विचार

आकार पटेल / समाज, सियासत और सोच के आधार पर अजूबा बनता भारत

हिंदुत्व ने भारत की राजनीति, संस्थाओं और समाज को कैसे बदला है — और भविष्य क्यों ज़्यादा अंधकारमय लग रहा है?

हिंदुत्व के प्रचार का कोई भी अवसर नहीं छोड़ते हैं पीएम मोदी (फोटो - पीटीआई)
हिंदुत्व के प्रचार का कोई भी अवसर नहीं छोड़ते हैं पीएम मोदी (फोटो - पीटीआई) 

इस हफ़्ते एक विदेशी मीडिया संस्था ने मेरा इंटरव्यू लिया और बातचीत खत्म होने के बाद, इंटरव्यू लेने वाले ने कहा कि वह हैरान था। उसने कहा कि उसे पता नहीं था कि भारत की स्थिति ऐसी है, और मुझे लगता है कि यह एक आम प्रतिक्रिया है। भारत पर रिसर्च करने वाले शिक्षाविद् और यहां काम करने वाले विदेशी पत्रकारों के अलावा, बहुत कम लोग ही यह समझ पाते हैं कि भारत अपनी पुरानी छवि के मुकाबले कितना बदल गया है।

उस इंटरव्यू में मुझसे क्या पूछा गया था और मैंने क्या जवाब दिया था, मैं आपको बताता हूं, ताकि आपको अंदाज़ा हो सके कि इंटरव्यू लेने वाले ने क्या समझा। आप इसकी तुलना आज भारत की स्थिति के बारे में अपनी समझ से भी कर सकते हैं।

सबसे पहले वह हिंदुत्व को समझना चाहता था – इसके उद्भव, हिंदुत्व के वैचारिक आधार और यह कि एक धर्म के तौर पर हिंदू धर्म से कैसे अलग है। मैंने बताया कि हिंदुत्व शब्द 'हिंदू' और 'त्व' से मिलकर बना है और इसका मतलब है 'हिंदूपन'। यह शब्द एक सदी पहले सावरकर की किताब में इस्तेमाल किया गया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि भारत और हिंदू शब्द उसी मूल से निकले हैं जिससे इंडस और सिंधु शब्द निकले हैं। उनका मानना ​​था कि कोई व्यक्ति तभी हिंदू और उस नाते भारतीय हो सकता है, जब उसके पवित्र स्थल भारत में हों, न कि यरूशलेम, मक्का या किसी और जगह पर।

सवाल के दूसरे हिस्से के बारे में मैंने कहा कि हिंदू धर्म एक धर्म है और इसका संबंध व्यक्तिगत आस्था से है: जैसे देवी-देवता, प्रार्थना, व्रत और त्योहार। वहीं हिंदुत्व का संबंध दूसरे व्यक्ति की आस्था और इस बात से है कि वे क्या नहीं खा सकते, कहां इबादत या प्रार्थना नहीं कर सकते, किससे प्यार नहीं कर सकते और कहां नहीं रह सकते।

फिर उन्होंने पूछा कि भारतीय राजनीति में हिंदुत्व का असर कैसे बढ़ा, खासकर बीजेपी के उभार के साथ। मैंने कहा कि भले ही इसकी शुरुआत 1951 में हुई थी, लेकिन चार दशकों तक राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी/बीजेएस (भारतीय जनसंघ) का वोट शेयर सिंगल-डिजिट में ही रहा और 1990 तक बिना गठबंधन के वे एक भी राज्य नहीं जीत पाए। इतने सालों तक पार्टी को यह समझ नहीं आया कि किस मुद्दे पर लोगों को एकजुट किया जाए। अयोध्या में मस्जिद गिराए जाने की घटना ने इसे लोकप्रिय बनाया और इसका वोट शेयर दोगुना होकर 18 प्रतिशत हो गया। जिस हिंसा ने बीजेपी को आगे बढ़ाया, उसमें लगभग 3000 भारतीय मारे गए। दो और मांगों—कश्मीर में मुसलमानों की संवैधानिक स्वायत्तता खत्म करना और उनके पर्सनल लॉ को हटाना—इसने भी तनाव को बनाए रखा।

फिर वह इस बात पर चर्चा करना चाहता था कि हिंदुत्व ने भारत के राजनीतिक संस्थानों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ बरताव सहित व्यापक राजनीतिक माहौल को कैसे प्रभावित किया है। यहां आंकड़ों को दोहराने के अलावा और कुछ भी नहीं कहा जा सकता था, जिनसे हमें पता चलता है कि हमारी सत्तारूढ़ पार्टी किस तरह से लोगों का पूर्ण बहिष्कार करती है, जैसा कि उसके मंत्रियों, लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों और उसके राज्य विधायकों के रवैये से पता चलता है।

