विचार

अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी सरकारें बाढ़ नियंत्रण में विफल, समय रहते नीतियों में तत्काल बदलाव की जरूरत

नदियों के प्राकृतिक बहाव से अत्यधिक छेड़छाड़ बहुत महंगा पड़ा है। अगर नदियों को जोड़ने की योजना को आगे बढ़ाया गया तो इससे नदियों का भूगोल ही बदल जाएगा, जो विनाशकारी साबित होगा। नदियों के बहाव में गतिरोध पैदा किए बिना ही इंसान को अपनी विकास यात्रा तय करनी चाहिए।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया 

बाढ़ नियंत्रण पर अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी बाढ़ की समस्या कम नहीं हुई है, अपितु पूरे देश के स्तर पर देखें तो यह पहले से और बढ़ी है। अनेक क्षेत्रों में यह देखा जा रहा है कि बाढ़ अब पहले से कहीं अधिक उग्र रूप में आती है। अभी तक के अनुभव से सीखते हुए हमें बाढ़ नियंत्रण नीति में जरूरी बदलाव करना चाहिए और एक संतुलित, बहुपक्षीय बाढ़ नियंत्रण नीति की ओर बढ़ना चाहिए।

उचित संतुलित नीति को अपनाना वैसे तो हमेशा से जरूरी था, लेकिन जलवायु बदलाव के दौर में तो यह और भी जरूरी हो गया है। इस दौर में अन्य आपदाओं के साथ बाढ़ की समस्या और भी बढ़ने की संभावना है। अतः इस संभावना को ध्यान में रखते हुए उचित और संतुलित नीति की ओर बढ़ना बहुत आवश्यक हो गया है।

पहली जरूरत इस बात की है कि नदियों के पर्वतीय और पठारी जल-ग्रहण क्षेत्रों में वनों और हरियाली की रक्षा पर, जल और मिट्टी संरक्षण पर कहीं अधिक ध्यान देना चाहिए। गहरे दुख की बात है कि आज भी बिना विशेष जरूरत के और महज नासमझी, जल्दबाजी में लिए फैसलों के आधार पर हिमालय जैसे नदियों के प्रमुख कैचमेंट क्षेत्र में भी दसियों हजारों पेड़ काट दिए जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में हरियाली बचाने से बाढ़ के विरुद्ध हमारा पहला और संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण मोर्चा मजबूत होता है।

इसके बाद हमें यह देखना है कि नदियों के प्राकृतिक बाढ़-फैलाव क्षेत्र यानि फ्लड प्लेन की स्थिति ठीक रहे। इसमें सीमेंट-कंक्रीट के कार्य नहीं होने चाहिए, बल्कि इस क्षेत्र का उपयोग इस तरह होना चाहिए कि इसमें बाढ़ का पानी फैलकर और रिसकर भू-जल भंडार में वृद्धि कर सके। इसके कुछ आगे के क्षेत्र में ऐसे बगीचे लगाए जा सकते हैं जिनमें कुछ अधिक देर तक पानी सहने वाले वृक्ष उगाए जा सकते हैं। उसके आगे के खेतों में अधिक जल सहने की क्षमता वाली बाढ़ क्षेत्रों के उपयुक्त स्थानीय किस्मों की फसलें लगाई जा सकती हैं।

बहुत महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जल निकासी की व्यवस्था ठीक रखी जाए। दूर-दूर के क्षेत्रों में तेजी से बढ़ाए गए सड़क, तटबंध निर्माण के कारण और नालों में कचरा फैंकने की प्रवृत्ति के कारण यह जरूरत और बढ़ गई है। बाढ़ का पानी आए तो किसी विशेष बाधा के बिना शीघ्रता से निकल जाए, यह एक बड़ी जरूरत है। बाढ़ अगर शीघ्र निकल जाए तो वह एक बड़ी समस्या नहीं है, अपितु लोगों की बड़ी समस्या तब होती है जब बाढ़ का पानी देर तक रुक जाता है और जल-भराव की समस्या गंभीर होती है।

पिछले अनुभवों से सीखते हुए तटबंधों के प्रति संतुलित नीति अपनाना बहुत आवश्यक है। कुछ स्थानों पर तटबंध निर्माण जरूरी हो सकता है, पर बहुत बड़े पैमाने पर तटबंध बनाने से जो समस्याएं सामने आई हैं उनसे तटबंधों का दूसरा पक्ष भी अब विस्तार से सामने आ चुका है। कई क्षेत्रों में तटबंधों से बाढ़ समस्या बढ़ी है या उग्र हुई है और अनेक अन्य जटिल समस्याएं भी उत्पन्न हुई हैं। अतः इन सब अनुभवों को संजोते हुए अंधाधुंध तटबंध बनाने के स्थान पर तटबंधों के प्रति संतुलित नीति अपनानी चाहिए।

इसी तरह बडे़ और मध्यम बांधों की बाढ़ नियंत्रण सीमाएं भी अब स्पष्ट हो गई हैं। अति विनाशकारी बाढ़ों के अनेक उदाहरण हैं जब बांधों में अत्यधिक पानी छोड़े जाने के कारण ही बाढ़ ने उग्र रूप लिया। बांध-प्रबंधन में बहुत सुधार की जरूरत है। बड़े बाधों पर बाढ़-नियंत्रण की उपयोगिता की दृष्टि से भी प्रश्न चिह्न है। इस संदर्भ में अब तक के अनुभवों का निष्पक्ष आकलन करते हुए उससे जरूरी सबक प्राप्त करना बहुत जरूरी है, पर एक सवाल है कि क्या सरकारी स्तर पर ऐसा निष्पक्ष आकलन संभव है?

नदियों के प्राकृतिक बहाव से अत्यधिक छेड़छाड़ करना प्रायः बहुत महंगा पड़ा है। यदि नदी जोड़ जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाया गया तो इससे नदियों का भूगोल ही बदल जाएगा और यह बहुत विनाशकारी सिद्ध होने की पूरी संभावना है। जहां तक संभव हो, नदियों के प्राकृतिक बहाव में कोई गतिरोध पैदा किए बिना (या इस गतिरोध को न्यूनतम बनाए रखते हुए) मनुष्य को अपनी विकास-यात्रा तय करनी चाहिए।

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