विचार

समता, समिति और भेदभावः सामाजिक भेद की नींव पर लोकतंत्र नहीं टिक सकता

जिनको हर प्रगतिगामी कदम से वर्ग संघर्ष का खतरा लगता है, उन्हें मालूम होना चाहिये कि हिंसात्मक संघर्ष को टालने के लिए ही समावेशी ढांचा बनाया जाता है, वरना बहुजन खड़े हुए तो असल संग्राम होगा। खामोशी शांति का पर्याय नहीं होती।

समता, समिति और भेदभावः सामाजिक भेद की नींव पर लोकतंत्र नहीं टिक सकता
समता, समिति और भेदभावः सामाजिक भेद की नींव पर लोकतंत्र नहीं टिक सकता फोटोः सोशल मीडिया

यूजीसी ने जैसे ही समता का संस्थागत ढांचा प्रस्तुत किया, वैसे ही प्रभुत्व सम्पन्न वर्ग के एक समूह ने खुद के पीड़ित-प्रताड़ित हो जाने का भय प्रकट किया और उच्चतम न्यायालय ने रोक लगाई। यह पिछले दिनों आम बात हो गई है कि सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक तौर पर अत्यंत ताकतवर वर्ग खुद को सताया हुआ कहता है। संभावित पीड़ित बताकर असल भेदभाव से ध्यान हटाने का प्रयास करता है। यह भ्रामकता, भेद को बहुत गैर गंभीर बनाती है जैसे कि सामाजिक भेद तो कहीं होता ही नहीं। जहां सत्ता व्यवस्था सम नहीं है और सामाजिक-आर्थिक प्रभुसत्ता दोहन शोषण को मान्य करती है, वह संस्थागत भेद है। यह किन्ही दो लोगों के बीच हुए व्यक्तिगत विवाद से समतुल्य करना अपने आप मे नादानी और सतही होगा।

सत्तारूढ़ दल ने ऐसा सांस्कृतिक माहौल तैयार किया है कि जहां सबसे अधिक ताकतवर को सबसे ज्यादा असुरक्षा और कुंठा महसूस होती है। बहुसंख्य समुदाय का एक वर्ग खतरे में होने का दावा करता है। यह संख्या से परे सत्ता की असमानता का मामला है। इस माहौल में अक्सर हाशिये पर धकेला गया वर्ग भी प्रभुत्व सम्पन्न की भाषा बोलने लगता है। इस वर्णाधारित जातिगत भेद की गुलामी का ऐसा ढांचा बनाया गया है जो कि प्रतिष्ठानुक्रम से चले। हर किसी के नीचे कोई है, सो सबको गुलामी भाती है। किसी समूह के आगे नतमस्तक होते ही कई समुदायों को अपने आगे नत करवाने का लाइसेंस जो मिलता है। जाति का वर्गानुक्रम ऐसे ही चलता है। सो भेद का क्रम खुद तक आकर रुक जाता है, किसी को संगठित नहीं होने देता।

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जब भी समता की बात होती है, योग्यता के फलसफे को आगे किया जाता है। सवाल है कि योग्यता क्या है? जिस समाज में हजारों साल तक यह धारणा रही है कि हाथ से काम करने वाले हुनरमंद, कमतर हैं, उनका काम अकुशल है, योग्य नहीं हैं, श्रेष्ठ हो ही नही सकता, तो उस वर्ग ने भी मान लिया है कि आकांक्षा तो किताबी होनी चाहिए। कुछ हुनर चिकित्सक, इंजीनियर,  तकनीकी आदि तो श्रेष्ठ है मगर रेल चलाने वाला जहाज चलाने वाले से कमतर है।

चूंकि हाथ से काम करने वाले अधिकांश हाशिये पर खड़े समाज से हैं। कुछ काम हीन, अपवित्र-अशुद्ध माने गये और कामगार के बीच भेद छूआछूत से ग्रसित है। हम कभी पाठ्यपुस्तक में कामगारी कौम के काम को योग्य या श्रेष्ठ नहीं बताते। उसको अन्य तथाकथित बौद्धिक से समतुल्य नहीं मानते। प्रभुत्व सम्पन्न चाहते हैं कि एक वर्ग कामगार रहे। शारीरिक श्रम जब तक कमतर माना जायेगा, तब तक वह अयोग्य ठहराया जाएगा। उसमे कुशल होना तो जैसे कोई मायने ही नहीं रखता।

