विचार

कितना सच्चा है यह दावा कि बासतीय डे परेड में शामिल होने वाले मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं!

दरअसल जिस भारत-फ्रांस सहयोग की बात की जा रही है उसकी शुरुआत डॉ मनमोहन सिंह ने बासतीय डे समारोह के दौरान ही खी, जिसे निश्चित रूप से मोदी ने जारी रखा है और इसी कारण उन्हें इस साल की बास्तीय डे समारोह में आमंत्रित किया गया था।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

खूब चर्चा है कि नरेंद्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्हें फ्रांस के बासतीय डे समारोह के लिए विशेष अतिथि बनाया गया था? बासतीय जे समारोह फ्रांसीसी क्रांति की याद में मनाया जाता है जब क्रांतिकारियों ने किलों पर हमला कर उन कैदियों को रिहा करवाया था जिन्हें किंग के खिलाफ साजिश रचने के आरोपों में कैद किया गया था।

लोगों की स्मृति बहुत क्षणिक होती है, यहां तक कि अखबारों और न्यूज चैनलों के वरिष्ठ संपादकों को भी लगता है कुछ याद नहीं है। लेकिन कम से कम उन संपादकों को तो अच्छी तरह याद होगा पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह 2009 में बासतीय डे समारोह में शामिल हो चुके हैं। उस समय निकोलस सारकोज़ी फ्रांस के राष्ट्रपति थे। उस साल के समारोह में भारतीय सेना की मराठा रेजीमेंट ने शौंज़ एलीसे पर मार्च किया था और वही पहला मौका था जब भारतीय सेना की किसी टुकड़ी ने इस समारोह में हिस्सा लिया था।

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इस समारोह की परेड में शामिल होने के लिए भारतीय सेना की इस टुकड़ी के लिए दो महीने पहले ही विशेष किस्म के बूट बनवाए गए थे ताकि एलीसे परेड और मार्च के दौरान वे परेड मार्ग के पथरीली रास्ते पर न फिसलें और न लड़खड़ाएं।

निस्संदेह इस साल की परेड में नौसेना और वायुसेना के अलावा स्पेशल बैंड ने भी इस परेड में हिस्सा लिया और भारतीय सेना के मार्चिंग स्टाइल और फ्रांसीसी सेना से अलग किस्म के सधे हुए कदमताल कर पैरिसवासियों का दिल जीत लिया। लेकिन 2009 की परेड के बाद भारत ने फ्रांसीसी सेना के दल को भारत की गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने का न्योता भी दिया था,लेकिन तब तक भारत में मनमोहन सिंह और फ्रांस में निकोलस सारकोज़ी पद से हट चुके थे।

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तो सवाल उठता है कि आखिर किसी को क्यों याद नहीं रहा कि फ्रांस में भारतीय टुकड़ी ने पहली बार मार्च 2009 में किया था और भारत के प्रधानमंत्री ने इसमें हिस्सा लिया था? शायद इसलिए क्योंकि बीजेपी आईटी सेल तमाम बातों की तरह इस मामले में भी इतिहास को नए सिरे से लिखना चाहती है कि मोदी ही पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने फ्रांस की बासतीय डे समारोह में हिस्सा लिया।

लेकिन इतिहास को कभी भी मिटाया नहीं जा सकता, चाहे कोई कितनी भी कोशिश कर ले। बासतीय डे समारोह में संपादकों और पत्रकारों द्वारा डॉ. मनमोहन सिंह की मौजूदगी को याद न करने पर आपत्ति जताने वाले पहले व्यक्ति बीजेपी के पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा थे। उन्होंने ट्वीट में लिखा, “मैं अब भी अखबार पढ़ता हूं। आज से पहले किसी ने नहीं कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह को फ्रांस में बासतीय डे समारोह में आमंत्रित किया गया था।''

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इसी बीच फ्रांस के अंग्रेजी भाषा के न्यूज चैनल फ्रांस-24 ने मराठा रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर के साथ उनके 2009 के इंटरव्यू का एक वीडियो भी जारी किया था। यह रेजीमेंट 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा स्थापित पहली स्वदेशी सेना इकाई थी। इसके बाद कुछ ही समय में ऐसी ही अन्य रिपोर्ट्स भी इंटरनेट पर नजर आने लगीं।

इस बीच, बीजेपी आईटी सेल एक और विवाद में फंस गया। आईटी सेल ने भारत के नक्शे को ट्वीट करके मोदी की बासतीय डे में शामिल होने के मौके को उन्हें विश्वगुरु के रूप में प्रचारित करने के लिए किया था। लेकिन उनसे गलती यह हुई कि बीजेपी ने इस नक्शे में भारत के कुछ संप्रभु क्षेत्र को पाकिस्तान और चीन के हिस्सों के रूप में दिखा दिया। वैसे भी यशंवत सिन्हा और फ्रांसीसी टेलीविजन चैनलों पर दिखाई गई हकीकत का जवाब देने का मौका तो था ही नहीं उसके पास।

और, शायद कांग्रेस प्रवक्ताओं को भी इस तथ्य की जानकारी नहीं थी और वे तो बस बीजेपी आई टी सेल के भारत के मानचित्र में की गई गलती को ही उछालने में लगे रहे। हां कांग्रेस मीडिया सेल प्रमुख जयराम रमेश ने जरूर इंदिरा गांधी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति शाल द गौल की एक तस्वीर जरूर ट्वीट की। उन्होंने ट्वीट में लिखा, “उन्होंने अपने साथियों को बताया था कि कोई भी महिला राजनीति में कामयाब नहीं हो सकती। लेकिन इस महिला ने वह कर दिखाया।” जयराम रमेश ने द गौल के वक्तव्य का हवाला दिया था। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी ने शाल द गौल के साथ सारी बातचीत फ्रांसीसी भाषा में ही की थी।

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दरअसल जिस भारत-फ्रांस सहयोग की बात की जा रही है उसकी शुरुआत डॉ मनमोहन सिंह ने बासतीय डे समारोह के  दौरान ही खी, जिसे निश्चित रूप से मोदी ने जारी रखा है और इसी कारण उन्हें इस साल की बास्तीय डे समारोह में आमंत्रित किया गया था।

इसी तरह ग्रांड क्रॉस लीजॉं दऑनियर का सवाल है। बीजेपी आईटीसेल ने इस मामले में भी मोदी को ही प्रचारित किया कि इसे हासिल करने वाले मोदी ही पहले व्यक्ति हैं।लेकिन हकीकत यह है कि उनसे पहले भी कई लोगों को यह सम्मान दिया जा चुका है, जिनमें आजादी से पहले पटियाला और कपूरथला के महाराजा और बाद में जेआरडी टाटा, सत्यजीत रे, पंडित रविशंकर शास्त्री और हाल के दिनों में शाहरुख खान और शशि थरूर शामिल हैं। सत्यजीत रे स्वास्थ्य कारणों से पैरिस नहीं जा पाए थे तो फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने कलकत्ता (अब कोलकाता) आकर उन्हें यह सम्मान दिया था।

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