
संविधान समतामूलक समाज का मानचित्र है। समता की नींव बंधुता पर टिकी है। यह एक क्रांतिकारी दस्तावेज है। यह याद रखा जाए कि फ्रांसीसी क्रांति का मकसद भी आजादी, समता और बंधुता रहा। फ्रांसीसी क्रांति विश्व भर के नव प्रगतिगामी समाज व्यवस्था का आगाज थी।
बंधुता को तोड़कर समता स्थापित नहीं हो सकती। गांधी की राजनीति बंधुता प्रधान थी। जहां शोषक आत्मावलोकन करें और शोषण की आदत को पहचानें। स्वयं ही शोषित के न्याय की पैरवी करें। उस संरचना में अपने से कमजोर के आंखों को अश्रुपूरित करने को अधिकार नहीं माना जाता था। अपने से ताकतवर की आगे घुटने भी नहीं टेके जाते थे, लड़ाई के मैदान से मुंह नहीं मोड़ा जाता था। न ही अपने कर्तव्य निर्वहन की बारी आने पर कोई नेतृत्व कर्ता यह कह देता था कि “ जो उचित लगे वो करो।”
वायकॉम मंदिर प्रवेश सत्याग्रह की अगुवाई उस वर्ग ने की जिसका प्रवेश निर्बाध था। उस वर्ग के दस हजार लोगों ने झंडा उठाकर आंदोलन किया। उनके पक्ष में, जिनके प्रवेश को प्रभुत्वसंपन्न समूह ने हजारों साल से अवरुद्ध किया था। यह गांधी की राजनीति थी।
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पिछले समय में हर समूह को दूसरे से भयाक्रांत करके राजनीति की बुनावट की जा रही है। खयाल रहना चाहिए कि हाशिये पर खड़े वर्ग को चैतन्य करना, संघर्ष के लिए खड़ा करना, संगठित करना, विभाजनकारी राजनीति नहीं है बल्कि सबसे कमजोर के द्वारा आवाज उठाने को वर्ग संघर्ष ठहरा देना सरासर झूठ है। कमजोर बहुजन समाज को आज्ञापालक रखना, गैर बराबरी को बढ़ावा है। उनके चैतन्य से डरना और उन्हें डराना विभाजनकारी है। ऐसी राजनीति कमजोर का दमन और ताकतवर के आगे झुकना सिखाती है। यही अभी हो रहा है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक लघु भूमिस्वामी वर्ग को मनरेगा के अंत में थोड़ी राहत दिखाई दी। मजदूरी की दर घटेगी और कुछ बचत हो जाएगी। गांधी की राजनीतिक संरचना में शायद जमीन के मालिक यह आवाज़ उठाते कि मजदूरी की दर यथावत रहे, मजदूरी महंगाई के अनुपात में बढ़े, मजदूर साल भर काम मांगने का हक रखे। अपने से अधिक ताकतवर से लड़ते। उचित दाम पाने के लिए वहां आवाज बुलंद करते। न खुद का दमन होने देते और न ही अपने से कमजोर का दमन करते।
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लेकिन अभी इसके ठीक उलट हो रहा है। मजदूरी के कम हो जाने की बाट जोहते भूमिस्वामी इससे अनभिज्ञ रहे कि उनके दाम तो अब और पिटने वाले है। जितनी बचत मजदूरी के कम हो जाने से होने वाली है, उससे कई गुना अधिक प्रहार तो ट्रंप डील से होने वाला है। विशेषकर सोयाबीन उत्पादक, सेब उत्पादक किसान का भविष्य सवालों के घेरे में है।
पश्चिमी मध्य प्रदेश में सोयाबीन उत्पादक किसान पहले से बढ़ी हुई लागत से जूझ रहे हैं। अर्जेटीना और ब्राजील से आयातित सोया तेल, खली के कारण भाव बहुत कम हुआ है। चीन में जानवरों के पोषण हेतु खली का इस्तेमाल होता था। सो शुरुआत में निर्यात होता रहा। दाम बढ़ते गये। फिर ब्राजील, अर्जेंटीना के बाजार में उतरने से भाव कम होने लगे। ऊपर से तेल के आयात पर करीबन सोलह प्रतिशत सीमा शुल्क देने के बावजूद भी वह सस्ता पड़ने लगा है। देशी तेल कारखाने बंद पड़ने लगे हैं। आज हालात यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से 26 फीसदी कम पर सोयाबीन की खरीद हो रही है। सोयाबीन की खरीद का तकरीबन 5328 भाव है और 3942 में खरीद होती है। यही हाल मक्के का है। 2400 का समर्थन मूल्य है, उससे 24 प्रतिशत से कम में खरीद हो रही है।
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यदि एक बीघे की उत्पादन लागत को समझें तो स्थिति स्पष्ट होती है। अनुकूल समय और मौसम में एक बीघे में 3 से 5 क्विन्टल उत्पादन होता है। मौसमी खराबी से यह 50 किलो या एक क्विंटल रह जाता है। एक बीघे में 20 से 25 किलो बीज लगते हैं जो करीबन 1500 में पड़ते हैं। जुताई-बुआई में करीब हजार रुपये लगते हैं। दो बार निंदाई के 3000 तक लग जाते हैं। 1500 दवा का खर्च होता है, छिड़काव 600 में किया जाता है। साढ़े आठ सौ की खाद, 3000 रुपये में इल्ली से बचाव के लिए छिड़काव, कटाई यदि मशीन से हो तो 2000 , मजदूर से भी उतना ही लगता है। हाथ की कटाई के बाद थ्रेशिंग में करीबन 500 रुपये लग जाते है। फिर खुद की मजदूरी परिवहन का खर्च। चूंकि वर्षाकालीन फसल है तो सिंचाई की निर्भरता बिजली पर नही है, इस प्रकार इसका कुल खर्च 13,950 तक हो रहा है। प्रति क्विन्टल 3,942 के हिसाब से जोड़ें और तीन क्विन्टल उत्पादन में माने तब भी 11,826 मिल रहे है। 5 क्विन्टल सबसे अच्छा उत्पादन माना जाता है, जो हमेशा नही हो पाता। जलवायु बदलाव से बिल्कुल नही हो रहा। तो क्या बचत हो रही है?