बीफ़ रखने को अपराध मानने वाले कानून 2015 में शुरू हुए, जिससे बीफ़ के नाम पर लोगों की पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग) की घटनाएं होने लगीं, और अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादी को अपराध मानने वाले कानून 2018 में आए। उसे यह जानकर बहुत हैरानी और दुख हुआ कि अब 'सबूत देने की जिम्मेदारी' (बर्डन ऑफ प्रूफ) को उल्टा कर दिया गया है और आरोपी को पहले से ही दोषी मान लिया जाता है।उसने पूछा कि अपने आस-पास ये सब होते हुए भी आप खुद को लोकतंत्र कैसे कह सकते हैं? मैंने बस कंधे उचका दिए।

फिर उसने हिंदुत्व की राजनीति को सामान्य बनाने में प्रधानमंत्री की भूमिका के बारे में पूछा और यह भी कि यह राजनीतिक प्रोजेक्ट चुनावी रूप से सफल क्यों रहा है। मैंने कहा कि मोदी हिंदुत्व का समर्थन करने के मामले में उनसे पहले के बीजेपी नेताओं की तुलना में ज़्यादा खुले और ईमानदार हैं। इसी वजह से वे अपने समर्थकों के बीच लोकप्रिय हुए और बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर 38 प्रतिशत वोट तक पहुंचाया और उसकी स्थिति अभी भी वही बना हुई है।

मैंने कहा कि बीजेपी कानून और नीतियों के ज़रिए स्थायी ध्रुवीकरण को लेकर भी काफी आक्रामक है। (मैंने बुलडोज़र के इस्तेमाल और इसके लिए बिना उचित प्रक्रिया के पालन न होने का ज़िक्र किया, जिस पर वह अवाक रह गया)

फिर उसने पूछा कि हिंदुत्व का भारत के मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों पर क्या असर पड़ा है, और क्या बहुसंख्यकवादी राजनीति के उभार से भारतीय राज्य में अल्पसंख्यकों के अपनी जगह को समझने का नज़रिया बदल रहा है। मैंने अपनी समझ के अनुसार जवाब दिया। मुख्य बात यह थी कि भारत में अल्पसंख्यकों की आबादी पश्चिमी यूरोप की कुल आबादी से भी ज़्यादा है।

जब मुझसे भारत की सीमाओं के बाहर हिंदुत्व के बारे में पूछा गया, तो मैंने बताया कि जब फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाई को सही ठहराने की बात आती है, तो इज़रायल हमें अपने भरोसेमंद दोस्त और सहयोगी के तौर पर पेश करता है।

मैंने कहा कि 2014 से हमारी महत्वाकांक्षा ग्लोबल से रीजनल हो गई है और हमारा सारा ध्यान अपने पड़ोसियों से आगे निकलने पर है। हमने चीन से मुकाबला करना छोड़ दिया और मैंने उन्हें 1991 के बाद से अर्थव्यवस्था और हमारी स्थिति के आंकड़े बताए।

उसने पूछा: क्या बीजेपी नेताओं को यह नहीं दिखता कि वे कितना नुकसान कर रहे हैं? मैंने कहा कि मेरे अनुभव के अनुसार, वे सचमुच अपनी विचारधारा में विश्वास करते हैं। उनके लिए यह किसी मकसद को पाने का ज़रिया नहीं, बल्कि खुद एक मकसद है; और इसी वजह से, लोगों को बाहर करने और सताने का जो सिलसिला चल रहा है, वह जारी रहता है—चाहे उसके नतीजे कुछ भी हों।

आखिर में, उसने मुझसे भारत के भविष्य पर चर्चा करने को कहा - कि क्या देश बहुसंख्यकवादी राजनीति से दूर हट सकता है, विपक्ष और भारत के लोकतांत्रिक संस्थान क्या भूमिका निभा सकते हैं, और क्या भारत की बहुलतावादी परंपरा हिंदुत्व के बढ़ते प्रभाव का सामना कर सकती है।

मैंने कहा कि हमारी स्वाभाविक स्थिति बहुलवादी है और मोटे तौर पर समाज हमारी सरकार की विचारधारा को नहीं दर्शाता है। हालांकि, इतने सालों से ऊपर से थोपे जाने के कारण यह विचारधारा संस्थानों और समाज में रच-बस गई है और पार्टी के सत्ता से हटने के बाद भी यह बनी रहेगी।

भविष्य की बात करें तो वह अंधकारमय है, क्योंकि हमारे पास इस बात का कोई उपाय नहीं है कि 50 करोड़ लोगों को गरीबी से कैसे बाहर निकाला जाए, जो अभी भी गरीबी में ही जी रहे हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि अब हम इस मुद्दे पर कोई ज़रूरी चर्चा नहीं करते और न ही यह हमारे देश की राजनीति का मुख्य आधार है। हम गरीब और महत्वहीन बने रहेंगे, लेकिन इस बात से संतुष्ट रहेंगे कि हमारे अल्पसंख्यक हमसे भी बदतर स्थिति में हैं।