विचार

कबीर जयंती विशेष: हिंदुस्तानियत की सांझी विरासत का विलक्षण संत, जिनकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है

कबीर किसी भी किस्म के सीमाबद्ध पंथ के खिलाफ थे। शायद यही वजह रही होगी कि उनके जीते जी तो कोई ‘कबीरपंथ’ वजूद में नहीं आया। और आया भी तह, जब वह जिस्मानी तौर पर नहीं रहे और हिंदू उन्हें जला नहीं सके और मुसलमान दफना नहीं पाए। दोनों ही कबीर पर दावा करते थे।

रेखाचित्रः सोशल मीडिया
रेखाचित्रः सोशल मीडिया 

यकीनन कबीर हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियत की सांझी विरासत हैं। एक ऐसे विलक्षण संत जिन्हें 'संतई' से घोषित चिढ़ थी। कहते हैं कि मुसलमान के रूप में उनका जन्म हुआ था, लेकिन प्रसिद्धि उन्हें हिंदू आंदोलन की भक्ति धारा से मिली और मान्यता भी। अनपढ़ थे और रोजी-रोटी के लिए बुनकरी करते थे।

भक्ति आंदोलन चली आ रही पारंपरिक व्यवस्था की बुनियादों से सीधे टकराता है और कतिपय भक्त कवि और संत इससे कविता और गीतों के जरिए मुकाबिल हुए। उत्तर भारत में इस आंदोलन के समानांतर इस्लाम में सूफी आंदोलन का विस्तार हुआ। अलबत्ता दोनों ने ईश्वर-अल्लाह के साथ निजी रिश्ते की अवधारणा को अपनाया। पुजारीवाद और मुल्लाशाही की कतई परवाह नहीं की और हर किस्म के आडंबर और अनुष्ठान को खुलकर चुनौती दी।

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कबीर इनमें से अव्वल थे। कबीर की कविता (पद/साखियां) भक्ति आंदोलन की सबसे सशक्त कविता है। हर तरह की कट्टरता अथवा बुनियादपरस्ती का तार्किक विरोध कबीर की कविता ने किया है। उनका काव्यांश है: अकड़कर चलते हो/चेहरे पर बनावटी हंसी है/क्या तुम भूल गए/गर्भ में तुमने दस महीने/दुबक कर बिताए हैं?/दाह संस्कार से राख बन जाओगे/दफन होकर कीड़ों के लिए भोज/यह गठीला शरीर मिट्टी हो जाएगा/रिसता घड़ा/नौ छेदों का बर्तन/मधुमक्खियां जैसे शहद जमा करती हैं/तुमने जमा किया धन/जब मर जाओगे/तब यही कहा जाएगा, 'मुर्दे को ले जाओ/बदबू आ रही है।'

यह रचना तब लिखी गई थी, जब बनारस की सरजमीं पर पंडित और मुल्ला धन-दक्षिणा लेकर स्वर्ग-नर्क और जन्नत-दोजख के रास्ते दिखाया करते थे। कबीर ऐन हस्तक्षेपकारी की मानिंद अपनी कविता के जरिए गूंजते-बरसते और ललकारते थे। कविता का सबसे बड़ा मतलब तो शायद यही होता होगा! कम से कम कबीर के दौर में।

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जोखिम लेकर कायदे से कविता लिखना ज्ञात इतिहास में कबीर से ही शुरू होता है। अपनी एक साखी में कबीर ने कहा है कि जिसमें अपना घर फूंकने की हिम्मत हो, वह उनके साथ चल सकता है। माना जाता है कि यह तब कहा गया, जब उन्हें बेहिसाब मुरीद मिले और बाकायदा 'पंथ' बनाने के लिए उकसाने लगे। किसी भी किस्म के सीमाबद्ध पंथ के वह खिलाफ थे। शायद यही वजह रही होगी कि उनके जीते जी तो कोई 'कबीरपंथ' वजूद में नहीं आया। तब आया, जब वह जिस्मानी तौर पर नहीं रहे और हिंदू उन्हें जला नहीं सके और मुसलमान दफना नहीं पाए। दोनों ही कबीर पर दावा करते थे।

