
कई वाक्य, शब्द बहुत दिनों तक नए-नए मायने देते रहते हैं। जैसे किसी पत्ते से बूंदें टपकती रहती हैं। ऐसा ही एक वाक्य मेरी जिंदगी में आया और वह आज तक हर दिन ज़ेहन में दस्तक देता रहता है। “पर्सनल इस पोलिटिकल”के वाक्य बीज से हर पल कुछ नई कोंपल फूटती हैं।
स्त्री को सिखाया गया है कि उसका निजी कुछ नहीं होता। उसका धर्म है कि वह निज को सबके लिए होम कर दे। उसकी जिंदगी भूमिकाओं में बंटी है- मां, बेटी, बहू, पत्नी, बहन, भाभी। वह कोई पेशा अपनाए, तो भी उससे यह उम्मीद है कि वह अपनी सामाजिक-पारिवारिक भूमिका भी बखूबी निभाए, जबकि पुरुष के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है।
फिर जब भी उसे किसी घरेलू प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, कहा जाता है कि व्यक्तिगत मामले में किसी को दखल देने की इजाजत नहीं। तब वह दो ध्रुवों के बीच झूलती है। निजी कुछ नहीं होता या व्यक्तिगत मामला है, तो वह बस चुपचाप तिरस्कार सहन करे। यह अलग बात है कि दोनों स्थिति गंभीर रूप से राजनीतिक है। यह स्थिति वर्चस्व को संस्कार का लिबास ओढ़ाकर दमन को सामान्य बनाती है।
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पर बात इतनी सरल नहीं। निजी और निजता के कई मायने हैं। निजता क्या होती है? उसका कोई अलग अस्तित्व भी है या नहीं। वह कितनी समिष्टि में घुली है और कितनी जुदा है। बाहर भीतर कब एक होते हैं और कब विलग। किस संदर्भ में वे अलग होंगे और कब एक दिखाई पड़ते हैं? राजनीति की अभ्यर्थी होने के नाते यह सवाल अक्सर आ खड़े होते हैं। किसी भी संवाद में अचानक वह निजता जागती है। बात भले ही पूरी व्यवस्था पर हो रही हो, मगर अहम को ठेस पहुंचती है। यदि सामाजिक भेद की चर्चा हो रही हो, तब सहसा बहुत से साथी बोल पड़ते है किहमारे यहां ऐसा नहीं होता, हम ऐसा नहीं करते, मेरे घर में कभी नहीं हुआ। किसी तरह के भी भेद को नहीं मानने की बात करने वाले, सही में ऐसा समझते हैं कि वे नहीं मानते, नहीं मानना चाहते। पर भेद के सवाल उठाते ही पता नहीं उनके भीतर पहचान की कौन-सी परत खुल जाती है। वह प्रतिक्रिया करती है। उसे भेद की चर्चा खुद पर किए गए प्रहार-सा लगता है। ऐसे में निजी क्या होता है।
वह क्या है जो चुभती है। क्यों चुभती है। निजी क्या कुछ अखंड होता है या फिर उसकी भी कई परतें हैं। एक ही के भीतर कितनी तरह की निजताएं हैं? वे सब जो उसके व्यक्तित्व को गढ़ती हैं।
हर बार कोई नई तरह की निजता बोल पड़ती है, प्रतिक्रिया करती हैं। निजता की हर परत से उपजती प्रतिक्रिया या अभिमत राजनीतिक है। सामाजिकता से अलग खुद को समझना नितांत गैर राजनीतिक है। ऐसी अराजनीतिकता जो अपनी सुविधा या विशिष्टता से हमें अनभिज्ञ रखती है। अपनी योग्यता की बदौलत स्थापित होने की खुशफहमी इस अराजनीतिकता की परिणति है। यह एक ऐसे अहम को तुष्ट करती है जहां समुदाय, व्यवस्था आदि गौण लगते हैं। यह सुविधाजनक नजर अपने आप में राजनीति है, प्राधान्य की राजनीति।
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यह भी समझ बनती है कि कोई आजाद ‘निज’ नहीं है। समाज व्यवस्था की बनावट निजता के बीज बोती जाती है। विरले ही कोई निजी रोशनाई सब कुछ बदलती है, पर उसमें भी सही में कितना ही ‘निज’ का अंश था, कहना मुश्किल है। क्या हम सब के भीतर पूरी सृष्टि, उसकी तमाम सूक्ष्मता के साथ, अंतर्विरोध से भरी हुई विचार व्यवस्था मौजूद नहीं!
