
‘अगर कोई सलीम पहचान बदलकर, सुरेश बनकर भोली-भाली लड़कियों को फंसाने की कोशिश करेगा, उसे ताजिंदगी याद रहने वाला सबक सिखाया जाएगा।’ यह घोषणा गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी की है, जो उन्होंने गुजरात विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2006 में संशोधन पेश करते हुए विधानसभा में की। संघवी ने 20 फरवरी को विधानसभा में कहा कि संशोधन ‘लड़कियों की गरिमा और सनातन धर्म की रक्षा’ के लिए है। पंचमहल के मामलों का हवाला देते हुए संघवी का दावा था कि जिले में एक भी मुस्लिम या मस्जिद न होने के बावजूद वहां निकाह के सैकड़ों प्रमाण पत्र जारी हुए। उन्होंने बनासकांठा, नवसारी और मेहसाना जिलों से भी ऐसे मामलों का हवाला दिया। लेकिन इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि का कोई आधार नहीं मिला!
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राज्य में विवाह पंजीकरण के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य बनाने वाले इस कानून में अंतिम प्रावधान शामिल करने से पहले जनता से एक महीने के भीतर सुझाव मांगे गए हैं।
इंडियन एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय (23 फरवरी 2026) में तीखी टिप्पणी की: ‘जब कोई सरकार सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों से माता-पिता की अनुमति मांगने लगे, तो यह अपने आप में कई सीमाओं का उल्लंघन है। यह नागरिकों की निजता का अतिक्रमण है; नागरिक स्वतंत्रता कमजोर करता है; और महिलाओं को धोखे के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील और स्वतंत्र चुनाव या निर्णय लेने में असमर्थ मानकर उन्हें कमजोर करता है।’
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गुजरात रूढ़िवाद और कट्टरपंथ की नई लहर में है, जहां कभी आपसी सहमति की ‘अनुबंध प्रणाली’ सहमति से दो वयस्कों के एक साथ रहने को पर्याप्त थी। यहां लड़कियां, जो अक्सर लड़कों की तुलना में बेहतर शिक्षित और बेहतर रोजगार वाली होती हैं, जीवनसाथी की तलाश में तेजी से अपने समुदाय से बाहर देख रही हैं।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई की पूर्व प्रोफेसर विभूति पाटिल कहती हैं, “अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह अपरिहार्य हैं। जब युवा साथ-साथ पढ़ते हैं, साथ काम करते हैं, तो जीवन साथी का चुनाव भी स्वयं ही करेंगे।”
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अगर विधानसभा यह संशोधन पारित कर देती है, तो दंपतियों को दोनों पक्षों और दो गवाहों द्वारा हस्ताक्षरित नोटरीकृत आवेदन, पहचान पत्र, आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र, विवाह का निमंत्रण पत्र, तस्वीरें और माता-पिता को सूचित किया गया है या नहीं, यह बताते हुए शपथपत्र देना होगा। दोनों पक्षों के माता-पिता से भी ऐसे ही दस्तावेज मांगे जाएंगे। सहायक रजिस्ट्रार की पुष्टि 10 कार्य दिवसों के भीतर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या भौतिक रूप से भेज दी जाएगी। रजिस्ट्रार द्वारा सभी आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करने के 30 दिन बाद विवाह का पंजीकरण होगा।
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यह संशोधन पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के पूर्व सदस्यों द्वारा दिसंबर 2025 में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को सौंपे गए ज्ञापन का नतीजा हैं, जिसमें विवाह पंजीकरण के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य करने की मांग की गई थी। पाटीदार सेना ने कोर्ट मैरेज और गवाहों की आयु पर अतिरिक्त प्रतिबंध की भी मांग की। खेड़ा जिले के महुधा तालुका के नंदगांव में ग्राम सभा ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें परिवारों की इच्छा के विरुद्ध विवाह करने वाले जोड़ों के सामाजिक बहिष्कार की बात कही गई। प्रस्ताव में मांग है कि ऐसे जोड़ों को न सिर्फ सामुदायिक सुविधाओं, धार्मिक सभाओं और सामाजिक समारोहों में भाग लेने से रोका जाए बल्कि उन पर दो लाख रुपये तक का जुर्माना लगे।
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प्रो. पाटिल के अनुसार, विधेयक पारित होने तक राज्य में विवाह पंजीकरण पर रोक रहेगी। कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रस्तावित संशोधन संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों को अपना जीवनसाथी को चुनने का मौलिक अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि एक बार व्यक्ति के कानूनी रूप से वयस्क हो जाने के बाद माता-पिता द्वारा उसकी स्वायत्तता प्रतिबंधित नहीं की जा सकती, जबकि यह संशोधन माता-पिता को अपने वयस्क बच्चों द्वारा चुने गए जीवनसाथी पर प्रभावी रूप से वीटो करने का अधिकार देता है।