बाद की किवदंती है कि मृत्यु उपरांत उनकी देह सुगंधित फूलों में तब्दील हो गई थी। कुछ विद्वानों का मत है कि इस किवदंती के पीछे कबीर के किसी उस अज्ञात शिष्य का हाथ है, जो कविता में उन्हें अपना गुरु मान चुका होगा! कबीर की एक कविता का भावानुवाद है: 'अगर तुम कहते हो कि ब्राह्मण हो/ब्राह्मण मां से जन्मे हो/तो क्या कोई खास मार्ग था/जिससे होकर तुम बाहर निकले?/अगर कहते हो कि तुम तुर्क (मुसलमान) हो/तुम्हारी मां तुर्क है/तो फिर क्यों जन्म से पहले/तुम्हारा खतना नहीं हुआ।' ऐसा लिखना कबीर के बूते की ही बात थी।

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कविता के विश्वविख्यात महान हस्ताक्षरों ने सचेत या अचेतन कहीं न कहीं कबीर को शिद्दत के साथ छुआ और जिया है। एक 'संत कवि' का इससे बड़ा क्या हासिल हो सकता है? भारतीय उपमहाद्वीप में उनकी कविता बनारस से होते हुए पश्चिम और पूर्व की तरफ गई। दुनिया भर के नामी कवियों ने उन्हें अपनी-अपनी भाषा में अनुवाद किया। यह कबीर की कविता की ताकत है।

यह सिलसिला दरअसल गुरु नानक देव से शुरू हुआ था जो लगभग उनके समकालीन थे, लेकिन कबीर को अपना वरिष्ठ मानते थे। गुरु नानक देव जी की कई रचनाओं में कबीर ससम्मान हैं और सिखों के पवित्रतम ग्रंथ श्री गुरुग्रंथ साहिब में भी। समकालीन इतिहास में गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, एजरा पाउंड, जैसलॉ मिलोज और रॉबर्ट ब्लाय ने कबीर को अनुदित किया है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रोफेसर और कबीर पर शोध करनेे वाली लिंडा हेेस के अनुसार दुनिया में किसी कवि की कविता का इतना व्यापक नोटिस नहीं लिया गया और न ही अनुवाद किया गया।

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कबीर की कविता साखी है, पद है और कहींं न कहीं दोहे में भी है। गोया समूचा कविता संसार तमाम दिशाओं में उतर गया हो और आसमान अनंत हो! अपने यहां की बात ही करें तो मुक्त भाव से गाने वाले शास्त्रीय गायक कुमार गंधर्व ने अपने वक्त में अपने अंदाज में गाकर उन्हें अमर किया तो हजूरी रागी भाई निर्मल सिंह ने भी गुरुमत संगीत केे जरिए। नुसरत फतेह अली खान और फरीद अयाज साहब ने कबीर के अल्फाज को बाकायदा कव्वाली की रंगत दी। सोनम कालड़ा सहित बेशुमार गायकों ने उन्हें अपनेेेे ढंग से स्पर्श किया। शायद दुनिया का ऐसा कोई सूफी गायक और संगीतकार नहीं होगा जिसके भीतर कभी न कभी कबीर उतरे नहीं होंगे।

बहरहाल, कबीर की गहन अध्येता लिंडा हेस के अनुसार, कबीर ने किताबों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने वाले लोगों का मजाक उड़ाया है। उन्होंने जानबूझकर रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाले शब्दोंं का इस्तेमाल किया और उन शब्दों को दी गई लयात्मकता भी एक कला है, उन्होंने सामान्य भाषा से चीजेंं उठाकर उन्हें कविता में ढाला। कबीर एक सामाजिक आलोचक और जनपक्षधर कवि थे। सामाजिक ताना-बाना समझने की सूझबूझ के लिए आज भी उनकी कविता अपरिहार्यय है। इस दौर मेंं तो और भी ज्यादा!

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