विचार

विष्णु नागर का व्यंग्यः नरेंद्र सर की पाठशाला का हिंदुत्व ज्ञान, क्लास में ही खून उबाल मारने लगे!

नरेंद्र सर अपने प्रिय छात्र अमित से कहते हैं कि आगे भी मेरे संपर्क में रहना, हम-तुम मिलकर वो मौज करेंगे और लोगों को वो रुलाएंगे कि उनकी दस पीढ़ियां याद रखेंगी। इस तरह हम अमर हो जाएंगे। हमें महात्मा गांधी वाली अमरता नहीं चाहिए, जिसका अंत ‘हे राम’ से हो।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया 

“हां तो बच्चों हमने कल क्या पढ़ा था? कौन बच्चा बताएगा? अरे वाह अमित, तुम्हारा कद तो छोटा है, मगर दिमाग मेरी तरह है। शाबाश, तुमने खड़े होकर अपना हाथ सबसे ऊंचा रखा है। यही तो तरकीब है। यही करना है- हमें आगे चल कर। देखो मेरी आंखों में तुम्हें हमारे 'अच्छे दिन' नजर आ रहे हैंं न! आगे भी मेरे संपर्क में रहना, हम-तुम मिलकर वो मौज करेंगे, वो मौज करेंगे और लोगों को वो रुलाएंगे, वो रुलाएंगे कि उनकी दस पीढ़ियां याद रखेंगी। इस तरह हम अमर हो जाएंगे। हमें महात्मा गांधी वाली अमरता नहीं चाहिए, जिसका अंत हे राम से हो। समझे न तुम मेरा गेम प्लान? हां, तो अब बता।”

“सर कल आपने बताया था कि जुमले कैसे उछाले जाते हैं और जनता को कैसे बेवकूफ बनाया जाता है। आपने इसका बहुत अच्छा डिमांस्ट्रेशन दिया था।”

“गुड-गुड। आप सबको भी यह याद है न? बहुत सरल है। 2×2= 4 और 2+2 भी फोर। हम 3×3= 9 और 3+3=6 की जटिलता में नहीं जाते। एकदम सिंपल।” जी सर।

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“गुड-गुड। तो अच्छा तुममें से कौन बढ़िया जुमला फेंक कर दिखाएगा? फिर अमित। सभी बातें तुम्हीं बताओगे क्या? रविशंकर, रमेश, गिरिराज, प्रकाश को मौका नहीं दोगे? देखो, पीछे मुड़कर देखो, तुम्हारा फार्मूला इन सबने अपना लिया है। इस बार सबने खड़े होकर हाथ ऊपर उठाया है।”

“सॉरी। सर एक मिनट देंगे, केवल एक मिनट, बल्कि थर्टी सेकंड। बल्कि सर दस सेकंड ओनली।”

अमित बेंच पर खड़ा हो गया और उसने हाथ ऊपर उठा दिया। नरेंद्र सर ताली बजाने ही वाले थे कि इतने में हुआ यह कि अमित की तीन ऊंगलियां ऊपर चल रहे पंखे से टकरा गईं। खून की धारा बह निकली। अमित बुरी तरह तड़प उठा। वह बेंच से नीचे गिरने ही वाला था कि दो गावदू समझे जाने वाले बच्चों ने उसे थाम लिया। एक ने अपने रुमाल से उसका खून पोंछा, दूसरा अपने रूमाल से घाव पर पट्टी बांधने लगा।

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नरेंद्र सर ने अमित की तरफ ध्यान नहीं दिया। वह क्लास से जाने लगा तो नरेंद्र सर ने उसे रोका और कहा, बैठो अपनी सीट पर। अभी तुम्हारा दर्द छूमंतर कर देता हूं। किसी डॉक्टर, किसी कंपाउंडर की जरूरत नहीं। तो सुनो, अमित तुम खासतौर पर सुनो और बाकी  सब भी ध्यान से सुनो। “सबने देखा न कि क्लास के सबसे होनहार लड़के अमित की ऊंगली से खून बहा तेजी से। आखिर क्यों ऐसा हुआ? तुमने  कभी सोचा? हां बताओ।”

“सर, इसलिए कि उसने आपकी नजर में ऊंचा उठने के लिए यह तक नहीं सोचा कि उसका हाथ ऊपर पंखे में फंस सकता है। बेवकूफी की उसने।”

“बेवकूफ तुम हो। कुछ नहीं आता तुम्हें। बैठ जाओ। आइंदा मेरी क्लास में चुप रहा करो। सही है कि उसे बिजली के पंखे से चोट लगी थी, मगर तुम जानते हो, ये पंखा किसका आविष्कार है? मुगलों का।”

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इस पर हरचरण खड़ा हुआ- मगर सर मेरे पापा....।

“बदतमीज। सवाल करता है? शिक्षक पर आस्था नहीं रखता? बैठ जा। आइंदा ऐसी हरकत की तो तू स्कूल से निकाल दिया जाएगा। मालूम है सरकारी काम में बाधा डालने की सजा क्या है? सीधे जेल। तो सुनो, बिजली के पंखे का आविष्कार मुगलों ने किया था। हिन्दुओं को बेवकूफ बनाया कि इससे उन्हें गर्मी से राहत मिलेगी, मगर असली इरादा उनका अमित जैसे भोले-भाले हिन्दुओं का खून बहाना था।”

“यह तुम सबने अपनी आंखों के सामने अभी खुद देखा। तो यह चोट अमित को पंखे से नहीं लगी, यह मुगलों का षड़यंत्र था। यह हिन्दू का खून है, जो मुगलों ने बहाया है। इसे याद रखना अमित और तुम सब भी। भूलना मत कभी। अमित, यह न तुम्हारी गलती थी, न सर की निगाह में ऊंचा उठने की तुम्हारी मूर्खता। यह तो किसी भी कीमत पर आगे रहने का तुम्हारा जज्बा है। यही सच्चा हिंदुत्व है। अब तो दर्द नहीं हो रहा होगा तुम्हें।”

“नहीं सर। आपके दिए ज्ञान से खून उबल जरूर रहा है।

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“यही मेरा उद्देश्य था। अब पहले अमित तुम ऐसा करो बेटा कि बाहर पोंछा पड़ा होगा। एक हाथ से यह सारा खून फर्श, टेबल और बेंच से पोंछो। अच्छी तरह पोंछने के बाद तुम घर जा सकते हो। इसे आत्मनिर्भरता कहते हैं। यह क्या है? कौन बताएगा?”

“हां ठीक बताया, यह जुमला है। और सुनो अमित, तुम्हारे मम्मी-पापा कहें कि चलो फटाफट डॉक्टर के पास चलते हैं तो मत जाना। कहना सर के वचनों से ठीक हो गया। और याद रखो, आज तुम्हारा खून बहा है, कल तुम्हें  इसका बदला लेना है। और सुनो, जो होशियारी आज तुमने दिखाई है, उसी से भावी भारत की भावी दिशा हम तय करेंगे। मेरे संपर्क में रहना। फायदे में ही फायदे में रहोगे। बोलो भारतमाता की, जय। वंदे, मातरम। नरेन्द्र सर, जिन्दाबाद। नरेन्द्र सर, जिन्दाबाद। बाकी कल। अभी तो बहुत पढ़ना है। फिर से बोलो नरेन्द्र सर की जय।

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