विचार

क्या पिघलने लगी है भारत-पाक रिश्तों पर जमी बर्फ, दोनों देशों के डीजीएमओ के संयुक्त बयान से जगी हैं उम्मीदें

भारत-पाकिस्तान संबंध अंधेरे रास्ते की तरह हैं। इसमें कई बार समतल जमीन मिलती है और कई बार गड्ढे। कभी आक्रामक उन्माद और कभी खामोशी। काफी सुधार व्यापारियों के आपसी रिश्तों, सिनेमा, संगीत, क्रिकेट और ‘ट्रैक टू’ संपर्कों के कारण आता है।

Photo by Emily Wax / The Washington Post via Getty Images
Photo by Emily Wax / The Washington Post via Getty Images 

गुरुवार 25 फरवरी को जब भारत और पाकिस्तान की सेना ने संघर्ष विराम पर सन् 2003 के समझौते का मुस्तैदी से पालन करने की घोषणा की, तब बहुतों ने उसे मामूली घोषणा माना। घोषणा प्रचारात्मक नहीं थी। दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) ने संयुक्त बयान जारी किया। कुछ पर्यवेक्षक इस घटनाक्रम को काफी महत्वपूर्ण मान रहे हैं। उनके विचार से इस संयुक्त बयान के पीछे दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की भूमिका है जो इस बात को प्रचारित करना नहीं चाहता।

दोनों के बीच बदमज़गी इतनी ज्यादा है कि रिश्तों को सुधारने की कोशिश हुई भी तो जनता की विपरीत प्रतिक्रिया होगी। इस घोषणा के साथ कम-से-कम तीन घटनाक्रमों पर हमें और ध्यान देना चाहिए। पहला, अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन की भूमिका जो इस घोषणा के फौरन बाद अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता के बयान से स्पष्ट दिखाई पड़ती है; दूसरा, अफगानिस्तान में बदलते हालात और तीसरा, भारत और चीन के विदेश मंत्रियों के बीच हॉटलाइन की शुरुआत।

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सन 2003 के जिस समझौते का जिक्र हो रहा है, वह इतना असरदार था कि उसके सहारे सन 2008 आते-आते दोनों देश एक दीर्घकालीन समझौते की ओर बढ़ गए थे। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने अपनी किताब में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में हुई बैठकों का हवाला दिया है। भारतीय मीडिया में भी इस आशय की काफी बातें हवा में रही हैं।

सुधरते रिश्तों का पहिया उल्टा क्यों चला और भविष्य में बेहतर रिश्तों की संभावना कैसी होगी है, इसे लेकर कयास हैं। एलओसी पर गोलाबारी रुकने से रिश्तों में चमत्कारिक सुधार भले ही नहीं हो, पर दोनों ओर रहने वाली आबादी को काफी राहत मिलेगी। भरोसा बढ़ाने वाली दो बातें और हैं। दोनों देशों के बीच किसी स्तर पर बैक-चैनल बातें चल रही हैं। दूसरे, डीजीएमओ का फैसला दोनों देशों की एजेंसियों के बीच चर्चा हुए बगैर लागू नहीं हुआ होगा। और यह चर्चा भी शीर्ष नेतृत्व की अनुमति के बगैर नहीं हुई होगी।

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दोनों देशों में इस समय उच्चायुक्त स्तर के अधिकारी नहीं हैं। पहले उच्चायुक्तों की नियुक्ति होनी चाहिए। अगस्त, 2019 में कश्मीर से अनुच्छेद 370 की वापसी के बाद पाकिस्तान ने अपने उच्चायोग को डाउनग्रेड कर दिया था। अब अपग्रेड होना बेहतरी का एक संकेत होगा। कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान सहित 10 पड़ोसी देशों के साथ कोविड-19 प्रबंधन पर एक कार्यशाला में कहा था कि दक्षिण एशिया का एकीकरण होना चाहिए। बैठक में मौजूद पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने भारत के रुख का समर्थन किया था। पाकिस्तान ने भारत में बनी एस्ट्राजेनेका वैक्सीन को सबसे पहले अनुमति दी है। खबर यह भी है कि पाकिस्तान सरकार भारतीय कपास के आयात को जल्द मंजूरी देने वाली है। तमाम पाबंदियों के बावजूद जीवन-रक्षक दवाएं भारत से जा रही हैं।

संघर्ष विराम की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि भारत पाकिस्तान के साथ सामान्य पड़ोसी जैसे रिश्ते चाहता है और शांतिपूर्ण तरीके से सभी मुद्दों को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है। खबर है कि पिछले तीन महीने से बैक-चैनल बातचीत चल रही थी। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के रक्षा मामलों के विशेष सलाहकार मोईद युसुफ के बीच किसी तीसरे देश में भेंट भी हुई है। बताया जाता है कि अजित डोभाल और पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के बीच भी संपर्क हैं। बीमारी से लड़ने की मुहिम इस इलाके में राजनीतिक रिश्तों को बेहतर बना सके, तो इसे उपलब्धि माना जाएगा।

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मुंबई हमले के पहले तक हालात शांति के लिए मुफीद नजर आने लगे थे। फिर 2015 में उफा सम्मेलन के हाशिये पर जो बातचीत हुई थी, उससे संभावनाएं फिर बनीं जो जनवरी, 2016 में पठानकोट प्रकरण के बाद टूटीं, सो अब तक टूटी पड़ी हैं। पाकिस्तानी सिविल सोसायटी हालांकि आज भी बहुत प्रभावशाली नहीं है, पर दिसंबर, 2014 में आर्मी पब्लिक स्कूल, पेशावर के हत्याकांड से लोगों के मन में खून-खराबे को लेकर वितृष्णा पैदा हुई है। भारत से व्यापार बढ़ाने की कोशिशें वहां का व्यापारी समुदाय एक अरसे से करता रहा है, पर 2019 के पुलवामा- बालाकोट प्रकरण के बाद दोनों का व्यापार भी ठप हो गया।

भारत-पाकिस्तान संबंध अंधेरे रास्ते की तरह हैं। इसमें कई बार समतल जमीन मिलती है और कई बार गड्ढे। कभी आक्रामक उन्माद और कभी खामोशी। काफी सुधार व्यापारियों के आपसी रिश्तों, सिनेमा, संगीत, क्रिकेट और ‘ट्रैक टू’ संपर्कों के कारण आता है। संयोग से मई, 2014 के बाद से एक देश के पत्रकार की दूसरे देश में नियुक्ति भी बंद है। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं का आदान-प्रदान भी खत्म है।

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मुशर्रफ के बाद से पाकिस्तान में सरकार और सेना एक पेज पर नहीं रहे हैं। पर इस वक्त लगता है कि दोनों में एकता है। पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा के गत 2 फरवरी के एक बयान का हवाला भी दिया जा रहा है। जनरल बाजवा ने पाकिस्तानी एयरफोर्स एकेडमी में कहा कि यह वक्त है कि हमें हरेक दिशा में शांति के प्रयास करने चाहिए। पाकिस्तान और भारत को लंबे अरसे से चले आ रहे कश्मीर विवाद का समाधान कर लेना चाहिए। पर्यवेक्षक कहते हैं कि अगस्त, 2019 में अनुच्छेद 370 की वापसी के बाद से पाकिस्तान की ओर से आया सद्भावना से भरा यह सबसे बड़ा बयान है।

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