विचार

माफ करना या माफी एक एक्ट नहीं हो सकती

लिहाजा भाषा की मर्यादा हर तरफ रखी जानी चाहिए थी। लेकिन जो खुद शीशे के घर में रहते हैं, वे पत्थर नहीं मार सकते। पिछले दशक में भाषा की मर्यादा कब-कब याद रखी गई?

माफ करना या माफी एक एक्ट नहीं हो सकती
माफ करना या माफी एक एक्ट नहीं हो सकती फोटोः स्क्रीनशॉट

लोकतंत्र का तकाजा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व सम्पूर्ण विनय के साथ माफी मांगा करता है। राजशाही के दौर में लिहाजा माफ किया जाता था। अदालती प्रक्रिया में किसी निर्णय को कानूनी तौर पर स्थगित किया जाता है। उसे ही आम बोलचाल में माफी कहते हैं। पर इन दिनों 'माफ' किया जा रहा है। तो कई सवाल सामने आते हैं।

माफी का वीडियो अंधभक्तों के लिए

यह तो स्प्ष्ट है कि वह माफी का वीडियो अंधभक्तों के लिए है। ताकि वो और अंधकार में डूब जाएं। उन्हें यह कथित बड़प्पन बहुत भाये। यह वीडियो उस वर्ग के लिए कतई नही था जो निडर मुखर होकर सामने आया। अपने अनेक साथियों के द्वारा अवसादग्रस्त होकर मृत्यु का वरण करने से दुखी था। पुलिस के डंडों, पैलेट गन से डरा नहीं। वो डटा रहा। माफी उनको सम्बोधित जरूर थी पर उनको मनाने के लिए बिल्कुल नहीं थी। यह माफी उनको रिझा भी नहीं पाई। आनन-फानन चंद अभिभावकों के अभिभूत वीडियो बनवाए गए, जहां वो धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं। उनके बिगड़े बच्चों को इस वीडियो ने सही राह जो दिखाई।

यह बहुत संभव है कि कुछेक अभिभावकों ने धन्यवाद व्यक्त कर दिया हो। उस के दो कारण दिखाई देते हैं। हर पीढ़ी को भावी पीढ़ी बिगड़ी हुई जान पड़ती है। चूंकि हम एक संस्थागत वर्णानुक्रम, वर्गानुक्रम के सामाजिक ढांचे में रहते हैं। तो हर पीढ़ी को लगता है कि वह अपनी संतान को आजादी दे रहा है। जैसे कि वो कोई मेहरबानी हो। जबकि सब आजाद ही पैदा हुए हैं। अभिभावकों की भूमिका नगण्य नहीं है। सही गलत का संवेदनशील माहौल देना बेहद जरूरी है। उसी को संस्कार कह सकते हैं।

पितृसत्ता और उसका अहम

पर यहीं से विरोधाभास शुरू होता है। पूरी शिक्षा व्यवस्था इतनी व्यावसायिक हो चुकी की वह केवल पैसा कमाने का जरिया भर है। एक बार भौतिक लक्ष्य स्थापित करने के बाद कोई संवेदनशीलता नहीं बचती। फिर वो अभिभावकों को तब तक नहीं कचोटती जब तक सब कुछ उनके अनुकूल चल रहा है। पर जैसे ही खान-पान, जीवनसाथी का चयन रोजमर्रा की बसर का तरीका जुदा होने लगता है, तब चिढ़ और कुढ़ उपजने लगती है।

ऊपर से यदि संतान सवाल उठाने लगे, चुनौती देने लगे, तो मध्यमवर्गीय अहम आहत होता है। “और दो आजादी” तंज कसे जाते हैं। हम अपने माँ-बाप के आगे बैठते नही थे, का बखान होता है। यह भी सही है कि इस प्रतिक्रिया में ममतामयी डर, संतान के प्रति वाजिब चिंता भी होती है। कहीं कुछ अनुचित न हो जाये, करियर खराब न हो जाये। अपनी कुछ कुंठाएं भी होती हैं। जो कई बार बाहर नहीं निकलतीं।

