
डोनाल्ड ट्रम्प और बेन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ युद्ध यह मानकर शुरू किया कि भारी सैन्य ताकत के दम पर वे वह हासिल कर सकते हैं, जो दशकों के प्रतिबंधों, राजनयिक अलगाव और खुफिया ऑपरेशन से संभव नहीं हो पाया था: यानी ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक को पंगु बना देना, उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति को तोड़ देना और पश्चिम एशिया पर अमेरिका-इजरायल का एकछत्र वर्चस्व स्थापित करना।
आठ महीने बाद, जो कुछ हुआ है, विडंबना इससे शायद ही अधिक विनाशकारी हो सकती थी। जिस ईरानी शासन को वे पूरी तरह कमजोर कर देना चाहते थे, वह तो टिक गया, जबकि इन दोनों नेताओं को चुनावों में अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। नेतन्याहू संसद में अपना बहुमत खो चुके हैं, और ट्रम्प के देखते-देखते डेमोक्रेट्स ने हाउस और सीनेट, दोनों पर कब्जा कर लिया है। जो दो नेता ईरान के राजनीतिक भविष्य को अपनी मर्जी से तय करना चाहते थे, वे अब खुद अपने ही भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।
28 फरवरी 2026 को शुरू किया गया अमेरिका और इज़राइल का संयुक्त हमला, ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय प्रभाव के खिलाफ एक निर्णायक प्रहार के रूप में पेश किया गया था। ट्रम्प ने भारी सफलता का वादा किया था, जबकि नेतन्याहू ने इस टकराव को ईरान को बेअसर करने के अपने जीवन भर के मिशन की परिणति के रूप में सामने रखा था। दोनों का मानना था कि सैन्य श्रेष्ठता, रणनीतिक जीत में बदल जाएगी।
लेकिन दोनों यह नहीं समझ पाए कि सैन्य ठिकानों को नष्ट करना, राजनीतिक सत्ता को नष्ट करने के समान नहीं है। बम बुनियादी ढांचे को तो तबाह कर सकते हैं, लेकिन वे न तो वैधता दे सकते हैं, न ही अपनी बात मानने वाली सरकार बना सकते हैं, और न ही इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि बुरी तरह पिटा हुआ दुश्मन आत्मसमर्पण कर देगा।
ईरान ने विनाश, आर्थिक कठिनाई और मानवीय पीड़ा के रूप में भारी कीमत चुकाई है। फिर भी इस्लामिक गणराज्य सत्ता में बना हुआ है, बातचीत में उसका पलड़ा पहले से भारी हुआ है, और उसकी लीडरशिप दुनिया की दो सबसे दुर्जेय सैन्य शक्तियों का विरोध करने का दावा कर सकती है। युद्ध ने तेहरान को राष्ट्रीय प्रतिरोध की भाषा में अपना शासन बनाने की भी अनुमति दी है। पहले घरेलू असंतोष से चुनौती झेल रही सरकार को अपने शासन के विरोध को राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए विदेशी वित्त पोषित खतरे के रूप में चित्रित करने का अवसर मिल गया है। ट्रम्प और नेतन्याहू ने अनजाने में ईरान के शासकों को वही राजनीतिक अवसर सौंप दिया है जिसकी उन्हें ज़रूरत थी।
यह रणनीतिक नाकामी इसलिए और भी बड़ी हो जाती है, जब इसे इस युद्ध के दो मुख्य सूत्रधारों के लिए उनके अपने देश में हुए नतीजों के संदर्भ में देखा जाता है। नेतन्याहू 27 अक्टूबर को हुए इज़रायली चुनावों में इस उम्मीद के साथ उतरे थे कि ईरान के साथ टकराव से उनकी छवि एक ऐसे अपरिहार्य रक्षक के रूप में और मजबूत होगी, जो इज़रायल की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। ट्रम्प ने खुलकर उनका समर्थन किया और उनकी इस साझेदारी को इज़रायल के अस्तित्व के लिए जरूरी बताया। इसके उलट, 120 सदस्यों वाली 'नेसेट' (इज़रायली संसद) में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गुट को केवल 53 सीटें मिलीं, जबकि 67 सीटें उन दलों के पास गईं जो उनके सत्ता में बने रहने के खिलाफ हैं। हालांकि गठबंधन की बातचीत के जरिए वे अभी भी प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें वह निर्णायक जनादेश नहीं दिया, जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे।