‘मेरा’ कुछ है ‘मैं’ कौन हूं। केवल दार्शनिक प्रश्न के बतौर नहीं। विज्ञान कहता है कि मेरे भीतर आधे अणु तो बाहरी हैं, किसी सूक्ष्मजीवी के हैं। कई बार जो मैं खाना चाहती हूं, वह उनकी मांग है। माता-पिता से मिले अणु की मांग नहीं। तो इन दोनों अणुओं में मैं किसे तरजीह दूं? इनमें से मैं कौन हूं। क्या सिर्फ आधा अणुओं का हिस्सा या संपूर्ण? संपूर्ण के बिना तो मैं सांस भी नहीं ले सकती। तो फिर बाहरी-भीतरी तो कुछ नहीं बचा। सीमा बना नहीं सकते। सरहद है और आदान-प्रदान चालू है। तो बिना निर्भर मेरा कोई अस्तित्व ही कहां है? परस्पर जुड़ा होने पर ही तो ‘मैं’ हूं। मुझे यह सोच बहुत आजाद करती है। यानी अकेले मेरी कोई मुक्ति नहीं हो सकती है। किसी दूर जंगल में जाकर रूह की रिहाई नहीं होगी। सबको रोटी मिलेगी, तो मुझे भी मिलेगी। मुझ भर को मिलती रहे तो जरूरी नहीं की सबको मिले। हो सकता है कि मुझे न मिलने पर फिर कोई खड़ा न हो। तो मेरी भी बंद हो सकती है। सबमें मैं, मुझमें में सब की सोच ने हकीकत को सामने किया। यह हक की राजनीति का आधार है। सत्याग्रह इसी समझ की राजनीति का अभ्यास है। यहां ‘व्यक्तिगत’ राजनीतिक है, मगर नितांत निजी कुछ भी नहीं।
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हर निजता के भाव से कोई राजनीति तो निकलती है। वह माध्यम को मंजिल से जुदा नहीं मानती।
अपने हर चुनाव में मैंने तय किया कि माध्यम क्या होगा। नैतिक सोपान के किस पायदान तक उतरना मैं कुबूल करूंगी। यह निजी व्यक्तिगत फैसला राजनीति से अलग नहीं हो सकता। कई बार यह माना जाता है कि व्यक्तिगत नैतिकता और सामाजिक नैतिकता अलग होती हैं। निजी जीवन की पारदर्शिता संभव है, पर उसे सामाजिकता से अलग रखना चाहिए। मगर निजी सिर्फ निज नहीं होता। वह राजनीतिक होता है। कई तरह के गठबंधन के लिए मजबूर करता है। इनके मायने बदलते हैं। यह राजनीति के फैसलों को प्रभावित करती हैं। उसे निजी संबंध कहकर खारिज नहीं कर सकते।
इन तमाम ख्यालों में आखिरी उधेड़बुन यह भी है कि आखिर निज पर किसकी हुकूमत होती हैं। बहुत-सी बाह्य अधिनायकत्व के अधीन हो सकती है। कई पिंजड़ों में कैद हो सकती है। सब बाह्य उतर भी गया, तो क्या उसके बाद निज आजाद हो जाता है? अपने क्षणिक मनोभाव, अहम, भय, असुरक्षा कामना की गुलामी निज को बांध सकती है। इससे बंधा व्यक्ति राजनीतिक स्वराज के लिए कैसे लड़ पाएगा। उससे मुक्ति को एक ने अपनी राजनीति बनाया था। वह राजनीति को उसी का माध्यम मानता था। अभी खुद तो उस स्थिति तक पहुंचना सरल नहीं लगता। मगर उस सत्यान्वेषी पर यकीन है।
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सो राजनीति में अपने भीतर के तमाम निजताओं, असुरक्षा भय को खंगालने के माध्यम के रूप में जरूर देखती हूं। बिना निराश हुए रोज अपनी हर नई झांकती कमजोरी पर ठहाका लगाती हूं। ठहाका लगाना कुछ दिनों पहले सीखा। वरना तो खड़ूसी में मर जाती। यह ब्रह्मज्ञान पाया कि हंसने के पैसे नहीं लगते। पर अच्छी लड़कियां हंसती नहीं। द्रौपदी हंसी, तो फंसी। समाज ने जो सिखाया था, निज ने कब अंगीकार किया, बिना बताए व्यक्तित्व बन गया। उसको सक्रिय होकर तोड़ा। यह ठहाका लगाना राजनीतिक है। व्यक्तिगत है, निजी और जग सारी है, आजादी है।
“पर्सनल इज पोलिटिकल” कहने वाली अरुणा अस्सी की हो गईं। उम्र हो गई होगी। पर यह वाक्य उम्रदराज नहीं होगा। हर बार नए मायनों को जन्म देगा।
अरुणा! तुम बुड्ढी हो, न हो। यह वाक्य बूढ़ा नहीं होने का।
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