरेंद्र मोदी के समर्थन और कश्मीरियों की बेहतरी के लिए अपनी फिक्रमंदी की वजह से आने वाले विधानसभा चुनावों तक वह अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेस को पीछे छोड़ने में कामयाब रहेंगे। अब हमें पता है, वैसा तो होना हीनहीं था।

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ऐसे समय में जब देश से प्यार को साबित करने के लिए देशभक्ति का वैसा सबूत मांगा जा रहा है जिसे दिखाया जा सके, फारुक अब्दुल्ला के पास कहने-दिखाने को काफी कुछ है। फारुक एक ऐसे राष्ट्रवादी इंसान के बेटे हैं, जिन्होंने तमाम कुर्बानियों की बदौलत पाई आजादी के बाद पाकिस्तानी सेना के हमले से पैदा मुसीबत के वक्त जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाने में अहम यागदान किया। जो भारतीय लोकतंत्र के दायरे में अपने लोगों की गरिमा के लिए जीवन भर काम करते रहे और 1970 के दशक के दौरान ब्रिटेन में स्वघोषित निर्वासन की जिंदगी से वापस आने के बाद लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत सरकार या विपक्ष में अपनी भूमिका निभाते रहे।

ऐसी विरासत वाले फारुक अब्दुल्ला राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष और सत्ता पक्ष के गठबंधनों का हिस्सा रहे हैं। 1983 में उन्होंने इंदिरा गांधी के मजबूत नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी के खिलाफ राज्य विधानसभा के चुनावों में दो-दो हाथ किया और सरकार बनाने में कामयाब भी रहे, लेकिन टूट-फूट के कारण उन्हें सत्ता से हटना पड़ा और फिर उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा सक्रिय भागीदारी का फैसला करते हुए उसी साल अक्तूबर में श्रीनगर में विपक्षी दलों का सम्मेलन आयोजित किया।

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उस दौरान में प्रधानमंत्री कार्यालय में सेवाएं दे रहा था और मुझे याद है कि तब मैंने उनके प्रधान सचिव महमूद उर रहमान को चेतावनी भी दी थी कि प्रधानमंत्री इसका बुरा मान जाएंगी, लेकिन फारुक अब्दुल्ला पर कोई असर नहीं हुआ। 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद जब प्रधानमंत्री लद्दाख के दौरे पर गईं तो इसके बावजूद कि फारुक को कह दिया गया था कि इंदिरा गांधी की यात्रा को लेकर वे बेवजह परेशान न हों, इंदिरा गांधी के प्रति अपना समर्थन जताने के लिए वह खुद लेह गए।

बाद में उन्होंने कांग्रेस के साथ गठजोड़ भी किया, जब 1987 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सरकार बनाने के लिए उनसे संपर्क किया। 1989 में केंद्र में वीपी सिंह सरकार के दौरान जब राज्य में अलगाववाद का दौर शुरू हुआ, वीपी सिंह सरकार ने मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला की सलाह नहीं मानी जिसके कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया और उसके बाद राज्य ने राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति शासन का लंबा दौर देखा। तब हुए चुनाव में काफी गड़बड़ी हुई, लेकिन कश्मीरी होने के नाते तत्कालीन गृहमंत्री ने राज्य में किसी भी तरह लोकतांत्रिक सरकार के गठन का विकल्प चुना, ताकि उन्हे निजी तौर पर राजनीतिक लाभ मिले। लेकिन उस कदम ने राज्य को सीधे-सीधे अलगाववाद के दौर में धकेल दिया।

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उस दौर में फारुक अब्दुल्ला ने न केवल देश बल्कि विदेशों की यात्राएं कीं और कश्मीर पर भारत के नजरिये से दुनिया को बाबस्ता कराने में खुद को व्यस्त रखा। 1996 में एक बार फिर उन्होंने विधानसभा के चुनावों में भाग लिया और जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर लोकप्रिय सरकार का गठन किया और अपनी पार्टी को केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल किया और तब उनके बेटे उमर अब्दुल्ला वाजपेयी सरकार में विदेश राज्यमंत्री बने। एनडीए का सहयोगी रहते फारुक अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 में निहित प्रतिबद्धता के अनुसार भारतीय संघ के भीतर जम्मू-कश्मीर के लिए और अधिक स्वायत्तता के लिए काम किया।

उसके बाद डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार (2004-2014) में वह खुद भी मंत्री रहे। फारुक अब्दुल्ला के इस रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें जम्मू-कश्मीर के एक मजबूत स्तंभ और राज्य के भारतीय संघ के साथ एकीकरण के स्पष्ट पैरोकार के तौर पर देखा जाना चाहिए था, न कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक खतरे के तौर पर। वह इतने उदार हैं कि लद्दाख में तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के साथ माथे पर तिलक लगाकर सिंधु वंदना में शामिल हुए और भारत माता की जय के नारे भी लगाए जो तमाम पुरातनपंथी मुसलमानों को नागवार भी गुजरा।

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स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के माध्यम से राज्य विधानसभा और केंद्र सरकार में प्रतिनिधित्व, हर भारतीय का बुनियादी अधिकार है और यह लोकतांत्रिक प्रणाली की एक अहम प्रक्रिया भी है। पंचायती राज इस प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, बशर्ते कि पंचायतें संविधान के अनुच्छेद 243 (डी) के तहत स्व-सरकार के संस्थानों (इसे जो भी नाम दे दें) के रूप में कार्य करें, लेकिन जाहिर है कि इसका कोई विकल्प नहीं है। हालांकि1989 के जम्मू-कश्मीर राज्य पंचायती राज अधिनियम को अब्दुल्ला सरकार ने ही पारित किया था और यह कानून आज भी वहां जिंदा है।

हाल ही में हुए चुनावों में चुने गए लोग अपने निर्वाचन क्षेत्र में ही डरे हुए हैं और वे शायद ही खुद के लोगों के प्रतिनिधि होने का दावा कर सकते हैं। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर का दर्जा जबरन घटा देने के बाद भी जम्मू-कश्मीर में विधानसभा को होना होगा और फारूक अब्दुल्ला इसके सबसे बड़े राजनीतिक नेता हैं, तब भी अगर हमें इसमें अलगाववादी नेतृत्व को शामिल करना पड़ा। जम्मू-कश्मीर में फारुक अब्दुल्ला की भागीदारी के बिना लोकतंत्र की बहाली हो ही नहीं सकती।

(लेखक भारत के पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त और अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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