
पता नहीं वह कौन-सा देश था। हो न हो, वह एशिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश रहा होगा। वहां राजतंत्र था मगर आधुनिक फैशन के अनुरूप उसका नाम 'लोकतंत्र' रखा गया था। उस 'लोकतंत्र' का राजा वैसे तो शुरू से ही पागल था मगर अब पूरी तरह पागल हो चुका था, जबकि जहां लोकतंत्र जैसा कुछ-कुछ होता है, वहां राजा नहीं होते और होते हैं तो राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के भेस में होते हैं।
बताते यह भी हैं कि वे पागल नहीं होते क्योंकि जनता ने उन्हें इस विश्वास के साथ चुना होता है कि वे सबकुछ हैं मगर पागल नहीं हैं। उदाहरण के लिए डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू को कोई पागल कह सकता है? इन्होंने दुनिया को पागल बना रखा है मगर ये और वह शख्स जिसका नाम इनके साथ लिया जाता है, वह पागल नहीं है! पागल है वह जनता जिसने इन्हें अपनी बर्बादी के लिए चुना!
तो उस देश का राजा पागल था। वह पागल था तो चुन-चुन कर उसने जो भी मंत्री-तंत्री-जंत्री-संत्री आदि बनाए थे, सब पागल थे। कुछ तो राजा से भी ज्यादा पागल थे और वे राजा के सबसे दुलारे थे। ये रोज अपने पागलपन की प्रस्तुति प्रजा के समक्ष देते थे। उसका वीडियो राजा के पास भिजवाते थे ताकि उनके पागलपन की सनद उसके पास रहे। उसे भरोसा रहे कि उसने सभी पदों पर बहुत योग्य व्यक्तियों को नियुक्त किया है। राजा का अलिखित आदेश था कि कुछ और करो या न करो मगर अपने पागलपन के सबूत देते हुए हर दिन प्रातःकाल राजा को महान बताओ। दिन में न्यूनतम एक बार पागलपन का प्रदर्शन करना उनका कानूनी और नैतिक दायित्व है।
पागल होते हुए भी मंत्री-संत्री इतने पागल नहीं थे कि दिन में दो-चार बार अपने पागलपन का सार्वजनिक प्रदर्शन न करें। बीमार से बीमार, आईसीयू में भर्ती मंत्री-संत्री-तंत्री-जंत्री भी पागलपन का कम से कम एक नमूना तो पेश करता ही था। एक दिन एक मंत्री ने अपने पागलपन का एक भी नमूना पेश नहीं किया तो राजा ने तत्काल प्रभाव से उसे पद से हटा दिया।
बाद में पता चला कि उससे यह चूक इसलिए हुई थी कि वह उस दिन तड़के ही मर चुका था।यह जानकारी मिलने के बाद भी राजा ने उसे माफ़ नहीं किया। उसका अंतिम संस्कार राजधानी में करने की इजाजत नहीं दी गई! उसके परिजनों को अपने राज से अविलंब बेदखल करने का आदेश दिया।
एक बार किसी की सलाह मानकर उसने एक समझदार को भी प्रयोग के तौर पर मंत्री बना दिया। जल्दी ही ऐसा दिन आया कि झोंक में आकर उसने राजा को उसके मुंह पर ही पागल कह दिया! इसके बाद उसे तत्काल मौत की सजा़ दे दी गई मगर पूरे देश में यह खबर आग की तरह फ़ैल गई कि राजा पागल है। यह बात अब उसके मंत्री भी कहने लगे हैं, जबकि तब तक केवल एक मंत्री ने ही ऐसा कहा था!
उस राजा ने कभी प्रजा की तरफ़ ध्यान नहीं दिया था, जिसकी आधे से ज्यादा प्रजा अभी भी पागल नहीं थी और जो पहले पागल हो चुके थे, वे भी राजा और उसके मंत्रियों के पागलपन से इतने त्रस्त थे कि होश में आ चुके थे।
अब पूरे राज्य में 'राजा पागल है' के पोस्टर दिखाई देने लगे। ये पोस्टर ठीक उस पोस्टर के ऊपर लगाए गए थे, जिन पर लिखा था, 'राजा महान है, ईश्वर का अवतार है, नान बायोलॉजिकल है। ईश्वर ने उसे जन्म इसलिए दिया है कि वह इस देश पर राज करके इसे सतयुग में ले जाए'।
राजा के सिपाही 'राजा पागल है' के पोस्टर उखाड़ते तो साथ में 'राजा महान है' के पोस्टर भी उखड़ जाते थे! राजा के पोस्टर एक जगह से उखाड़े जाते तो दूसरी जगह प्रकट हो जाते। दूसरी जगह से उखाड़े जाते तो तीसरी, चौथी और पांचवीं जगह प्रकट हो जाते! पूरे राज्य में यह बात फैल गई कि राजा पागल है। कोई उसे अब राजा नहीं कहता था। उसके बारे में प्रजा को जब भी बात करना होता तो वह उसे पागल कहती थी!
धीरे-धीरे राजा के सिपाही भी मानने लगे थे कि राजा पागल है। राजा के अधिकारी और कर्मचारी भी उसे 'पागल 'मानने लगे थे। हद तो यह थी कि राजा ने स्वयं भी अपने को पागल मानना शुरू कर दिया था। फिर तो मंत्रियों को भी कहना पड़ा कि राजा पागल है।
अब आप ये चाहते हैं कि मैं यह भी बताऊं कि उस राजा का अंत कैसा हुआ। क्यों बताऊं? अरे आप भी तो इतिहास पढ़िए और अपनी कल्पना के घोड़े भी दौड़ाइए। जब वे हांफने लग जाएं , दौड़ने से इनकार कर दें, उनके मुंह से झाग आने लगें तो समझिए कि आप उस सत्य तक पहुंच चुके हैं, जिस तक आप चाहते हैं कि मैं आपको ऊंगली पकड़ कर पहुंचाऊं!
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