नेतान्याहू के लिए, यह नतीजे महज एक आम चुनावी हार से कहीं बढ़कर हैं। उनका राजनीतिक करियर काफी हद तक इस बात पर टिका रहा है कि वे इजरायलियों को यह यकीन दिलाते रहे हैं कि उनके देश की सुरक्षा के लिए जरूरी अंतरराष्ट्रीय संपर्क और रणनीतिक दृढ़ संकल्प केवल उन्हीं के पास है। ट्रम्प के साथ उनके असाधारण संबंधों को उनकी सबसे बड़ी चुनावी ताकत माना जा रहा था, लेकिन यही दिखावी ताकत उनके लिए बोझ बन चुकी है। लगातार टकराव के जरिए स्थायी सुरक्षा का उनका वादा, एक थके हुए समाज, लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने और उनके नेतृत्व को लेकर बढ़ते संदेहों की वास्तविकता के सामने नहीं ठहर पाया।
उधर ट्रम्प की तो इससे कहीं ज्यादा फजीहत हुई है। वे 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा देने और पिछली सरकारों की तरह विनाशकारी विदेशी सैन्य अभियानों से बचने का वादा करके व्हाइट हाउस लौटे थे। फिर भी, वे खुद को मध्य-पूर्व के एक और महंगे और कभी न खत्म होने वाले युद्ध में उलझा बैठे। वह भी एक चक्रव्यूह जैसा वह युद्ध जिसके लक्ष्य बहुत व्यापक थे, लेकिन उससे बाहर निकलने की कोई ठोस रणनीति नहीं थी। इसके नतीजे ऊर्जा (तेल) की बढ़ती कीमतों और लगातार बनी हुई आर्थिक चिंता के रूप में अमेरिकी परिवारों तक पहुंचे। जिन मतदाताओं ने उन्हें इसलिए समर्थन दिया था कि उन्हें आर्थिक राहत मिलेगी और विदेशों में संयम बरता जाएगा, वे अब एक ऐसे संघर्ष की कीमत चुका रहे थे, जिसके फायदे समझ पाना लगातार मुश्किल होता जा रहा था।
3 नवंबर को हुए मध्यावधि चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। डेमोक्रेट्स ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट, दोनों पर कब्ज़ा कर लिया है; इसमें पारंपरिक रूप से रिपब्लिकन गढ़ माने जाने वाले इलाकों में मिली जीत भी शामिल है। हालांकि ट्रम्प खुद चुनावी मैदान में नहीं थे, लेकिन उनके राष्ट्रपति कार्यकाल पर ज़रूर मुहर लगनी थी। उनके प्रशासन की आर्थिक नीतियां, काम करने का तरीका और विदेश नीति से जुड़े कदम - इन सभी के कारण लोगों में भारी नाराज़गी पैदा हुई। रिपब्लिकन पार्टी की हार की इकलौती वजह ईरान युद्ध नहीं था, लेकिन यह उस राष्ट्रपति कार्यकाल का एक बड़ा प्रतीक बन गया, जिसका आम अमेरिकियों की प्राथमिकताओं से कोई लेना-देना नहीं रह गया था।
शायद सबसे अहम प्रतिक्रिया उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस की ओर से आई, जिन्होंने स्पष्ट रूप से ईरान युद्ध को रिपब्लिकन पार्टी की हार का मुख्य कारण बताया। उनका यह विश्लेषण केवल चुनावी हार की समीक्षा तक सीमित नहीं था। इसने इज़राइल के साथ अमेरिका के संबंधों को लेकर ट्रम्प के अपने राजनीतिक अभियान के भीतर बढ़ती दरार को उजागर कर दिया। जो मतदाता कभी ट्रम्प के 'अमेरिका फर्स्ट' (अमेरिका सर्वोपरि) के नारे का समर्थन करते थे, वे अब युद्ध को खत्म करने और इज़राइल को दिए जा रहे अमेरिका के बिना शर्त समर्थन पर फिर से विचार करने की मांग कर रहे हैं। नेतन्याहू की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धि ये थी कि इज़राइल की प्राथमिकताओं के साथ अमेरिकी ताकत का लगभग स्वतः जुड़ जाना होता है, यह उपलब्धि अब कमजोर पड़ने लगी है।
इसी बिन्दु पर इस युद्ध का खुद को ही नुकसान पहुँचाने वाला स्वरूप पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। नेतन्याहू ईरान को कमजोर करना चाहते थे और साथ ही क्षेत्र में इज़राइल के वर्चस्व को मजबूत करना चाहते थे। लेकिन इसके बजाय, उन्होंने इज़राइल को अमेरिकी घरेलू राजनीति में एक ऐसा मुद्दा बना दिया है, जिस पर काफी विवाद हो रहा है। गाज़ा की वजह से इज़राइल के समर्थन में मौजूद पारंपरिक टू-पार्टी सहमति पहले से ही दबाव में थी। ईरान के साथ युद्ध ने इस सहमति के कमजोर पड़ने की प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है। इसने प्रोग्रेसिव डेमोक्रेट्स, निराश निर्दलीय लोगों और रिपब्लिकन खेमे के कुछ ऐसे धड़ों को एक साथ ला खड़ा किया है, जो अब बार-बार यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर अमेरिकी टैक्सपेयर (करदाता) इज़राइल की सैन्य महत्वाकांक्षाओं के लिए पैसा क्यों दें।