विशेषकर पितृसत्ता में पिता कभी कुछ अभिव्यक्त नहीं कर पाता। संवाद नही करता। हुक्म करता है, इकबाल चलता है या फिर भुनभुनाकर खामोश रह जाता है। माँ को ताना मिलता है कि उसी ने सिर चढ़ाया है। पितृसत्ता में माँ को पहली बार किशोर होते बच्चों का साथ मिलता है। तब वह आवाज उठाती है। खासकर अपनी बेटियों के लिए। वो सब जो वो करने से वंचित हुई, अपनी बेटी को करने देती हैं।

किस-किस को माफ कर रहे है?

पिता मन मसोसता है। उसकी यह गति पितृसत्ता से बनी है। वो उसे अपने बच्चों की दोस्ती से रोकती है। अपने मनोभाव को प्रकट करने नहीं देती। क्योंकि अपनी भावना की प्रस्तुति को  दुर्बलता मानना सिखाया गया है। अनेक माताएं भी ऐसी होती हैं जो परिवार में बात नहीं रख पातीं।

तो उस पीढ़ी को माफी वाला वीडियो अच्छा लगा। अपने बच्चों को खुद नहीं कह पाए। मगर किसी ने तो टोका। मन तो हमारा था कि हाथ उठायें, पर नहीं उठा सके। यह भाव बना। पितृसत्ता वर्चस्व सिखाती है। थप्पड़ मार सकती है, पर बैठकर खुली चर्चा उसे बदतमीजी लगती है। कई सालों से संचित बहुत सी कुंठा इस वीडियो के जरिये अभिव्यक्त हुई। खासकर अपनी बेटियों पर लगाम न लगा सकने की कसक पूरी हुई। या फिर लगाम लगाया जाना सही साबित हुआ। ऐसे में समाज की चुप्पी कुछ कहती है।

किसी ने मान्यवर प्रधानमंत्री जी से नहीं पूछा कि आप और किस-किस को माफ कर रहे है? क्या उन्हें माफ किया जिन्होंने रेप की धमकी दी? उस पर कोई वीडियो क्यों नहीं। आखिर वो सब लाडली नहीं हैं क्या? इसी हफ्ते खिलाड़ी बहनों के साथ दुर्व्यवहार किया व्यक्ति जुर्म से आजाद कर दिया गया। पर उसके बहुत पहले ही उसे बख्शीश मिल चुकी।

जो शीशे के घर में रहते हैं, पत्थर नहीं मार सकते

इंटरनेट पर यह रेप की पहली धमकी नहीं है। बुली सुली डील पर विरोध का कोई वीडियो किसी का नहीं आया। प्रेम विवाह में अभिभावकों की जरूरी सहमति, लिव इन का पंजीयन, लव जिहाद का कथित आरोप मजहबी नहीं है। स्त्री की यौनिकता पर कब्जा करने की नीयत है। इस आंदोलन में छात्राओं ने नेतृत्व सम्भाला तो बहुत से वर्चस्व को धक्का लगा। पितृसत्ता की पकड़ ढीली पड़ी। सो अपने माईबाप होने को बरकरार रखने के लिए वीडियो बना।

लिहाजा भाषा की मर्यादा हर तरफ रखी जानी चाहिए थी। लेकिन जो खुद शीशे के घर में रहते हैं, वे पत्थर नहीं मार सकते। पिछले दशक में भाषा की मर्यादा कब-कब याद रखी गई? राजनीतिक भाषाई शुचिता तब कहां चली गई जब देश के पहले प्रधानमंत्री और सर्वाधिक 10 बरस अंग्रेजो की जेल में गुजारने वाले स्वराज संग्राम के शीर्ष नेता का बेहद ओछे शब्दो मे विरोध किया गया। उनकी आलोचना इतने निचले स्तर पर गिरी की जैसे किसी निहायत अय्याश व्यक्ति के बारे बात हो रही हो।