शिक्षाविद और कार्यकर्ता प्रोफेसर हिरेन शाह इसे 2027 के विधानसभा चुनावों में पटेल वोट हासिल करने का राजनीतिक हथकंडा मानते हैं: “हमारे पास अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाहों को सुगम बनाने के लिए विशेष विवाह अधिनियम (एसएमए) पहले से है। राज्य संशोधन एसएमए को रद्द नहीं कर सकता। पटेल मुख्यमंत्री ने यह कदम ताकतवर पटेल लॉबी को लुभाने के लिए उठाया है।”
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रिपोर्ट्स बताती हैं कि गुजरात के युवाओं में जाति-धर्म की बंदिशें तोड़ प्रेम विवाह को लेकर बेचैनी बढ़ी है। किशोरों के बीच शादी से पहले यौन संबंध असामान्य नहीं रहा। चिंताजनक यह जरूर है कि तथाकथित ऑनर किलिंग के मामले इधर, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़े हैं, जहां युवा जोड़ों की हत्या कर शवों को पेड़ों पर लटकाना और इसे आत्महत्या बता देना आम है।
गुजरात स्थित गैर-लाभकारी संस्था एरिया नेटवर्किंग एंड डेवलपमेंट इनिशिएटिव्स (आनंदी) और एनजीओ महिला संगठन के एक अध्ययन में पंचमहल और दाहोद के तीन जिलों में 2018 से 2021 के बीच हुई अप्राकृतिक मौतों की जांच के नतीजे चिंताजनक रहे। आधिकारिक तौर पर बतौर आत्महत्या दर्ज 88 प्रतिशत मामलों में युवा दंपतियों के शवों पर कथित ‘फांसी’ से पहले घाव और चोट के निशान मिले। ऐसी संदिग्ध परिस्थितियों में मारे गए लोगों में ओबीसी समुदाय के 60 युवा पुरुष और महिलाएं तथा 26 आदिवासी थे।
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आनंदी की कार्यकारी निदेशक नीता हार्डिकर कहती हैं, “मैंने खुद एक लड़के और एक लड़की को पेड़ से लटके देखा है और दोनों के गले में एक बस एक छोटा दुपट्टा बंधा था। क्या यह संभव है? उनमें से किसी में भी आत्महत्या के आम लक्षण (लार टपकना, पेशाब या मल त्याग) नहीं थे। कुछ लड़कों ने चप्पलें पहनी हुई थीं। एक बार तो एक विकलांग व्यक्ति पेड़ से लटका मिला।” पुलिस और सामुदायिक नेताओं के पास बस एक ही काम है: सामाजिक कार्यकर्ताओं को कहना कि वे अपने काम से मतलब रखें और ऐसे मामलों में दखल न दें।
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राज्य के आदिवासी समुदायों में ‘ऑनर किलिंग’ का कोई अतीत नहीं मिलता, लेकिन स्थानीय नेताओं और स्वयंभू सतर्कता समूहों की सारी ऊर्जा गांव के सरपंचों और पंचायत नेताओं को उन युवाओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए ‘राजी’ करने में जुटी दिखती है, जो भागकर शादी कर लेते हैं या शादी से पहले यौन संबंध बनाते हैं।
कार्यकर्ता सेजल डंग कहती हैं, “महिलाओं के खिलाफ लैंगिक भेदभाव का दौर है और यह बदले की कार्रवाई उसी का नतीजा है। हमारी जेलें बलात्कार, अपहरण और अन्य अपराधों के आरोप में गिरफ्तार युवकों से भरी पड़ी हैं।” वह कहती हैं कि जाति आधारित सम्मेलन (राज्य में शक्तिशाली ब्राह्मण, पाटीदार और ओबीसी समूहों द्वारा आयोजित) “हमारे समाज में व्याप्त एक नए तरह की गुंडागर्दी है। …वे महिलाओं पर पूर्ण नियंत्रण चाहते हैं। भय का माहौल बनाने के लिए पहले उन्होंने ‘लव जिहाद’ की बात की। फिर आदिवासियों और दलितों पर हमले किए। अब, यह महिलाओं पर बहुत सोचा-समझा हमला है।”
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दिसंबर 2025 के मध्य में, सूरत की गायिका आरती संगानी ने गोंडल के तबला वादक देवांग गोहेल से विवाह करने का फैसला क्या किया पूरे राज्य में जैसे आग ही लग गई। हर तरफ आलोचना होने लगी। आरती के पिता ने बेटी के फैसले को विश्वासघात बताया। अन्य मामले में ब्राह्मण युवक यश उपाध्याय और पाटीदार महिला पियू के बीच अंतरजातीय विवाह ने पाटीदार समुदाय में सनसनी फैला दी। उपाध्याय ने दावा किया कि पियू के पिता ने उन्हें और उनके पिता को सुलह-समझौते के लिए बुलाया, तो उनके साथ न सिर्फ मारपीट की गई बल्कि पियू को बिना नंबर प्लेट वाली कार में अगवा कर लिया गया।
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ब्राह्मण लोक गायिका किंजल दवे ने जैन व्यवसायी ध्रुविन शाह से विवाह का फैसला किया तो समुदाय ने उनके पिता का बहिष्कार कर दिया, क्योंकि वह बेटी के फैसले के साथ थे। लेकिन साहसी लोकगायिका ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर इस बहिष्कार का विरोध किया।
कई लोगों का मानना है कि इसी विरोध ने आरक्षण समर्थक आंदोलन के नेता अल्पेश कथिरिया को ऐसे कानून की मांग के लिए उकसाया, जो पंजीकृत विवाहों के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य बना दे। इसके बाद पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेताओं ने गृह राज्यमंत्री हर्ष संघवी से मुलाकात कर यह मांग दोहराई।डंग का कहना है, “अब अमीर और मशहूर लोगों के बच्चे तो महानगरों या विदेशों में रहते हैं और सुरक्षित हैं, इसलिए जाहिर है कि यह प्रस्तावित कानून हम बाकी लोगों के लिए ही है।”
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