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क्या यह जरूरी नहीं की शिक्षा में दोनों शारीरिक और बौद्धिक पर समतुल्य ध्यान दिया जाए। दोनों की योग्यता मापी जाए। फिर योग्यता के पैमाने बदलेंगे। एक जाति आधारित व्यवस्था में शारीरिक श्रम सिखाया भी किसे जाता है। कदाचित तभी गांधी ने तथाकथित उच्चवर्ग को मैला साफ करने के अभ्यास में लगाया। तब भी वह काम योग्यता मूलक नहीं माना जाता। यदि कभी किसी पाठशाला में किसान, बढ़ई, कुम्हार, शिल्पी, मज़दूर अतिथि बुलाये गये होते जैसे कलेक्टर बुलाया जाता है तो योग्यता का परिदृश्य इतना संकरा और भेदभावपूर्ण नही होता।

इसी कारण खगोलीय गणित और चिकित्सा शास्त्र में बहुत अनुसंधान के बाद भी वैज्ञानिक औद्योगिक क्रांति भारत मे नहीं आई। जाति अनुक्रम ने ज्ञान को छुपाया, उसको एक वर्ग की थाती बनाया, सीमित किया। यूरोप में साईकिल मैकेनिक राइट बंधु हवाई जहाज बना गये। हम शून्य की अवधारणा देकर भी पीछे रह गए- भले अब मिथकीय पुष्पक विमान के अभिमान में पुलकित होते रहें। भेदकारी व्यवस्था में योग्यता केवल छलावा है।

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आखिर वह ग्रामीण या शहरी हाशिये पर खड़ा वर्ग, जिसके पास कोई स्टडी रूम नहीं, पोषणाहार नहीं, माता-पिता प्रवासी मजदूरी के लिए विवश हैं, बिजली-पानी जैसी मूल सुविधा तक नहीं, शहर निर्माता होते हुए वो बार-बार बेदख़ली झेलते हैं, नगरी क्षेत्र में चंद मोहल्लों की कैद में रहते हैं, आई.आई.टी., आई.आई.एम. तमाम उच्च शिक्षा संस्थानों में उनसे उनका रैंक पूछकर तिरस्कृत व्यवहार किया जाता है, आरक्षित कोटा छात्र कहकर माखौल उड़ाया जाता है। वहां कौन तय करे कि योग्यता क्या है? इस माहौल में क्या योग्यता मात्र विशेषाधिकार नहीं? वह विशिष्टता जो कभी किसी रोहित वेमुला, जॉर्ज फ्लॉयड को नहीं मिली।

फिर क्या यह सही नहीं कि इन सभी संस्थानों में जाति आधारित प्रताड़ना के कारण आत्महत्या के असंख्य मामले सामने आए। रोहित वेमुला को लिखना पड़ा कि वो अपने जन्म की परिस्थितियों के कारण घुटन महसूस करते हैं। तथाकथित सवर्ण कहते हैं कि नियम की आड़ में उनके साथ अन्याय हो जाएगा। सनद रहे कि आज तक हर प्रगतिशील कानूनी हक के बारे में ताकतवर वर्ग यही राय रखता है। दहेज प्रतिबंध कानून, घरेलू हिंसा और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार उन्मूलन कानून पर ऐसा ही कहा जाता है, दुरुपयोग किये जाने की बात होती है जबकि अब तक तो उपयोग ही ठीक से नहीं हो पाया है।

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अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार उन्मूलन कानून में तो एफआईआर दर्ज नहीं हो पाती। फिर कानून के तहत अपराध किसे माना गया है, यह भी तो स्प्ष्ट हो। बेगारी करवाना, मानव मल-मूत्र जबरन खिलाना, यौन शोषण, बारात में घोड़ी चढ़ने पर रोक लगाना, जुलूस करना, मूँछ रखने की इजाजत न देना, जाति सूचक शब्द से अपमानित करना, मानवाधिकार और गरिमा को ठेस पहुंचाना, छुआछूत करना- क्या यह अपनेआप में विचारणीय और बेहद शर्मनाक नहीं। सभ्य कहलाते समाज को ऐसे कुत्सित बर्ताव को प्रतिबंधित करने के लिए भी कानून बनाना पड़ रहा है। बिना कानून के यह रोका नहीं जा सकता। जबकि हाल ही में आदिवासी व्यक्ति को पेशाब पीने के लिए मजबूर किया गया।