जो व्यक्ति रात दिन हिंदुस्तान के गांव शहर घूम-घूमकर स्वराज की अलख जगा रहा था। उसके पास अपने निजी जीवन के लिए भी समय नही था। पूरा जीवन सार्वजनिक और पारदर्शी था। वह प्रधानमंत्री होने के बाद प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर को कह गया “डोंट स्पेयर मी शंकर”। उस प्रधानमंत्री ने विरोध को विद्रोह नहीं समझा, निजी विरोध को मौका दिया कि कही निर्विरोध उन्हें तानाशाह न कर दे। उस पर छिछोरे आरोप लगाना माफी के काबिल नहीं। पर उसको चटकारे लेकर प्रोत्साहित किया गया। तब याद नहीं आई मर्यादा। यह याद नहीं आया कि भावी पीढ़ी को क्या भाषाई संस्कार दे रहे हैं। जब खुद पर बात आई तो बहुत बुरा लगा।

इसे भी पढ़ेंः सब पर बरपेगा ‘डीलिस्ट’ का कहर: असल में यह ‘डीरूट’ करने की साज़िश है

माफियों का कुछ इतिहास

फिर माफियों का कुछ इतिहास भी है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। स्वघोषित माफी वीर ने अंग्रेजी हुक्मरानों से माफी मांगी। पत्र में लिखा कि वे आज्ञाकारी पुत्र हैं जो भटक गए थे, सो उन्हें सरकार मौका दे, भूल सुधार हो सके। माईबाप सरकार ने आज्ञाकारी बेटे को सशर्त माफ कर दिया। उसके बाद आज्ञाकारी ने कभी उनके खिलाफ एक लफ्ज नहीं कहा। उल्टे उनकी फूट डालो राज करो की नीति को बहुत पुष्ट किया। द्वि-राष्ट्रवाद की पैरवी क्या आज्ञा पालन नहीं था?

सो माफ जब किया जाता है तो आज्ञापालक बनाने के लिए किया जाता है। वरना तो देशद्रोही आदि कहा जाता है। नागरिकता निर्माण का तकाजा है कि आज्ञा पालन टूटे। वो हुक्मरानों को पसंद नहीं। परिवार की पितृसत्ता को भी पसंद नहीं। तभी उन नेताओं पर अमर्यादित टिप्पणी को रस लेकर बहुत फॉरवर्ड किया गया, जिन्होंने मात्र अंग्रेजों से नहीं, हर तरह की गुलामी को ललकारा था। उसमें पितृसत्ता भी थी। आज बुरा लगा कि बात उन तक पहुंच गई।

इसे भी पढ़ेंः पक रही है प्रतिरोध की नई तहज़ीब

जो सच में माफ करते हैं, वे बखान नहीं करते

यह भाषा दरअसल पितृसत्ता के चलते परिवार के ढांचे पर भी किया गया हमला है। जो बरसों से खोखला होने लगा था। घर परिवार सुंदर होगा यदि आजाद रहे। आज्ञापालन से मुक्त होकर प्रेममय हो। वहां माफी की जरूरत नहीं रहेगी।

फिर जो सच में माफ करते हैं, वे बखान नहीं करते। कुछ सालों पहले दो नेताओं द्वारा अपने पिता के हत्याकांड में शामिल महिला आरोपी की सजा खारिज करने की पैरवी चुपचाप की गई। इसलिए कि सजा काटती महिला आरोपी के शिशु को अनाथ न होना पड़े। पर जब भावुक होकर उनसे यह पूछा गया कि आपने कैसे माफ किया। तब उन्होंने स्पष्ट कहा कि हम माफ करने वाले कौन होते हैं। एक परिस्थिति थी जिसमें कई पहलू थे। कौन किससे माफी चाहे।

यह भाव असल विनयशीलता का है। किसी को आज्ञापालन कराने के लिए नहीं। बल्कि खुद को हिकारत की कैद से रिहा करना है। बाकी सब महज एक “एक्ट“ है।

इसे भी पढ़ेंः सत्याग्रह से आता है सच्चा प्रतिरोध

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए