विचार

राम पुनियानी का लेखः महिला आरक्षण पर बीजेपी की हकीकत, इतिहास से लेकर वर्तमान तक

बीजेपी यह रोना रो रही है कि संशोधन विधेयक का विरोध कर विपक्षी दल महिलाओं का अपमान कर रहे हैं। बीजेपी द्वारा महिलाओं को अधिक मौके देने की बात करना केवल दिखावा है। महिला सशक्तिकरण के कहीं ज्यादा अहम् कदम कांग्रेस द्वारा उठाए गए हैं।

महिला आरक्षण पर बीजेपी की हकीकत, इतिहास से लेकर वर्तमान तक
महिला आरक्षण पर बीजेपी की हकीकत, इतिहास से लेकर वर्तमान तक फोटोः सोशल मीडिया

लोकसभा की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने के लिए महिला आरक्षण विधेयक 2023 में पारित किया गया था। लेकिन उसे अभी तक लागू नहीं किया गया है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस विधेयक को संशोधित करने वाले संविधान संशोधन बिल के पारित न हो पाने पर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। मगर तथ्य यह है कि आरक्षण संबंधी विधेयक सन् 2023 में ही पारित हो गया था और उसे आवश्यक कार्यवाही के बाद 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में ही लागू किया जा सकता था।

अब दो-तिहाई समर्थन न मिलने के कारण संशोधन विधेयक नामंजूर हो गया क्योंकि विपक्ष को यह अहसास हो गया था कि इस संशोधन के जरिए सरकार एक साजिश को अमली जामा पहना रही है। सरकार ने इस संशोधन को परिसीमन और लोकसभा की कुल सीटों में बढोत्तरी के साथ नत्थी कर दिया था। संशोधन विधेयक के खिलाफ मतदान करने वाले सभी सांसद महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित किए जाने के पक्ष में थे, किंतु चूंकि इसे परिसीमन से जोड़ दिया गया था, इसलिए उनके पास इसका विरोध करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

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विरोध का एक बड़ा कारण था उत्तरी और दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की दर में अंतर। मोटे तौर पर उत्तरी राज्यों में टीएफआर (कुल प्रजनन दर) दक्षिणी राज्यों से अधिक होने के कारण परिसीमन के बाद उत्तरी राज्यों में सीटों की संख्या में अधिक वृद्धि होती। ये वो राज्य हैं जहां बीजेपी की पकड़ ज्यादा मजबूत है। दक्षिणी राज्य इसे लेकर चौकन्ने थे और इसलिए उन्होंने पूरी शक्ति से इसका विरोध किया।

बीजेपी यह रोना रो रही है कि संशोधन का विरोध कर विपक्षी दल महिलाओं का अपमान कर रहे हैं। बीजेपी द्वारा महिलाओं को अधिक मौके देने की बात करना केवल दिखावा है। महिला सशक्तिकरण के कहीं ज्यादा अहम् कदम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा उठाए गए हैं। आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करते हुए कांग्रेस ने आहिस्ता-आहिस्ता यह सुनिश्चित किया कि महिलाएं न केवल भारतीय राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बनें, बल्कि वे ब्रिटिश राज के खिलाफ चल रहे आंदोलन में भी शामिल हों।

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कांग्रेस ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन दिया। महिला शिक्षा के लिए जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के अथक प्रयासों के फलस्वरूप महिलाएं सार्वजनिक जीवन में आईं और आजादी के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। कई महिलाएं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं। कांग्रेस ने ही देश को पहली महिला प्रधानमंत्री, पहली महिला मुख्यमंत्री और पहली महिला राष्ट्रपति दी। महिला सशक्तिकरण की इस प्रक्रिया को मैदानी स्तर तक ले जाने के उद्धेश्य से राजीव गांधी न केवल पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के लिए आतुर थे बल्कि इन संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करना चाहते थे।

