
“सुनवाई के दौरान मौजूद रहना जरूरी है। कृपया इसे आवश्यक समझें और बिना किसी भूल के शामिल होने के लिए ज़रूरी इंतज़ाम करें।“
मैंने व्हाट्सऐप पर आए एसआईआर नोटिस को नज़रअंदाज़ करने और सुनवाई में न जाने का फ़ैसला किया था। लेकिन फिर मेरी पत्नी मुझसे एक दिन पहले ही वहां चली गई। उसने बताया कि नोटिस भेजने वाला अधिकारी इस बात से नाराज़ था कि मैंने उसके व्हाट्सऐप मैसेज का कोई जवाब तक नहीं दिया।
ऊंचे ओहदे का अपना एक मुकाम होता है, इसलिए मैं उसके सामने कागज़ों की उस पुरानी फाइल के साथ पेश हुआ, जो यह साबित करती है कि मेरा अस्तित्व है और मैं उन लोगों को चुनने के काबिल हूं जिन्हें हम सम्मानपूर्वक 'जनसेवक' कहते हैं।
वहां परेशान और घबराए हुए लोगों की भीड़ थी—जैसा कि ऐसी जगह पर होना स्वाभाविक है जहां अनिश्चितता और अव्यवस्था आम बात हो, और जहां इस सरकार ने बिना वजह और ज़्यादा अनिश्चितता पैदा कर दी हो।
तकनीकी जगत के लोगों को 'डिसरप्शन' (बड़ी उथल-पुथल या बदलाव) शब्द बहुत पसंद है और वे इसे अच्छे या सकारात्मक अर्थ में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन असल में यह एक हिंसक शब्द है। आखिर किन लोगों की ज़िंदगी में उथल-पुथल मचती है और किस मकसद से? इस बारे में कोई नहीं सोचता, या शायद ही कभी सोचा जाता है। अपनी ज़िंदगी में आने वाली इस उथल-पुथल के मामले में गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों की कोई असल राय या भूमिका नहीं होती।
बहरहाल. वह अधिकारी असल में एक टीचर निकला जो पढ़ाने के बजाय अक्टूबर तक यही काम करने वाला है। वह मिलनसार, विनम्र और काबिल था और उसने कुछ ही मिनटों में यह प्रक्रिया पूरी कर ली। अक्सर ऐसा ही होता है और मैंने देखा है कि सरकारी कामकाज से सीधे जुड़े लोग ऐसे ही होते हैं, भले ही उनसे अजीबोगरीब काम करने को कहा जाए। इसमें वे कई अधिकारी भी शामिल हैं जिन्होंने हमारे ऑफ़िस पर छापे मारे थे और जिन्हें मेरे ख़िलाफ़ केस दर्ज करने वगैरह के आदेश दिए गए। असल में, कमांड चेन में ऊपर के स्तर पर ही दुर्भावना, अक्षमता और—जैसा कि आजकल अक्सर देखने को मिलता है—एक तरह की बेतुकी स्थिति मौजूद है।
मेरे दस्तावेजों की फ़ाइल बुरी हालत में है, और इसकी वजह कुदरत और इंसान—दोनों ही हैं। और साफ़ कहूं तो, ऐसे इंसान की वजह से जो खुद को भगवान समझता है। मेरा जन्म प्रमाणपत्र (बॉम्बे के नानावटी हॉस्पिटल का) और स्कूल छोड़ने का सर्टिफ़िकेट (सर जेजे इंग्लिश स्कूल का) 2006 में सूरत में आई बाढ़ में बह गए थे। दरअसल 'मिनिमम गवर्नमेंट' (कम से कम सरकारी दखल) की वजह से ऊपर की तरफ़ बने बांध में पानी जमा हो गया और फिर 'मैक्सिमम गवर्नेंस' (ज़्यादा से ज़्यादा सरकारी दखल) ने बिना किसी चेतावनी या तैयारी के उसे छोड़ दिया, जिससे शहर के किनारे वाले इलाकों में बाढ़ आ गई थी।
मेरे माता-पिता को अपनी छत पर अकेले और बिना किसी मदद के चार दिन बिताने पड़े थे, और इस दौरान उनका ज़्यादातर सामान खो गया था। तो फिर पेश करने के लिए अब और क्या बचा है? ज़ाहिर है, मेरा पासपोर्ट कोर्ट के पास ज़ब्त है। मुझे लगता है कि जब मुझ पर टैक्स लगाने या केस करने की बात आती है, तो सरकार मुझे भारतीय मानती है, लेकिन वोटिंग के समय उसे शक होता है कि मैं भारतीय नहीं हूं। मैं सोचता हूं कि देश भर में मेरे जैसे दूसरे 'अपराधी' इस अजीब स्थिति का सामना कैसे कर रहे होंगे।