2026 के बाद इज़राइल को दी जाने वाली लगभग 4 अरब डॉलर की सालाना अमेरिकी सैन्य सहायता को खत्म करने का ट्रम्प का कथित फैसला काफी कुछ बयां करता है। चाहे इसे पूरी तरह लागू किया जाए या फिर इसका मकसद सिर्फ चुनावी नुकसान को कम करना हो, यह ऐलान बताता है कि नेतन्याहू को बिना शर्त समर्थन देना राजनीतिक रूप से कितना महंगा साबित हुआ है। इज़राइल का सैन्य तंत्र न केवल अमेरिकी पैसों पर, बल्कि अत्याधुनिक हथियारों, खुफिया जानकारी और राजनयिक सुरक्षा तक उसकी पहुंच पर भी निर्भर है। एक अमेरिकी राष्ट्रपति पर नेतन्याहू की आंख बंद कर निर्भरता ने उन व्यापक संबंधों को खतरे में डाल दिया है, जिन पर लंबे समय से इज़राइल की सुरक्षा टिकी हुई है।
ट्रम्प और नेतन्याहू को मिले राजनीतिक झटके उनके अपने देशों तक ही सीमित नहीं हैं। कुछ महीने पहले हंगरी में विक्टर ओर्बन की हार के बाद, हाल के हफ्तों में ब्राजील और सर्बिया में भी उनके सहयोगियों को चुनावी हार का सामना करना पड़ा है। साथ ही, ईरान ने यह दिखा दिया है कि जब हमलावर ताकतें निर्णायक जीत का वादा कर रही हों, तो ऐसे हमले से बच निकलना अपने आप में एक रणनीतिक उपलब्धि हो सकती है। अमेरिकी ताकत की सीमाओं को उजागर करने के लिए तेहरान को अमेरिका को सैन्य रूप से हराने की जरूरत नहीं है। उसे बस राजनीतिक रूप से एकजुट रहना है, विरोध करने की क्षमता बनाए रखनी है और इस बात का इंतजार करना है कि टकराव की कीमत उसके विरोधियों के संकल्प को कमजोर कर दे।
फिर भी ये सब ईरान की अजेयता का सबूत नहीं कहा जा सकता। यह उस भारी रणनीतिक भूल का प्रमाण है, जिसके तहत यह मान लिया गया था कि सैन्य श्रेष्ठता से राजनीतिक समर्पण सुनिश्चित हो जाएगा। तब भी, न तो ट्रम्प और न ही नेतन्याहू इस खास सबक को मानने को तैयार दिखते हैं। ट्रम्प लगातार इस युद्ध का बचाव कर रहे हैं, जबकि नेतन्याहू संघर्ष को और बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं। दोनों को शायद लगता है कि एक और बड़ा सैन्य टकराव उनकी खोई हुई साख को बहाल कर सकता है। इसलिए, उनकी कमज़ोर होती स्थिति उन्हें और भी खतरनाक बना सकती है।
अगले साल जनवरी से, ट्रम्प को एक ऐसी डेमोक्रेटिक कांग्रेस (संसद) का सामना करना होगा जो उनके फैसलों की जांच कर सकती है, सैन्य खर्च पर सवाल उठा सकती है और उनके घरेलू एजेंडे में रुकवाटें डाल सकती है। वहीं, नेतन्याहू के सामने अपनी सत्ता खोने का खतरा बना हुआ है, या फिर उन्हें बिना संसदीय बहुमत के और वाशिंगटन में एक कमजोर समर्थक के सहारे गठबंधन की बातचीत करनी पड़ सकती है।
ऐसा नहीं है कि उनकी सत्ता पूरी तरह छिन गई है, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक अधिकार के लिए एक बहुत ज़रूरी चीज़ खो दी है, और वह है यह धारणा कि उनके फैसलों से जीत ही मिलेगी। ट्रम्प और नेतन्याहू ने ईरान को कमज़ोर और बेबस करने की कोशिश की थी। लेकिन इसके उलट, उनके इस युद्ध ने उन्हें राजनीतिक रूप से कमज़ोर कर दिया है, रणनीतिक तौर पर उनकी अहमियत घटा दी है और उनके विकल्पों को और भी सीमित कर दिया है। हो सकता है कि वे अपने पदों पर बने रहें, लेकिन उनकी इस साझेदारी के साथ जुड़ी 'अजेय' होने की छवि अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
(अशोक स्वैन स्वीडन की उपसाला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं। उनके अन्य लेख इस लिंक में पढ़ सकते हैं।)