समता और समानता का फर्क जाने बगैर कोई पहल नहीं हो सकती। हज़ारों साल से धकेले गये समुदाय को समतल भूमि दिए बगैर समानता अर्थहीन है। समतल करने के लिए हजारों साल की खाई को पाटना पड़ेगा। आरक्षण उसका एक जरिया है। लेकिन जहां शोषण तहज़ीबी गारंटी में तब्दील हो गया, वहां सक्रिय पहल करना भी उतना ही ज़रूरी है। समता ढांचा उसी के तहत है, ताकि संचालन संस्कृति बदले। वह भेदभाव को नजरअंदाज करने से नहीं बदलेगी।

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हर परिसर को लैंगिक और समता ढांचे की दरकार है। पाठ्यक्रम में लैंगिक और सामाजिक न्याय की संवेदनशीलता को शामिल करना जरूरी है। उस पर निरन्तर संवाद, घटना पर तुरंत कार्रवाई सचेत होकर भेदभावपूर्ण भाषा का संज्ञान लेना और प्रकरण को सुलझाना आवश्यक है। 2012 में सबसे पहले इसकी पहल हुई थी। कर्नाटक ने रोहित वेमुला एक्ट पारित करके भेद को आपराधिक श्रेणी में शामिल किया। अन्य राज्यों को भी चाहिए कि वह यह करें।

दुनिया के हर प्रगतिगामी मुल्क के शैक्षणिक परिसर में ऐसा ढांचा होता है। न सिर्फ समिति होती है, बल्कि किसी भी प्रवेश प्रक्रिया में लैंगिक, समलैंगिक, नस्लीय, आर्थिक, शारीरिक चुनौतियों को बराबरी से स्थान महत्व दिया जाता है। अनुकंपा के बतौर नहीं, समता के साथ मौका सुनिश्चित किया जाता है। यह माना गया है कि अधिकांश परीक्षा प्रणाली में पर्चा तैयार करने वाले क्योंकि प्रभुत्व सम्पन्न श्वेत वर्ग से आते हैं, वे अन्य वर्णीय परिवारों की वास्तविकता से इतने अनभिज्ञ होते हैं कि उनके परीक्षण में अश्वेत छात्र श्रेष्ठ साबित ही नहीं हो पाते। तहजीबी हकीकत को विभिन्न जीवनशैली के रूप में देखे बिना कौन सी योग्यता सिद्ध हो सकती है। गोयाकि अब ट्रम्प काल मे अमेरिका के परिसर भी पूर्वगामी होते जा रहे हैं। समता समिति समाप्त न करने पर आर्थिक प्रतिबंध की धमकी झेल रहे हैं।

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सत्तारूढ़ दल हिन्दू सम्मेलन में छुआछूत को भगाने की बड़ी डींगे हांक रहा था। इस समिति ने सब कलई खोल दी। पर दलों से इतर सभी प्रभुत्वसंपन्न पूर्वगामी एक स्वर में नजर आये।

वैसे, जिस दिन जन्म से मिलने वाली विशिष्टता को खत्म किया जाएगा, तब बहुत कुछ बदलेगा। यदि खरबपतियों को मृत्यु कर देना पड़े, अधिकतम आय की सीमा तय हो, अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहित हो, तो माहौल समता के नजदीक आएगा। वह सब जिनको हर प्रगतिगामी कदम से वर्ग संघर्ष का खतरा लगता है, उन्हें मालूम होना चाहिये कि हिंसात्मक संघर्ष को टालने के लिए ही समावेशी ढांचा बनाया जाता है, वरना बहुजन खड़े हुए तो असल संग्राम होगा। खामोशी शांति का पर्याय नहीं होती। शोषण की कीमत पर संघर्ष को मुल्तवी करना कौन सा वर्ग संघर्ष से कम है।

बाबा साहेब की संविधान सभा मे दी गई चेतावनी की सामाजिक भेद की नींव पर लोकतंत्र नहीं टिक सकता। सबको याद रहना चाहिए। खासकर प्रभुत्वसंपन्न वर्ग को।

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