खैर, मेरे पास अभी भी कुछ कागज़ात हैं — जैसे बैंक स्टेटमेंट, प्रॉपर्टी के कागज़ वगैरह — जो जमा किए जा सकते थे और उन्हें स्वीकार भीकर लिया गया। हो सकता है कि ये काफ़ी हों, या न भी हों। यह तो आगे पता चलेगा। लिस्ट से नाम हटा दिया जाना और फिर प्रताड़ना के दौर से गुज़रना ज़्यादा रोमांचक होगा। असम में, जो लोग बेरहम सरकार को अपनी नागरिकता का सबूत नहीं दे पाए, उनसे वोट देने का अधिकार तो छीना ही गया, साथ ही उन्हें जेल भी भेज दिया गया। ज़रा सोचिए उन लोगों का क्या होता होगा जिन्हें एक दिन पता चलता है कि उनके बैंक अकाउंट, लाइसेंस और पासपोर्ट अब मान्य नहीं रहे।
और हाँ, देश से निकाले जाने की ये सारी कहानियां भी हैं। मुझे उम्मीद है कि मुझे किसी सभ्य देश, शायद दक्षिण-पूर्व एशिया में भेजा जाएगा। मुझे चीन जाने में भी कोई दिक्कत नहीं होगी, जो मानवता का उभरता हुआ सितारा है; हालांकि सच कहूं तो, संस्कृति और खान-पान के लिहाज़ से मैं किसी दूसरे दक्षिण एशियाई देश में ज़्यादा सहज महसूस करूंगा।
अपनी किस्मत और इस सरकार को देखते हुए, ऐसा शायद ही होगा। इसके बजाय, मुझे यहीं रोककर रखा जाएगा—बिना वोट देने के अधिकार के—लेकिन मुझसे 'वंदे मातरम' के सभी छह छंद खड़े होकर गाने को कहा जाएगा। लोकतंत्र की जननी सम्मान और श्रद्धा की मांग तो करती है, लेकिन यह रिश्ता एकतरफ़ा है। आपको यह साबित करना होता है कि आप उसकी संतान हैं; अगर इस पर गौर करें तो यह एक अजीब स्थिति है।
'न्यू इंडिया' में कई कानूनों में यह मान लिया जाता है कि आरोपी ही दोषी है। आतंकवाद और नशीले पदार्थों से जुड़े कानूनों में पहले से ही ऐसा प्रावधान था। 2015 में इसे बीफ़ (गोमांस) रखने के मामलों में भी लागू कर दिया गया। इसमें आरोपी को ही यह साबित करना होता है कि वह दोषी नहीं है। 2018 में इसे 'लव जिहाद' कानूनों में भी शामिल कर लिया गया। असम ने नागरिकता के मामले में ऐसा करने का रास्ता दिखाया और आज हम यहां पहुंच चुके हैं।
क्या कुछ समय पहले ही बीजेपी अनिवार्य वोटिंग पर कानून बनाने की बात नहीं कर रही थी? पता नहीं उसका क्या हुआ और क्यों उनका रुख 'हर किसी को वोट देना चाहिए' से बदलकर 'कोई तब तक वोट नहीं दे सकता जब तक वह यह शुद्धता की परीक्षा पास न कर ले' हो गया। उनसे सिद्धांतों पर एक जैसा बने रहने की उम्मीद करना वैसा ही है जैसे उनसे इंसानियत या तहज़ीब की उम्मीद करना।
पहले मैं इस प्रक्रिया और वोट देने का अधिकार छिन जाने के ख्याल से बहुत परेशान हो जाता था (मैं तो सुबह-सुबह ही बूथ पर लाइन में लग जाता था)। अब मैं इसे लेकर ज़्यादा शांत हूं और सच कहूं तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इस देश के लोगों के लिए मेरे मन में बहुत प्यार है; लेकिन देश की बाकी चीज़ों के लिए मेरे मन में बहुत कम, या शायद बिल्कुल भी लगाव नहीं है।
न्यूयॉर्क शहर के मेयर ने पिछले साल अपने शानदार प्रचार अभियान के दौरान एक ऐसी वोटर से मिलने की बात शेयर की थी जिसके लिए न्यूयॉर्क को लेकर जज्बा ही बदल गया था। उसने कहा था, "मैं न्यूयॉर्क से प्यार करती थी," लेकिन, "अब यह सिर्फ वह जगह है जहां मैं रहती हूं।"
बात तो एकदम सटीक है।