यदि इसकी तुलना नरेन्द्र मोदी के बड़बोलेपन से की जाए तो हम पाते हैं कि वाजपेयी और मोदी दोनों के नेतृत्व वाली बीजेपी (या एनडीए) सरकारों ने इस दिशा में एक भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया। बीजेपी की हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा महिलाओं की राजनीति में भागीदारी के उसके एजेंडा को निर्धारित करती है। बीजेपी जिस आरएसएस की राजनैतिक संतान है, वह केवल पुरुषों का संगठन है। जब लक्ष्मीबाई केलकर ने 1936 में तत्कालीन आरएसएस प्रमुख हेडगेवार से अनुरोध किया कि आरएसएस में महिलाओं को भी शामिल किया जाए, तो उन्हें परामर्श दिया गया कि वे राष्ट्र सेविका समिति (आरएसएस) नाम से एक अधीनस्थ संगठन बनाएं।उन्हें आरएसएस में शामिल होने की इजाजत नहीं दी गई।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से लगता है कि वह कार्यकताओं का संगठन है जबकि राष्ट्र सेविका संघ के नाम से उसके सेविकाओं का संगठन होने का अनुमान होता है। इससे साफ है कि संघ के विचार में महिलाओं का 'स्व' पुरुषों के अधीन है। यह मनुस्मृति में व्यक्त किए गए विचारों से मेल खाता है। आरएसएस ने सदैव इस ग्रंथ को सही ठहराया है और आज भी संघ परिवार की यह मान्यता है कि भारतीय संविधान पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है और इसलिए इसे रद्द कर दिया जाना चाहिए (राजेन्द्र सिंह रज्जू भैया का वक्तव्य) और इसकी जगह एक पवित्र भारतीय ग्रंथ यानि मनुस्मृति के नियमों-प्रावधानों को अपनाया जाना चाहिए (एक अन्य सरसंघचालक सुदर्शन के अनुसार)।

बीजेपी का नजरिया उसकी सरकार द्वारा पिछले वर्ष गीता प्रेस, गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार से नवाजे जाने से भी साफ होता है। यह फैसला नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एक जूरी द्वारा किया गया था। पुरस्कार प्रदान करते हुए मोदी ने कहा "इन्होंने पिछले 100 वर्षों में सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में लोगों में बदलाव लाने के लिए सराहनीय कार्य किया है"।

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अक्षय मुकुल ने गीता प्रेस पर अपने गहन अध्ययन में बताया है कि किस तरह गीता प्रेस ने मनुस्मृति की शिक्षाओं को छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के रूप में प्रकाशित कर उन्हें जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। ये पुस्तिकाएं लाखों की संख्या में बिकती हैं। इनमें पतियों द्वारा पत्नियों से मारपीट करने को उचित ठहराया गया है, महिलाओं के पुरूषों के अधीनस्थ रहने का महिमामंडन किया गया है और अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में महिलाओं से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने पिता, पति या पुत्र के नियंत्रण में रहें।

बीजेपी का अपना इतिहास उसके पदाधिकारियों के ऐसे वक्तव्यों से भरा हुआ है जो सती प्रथा सहित अनेक महिला विरोधी घिनौनी परंपराओं को सही ठहराते हैं। रूपकुंवर मामले में तत्कालीन बीजेपी उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया ने सती प्रथा के समर्थन में एक जुलूस निकलवाया था। जुलूस में की गई नारेबाजी में न केवल यह कहा गया था कि सती होना न केवल हिंदू महिलाओं की एक गौरवशाली परंपरा है बल्कि यह उनका अधिकार भी है!

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एक अन्य नेत्री मृदुला सिन्हा (बीजेपी महिला मोर्चा) जो गोवा की राज्यपाल भी रहीं, ने सैवी पत्रिका के अप्रैल 1994 के अंक में प्रकाशित साक्षात्कार में पतियों द्वारा पत्नियों से मारपीट किए जाने और दहेज प्रथा को सही ठहराया था।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी किए गए सन् 2021 के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में औसतन प्रतिदिन 86 महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुआ, वहीं हर घंटे महिलाओं के खिलाफ 46 अपराध पंजीबद्ध हुए। प्रति एक लाख जनसंख्या पर होने वाले महिला अपराधों की संख्या 2014 के 56.3 से बढ़कर 2022 में 66.4 हो गई।

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वर्तमान सरकार के कार्यकाल में यौन हिंसा और प्रताड़ना के मामलों में कैसा रूख अपनाया जाता है यह समाचार माध्यमों में ऐसे कई मामलों के संबंध में प्रकाशित जानकारी से साफ होता है- जैसे उत्तर प्रदेश के उन्नाव में 2017 में एक बीजेपी विधायक द्वारा नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म, 2018 में कश्मीर के कठुआ में एक आठ साल की मुस्लिम बच्ची के साथ कई बार सामूहिक दुष्कर्म और अंततः उसकी हत्या और 2020 में उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म। ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों की शिकायतों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाना और मणिपुर में महिलाओं की जो दुर्दशा हुई उसे तो शब्दों में बयां तक नहीं किया जा सकता।

जहां बीजेपी की महिला सांसद और अन्य नेता इस संविधान संशोधन विधेयक के गिर जाने को लेकर शोर-शराबा कर रहे हैं, वहीं असली मुद्दा यह है कि इसे परिसीमन से क्यों जोड़ा गया? इसे संसद की वर्तमान सदस्य संख्या के आधार पर ही लागू करने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए गए? हमें महिला आरक्षण और परिसीमन को असंबद्ध करने के पक्ष में आवाज उठनी चाहिए और 2023 के विधेयक के अनुरूप महिला आरक्षण तुरंत लागू किया जाना चाहिए।

(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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