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अब ट्रंप डील में इसका हश्र और क्या होगा, सहज सोचा जा सकता है। सोया तेल, आयातित होगा। इस पर कोई शुल्क नही लगेगा। सो वह सस्ता पड़ेगा। ट्रंप यह भी कह रहे है कि गैर जी.एम. उपज के निर्यात की शर्त अवरोधक है, माने कुछ ही समय मे जी.एम. सोया बाजार में आएगा। हालांकि खाद्य पदार्थ में जी.एम. पर पाबंदी है, मगर जी.एम. सोया से बने डिस्टिलर ड्राइड ग्रेन विथ सोलुबल्स को परोक्ष प्रवेश मिलेगा। यह सस्ता पड़ेगा और ज्यादा असरकारी हो सकता है। यह जानवर के खाद्य में इस्तेमाल होता है। फिर गैर टैरिफ रुकावट पर भी चर्चा की अमेरिकी मांग के आगे कब तक “जो उचित लगे करो” यह कहा नहीं जायेगा, ऐसी तो गारंटी नहीं है। ट्रंप के आगे झुकने की आदत जो पड़ गईं है। सोया खली सस्ते में बाजार में उपलब्ध होते ही सोयाबीन उत्पादक किसान गिरते दाम से जूझेंगे।
अब अचानक कृषि उत्पाद को सूची से हटाए जाने से संदेह और गहरा होता है। यह समझना मुश्किल है कि असल मंशा क्या है। खासकर तब जबकि दोनों मुल्कों के शीर्ष नेतृत्व में पारदर्शिता नज़र नहीं आती और केवल प्रस्तुतिकरण की गरज दिखती हैं।
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टैरिफ डील में वह मुल्क फायदे में रहते है जहां पहले से ही टैरिफ कम है। उनके उत्पाद को थोड़े से गिरते दाम का सामना करना पड़ता है। जबकि वो मुल्क जहां टैरिफ अधिक रहा, वहां बहुत गिरावट लानी पड़ती है। तब इस असमान मूल्य गिरावट से एक मुल्क को खूब लाभ होता है, दूसरे को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। यह परस्पर नहीं होता। मिसाल के तौर पर जापान के साथ हुई डील में जापानी वस्तुओं को तो थोड़ी गिरावट का सामना करना पड़ा। तकनीकी नवाचार से उसकी भरपाई हो गईं। मगर हमें इतना मूल्य कम करना पड़ा कि उत्पादन ही असम्भव हो जाये। आज जापान के साथ हुये समझौते के बाद भारत के व्यावसायिक घाटे का अंतर 12.6 बिलियन डॉलर है। यह हमारे आयात-निर्यात के बीच का अंतर है।
आज टैरिफ को कम करवा लिए जाने का डंका बजाया जा रहा है। वह भी तो समझा जाए कि परमाणु समझौते के बाद स्वर्गीय मनमोहन सिंह जी के कार्यकाल में भारत पर कुल 2.98 फीसदी टैरिफ था, वह पिछले दिनों बढ़ाकर करीबन पचास हुआ। वह घटकर 18 तो किया। पर कहाँ 2.98 फीसदी और कहाँ 18 फीसदी। यह तो छोटे मझौले नगरों की सेल छूट माफिक है।
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किसान लामबंद हो, मजदूरों के साथ मिलकर अपने को दबाने वाली वैश्विक ताकतों से लड़े। यह बंधुता की राजनीति होगी, वरना कुछ ही दिनों में हमारे किसान अपनी ही धरती में दुनिया के किसी कॉर्पोरेट के लिए फसल उगाते रह जाएंगे। हम महज बाजार हो जाएंगे। अब की गुलामी दिखाई तक नही देगी। बाजार की गुलामी दिखाई नही देती। ऐसे में वक्त है कि अपने से कमजोर की आंख के आंसू पोछते हुए सत्य के लिए खड़ा होना।
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